________________
१२, वर्ष ३२, कि० १-२
भनेकान्त
सर्वसत्ता सम्पन्न "राजा" का प्रादुर्भाव हुमा। दुनियावी "पंचब्रह्ममयमन्त्रः सकलीकृत्य निष्कलम् । परं तत्वमनुध्याराजा अपने को ब्रह्म का एकमात्र प्रतिनिधि कहने लगे। यन् योगी स्वाद ब्रह्मतत्व वित् ।' अर्थात् जो योगी पचउसर राजा ने किसी को अपना सिर ऊपर नही उठाने नमस्कार मन्त्र के द्वारा परमतत्व परमात्मा का ध्यान दिया। एक ब्रह्म के एकमात्र प्रतिनिधि इस राजा नाम के करता है, वही ब्रह्मतत्व को जान पाता है। प्राचार्य जीव ने सारी दुनिया को सिसक-सिसक कर जीने पर शुभचन्द्र का 'ज्ञानार्णव' में कथन है कि पचपरमेष्ठी की विवश कर दिया और वह भाग्यवाद के झांसे मे ऐसी फंसी स्तुनि करने से ही नित्य परमानन्द प्राप्त होता है । 'उपकि प्राज तक उबर नही पायी। जैनाचार्यों ने न तो ब्रह्म देशरमायनराम' में श्री जिनदत्तमूरि ने कहा है कि जो प्रतिको एक माना और न उसके प्रतिनिधि की कल्पना ही दिन पंचामेष्ठियो का स्मरण करता है, उसकी धार्मिक की। उसने लोकतन्त्र को प्रेरणा दी।
इच्छायो को शासन देवता प्रसन्न होकर पूरा करते है-- पचपरमेष्ठी नमस्कार मत्र पर अनेकानेक ग्रथो पोर निच्चु वि सुगरु देवपयमतह, पणपरमिट्ठि सरंतहु संतहं । स्तुति-स्तोत्रो की रचना होती रही। ईमा की छठी सासणसुर पान्न ते भम्बई, धम्मियकज्ज पसाहहि सवई । शताब्दी के श्री विद्यानन्द पात्रकेशरी ने 'बहत्पचनमस्कार
इम विवेचन में सपष्ट है कि जैनाचार्य सैद्धान्तिक दृष्टि से स्तोत्र' और चौदहवी शताब्दी के श्री जिनप्रभसूरि न पचपरमेष्ठी को अनादिकालीन मानते है । ऐतिहासिक 'पंचपरमेष्ठियनमस्कार कल्प' जैसे बड़े-बडे स्तोत्रो पोर
दृष्टि में उनकी मान्यता के प्रमाण ईसा से ८५० वर्ष पूर्व कल्पो की रचना की। प्राकृत भाषा मे प्राचार्य कुन्दकुन्द
तक के मिलन है। इसका अर्थ हया कि तीर्थकर महावीर ने "दशभक्ति" की रचना की थी। पचगुरुप्रो के चरणी
के पहले से ही पचपरमेष्ठी के चरणो में श्रद्धा-पुष्प चढ़ाये में अपने भाव सुमन चढ़ाते हुए उन्होने लिखा है -
जाते थे । पुरातात्विक रूप से सम्राट् खारवेल का शिला. झायवि पंचवि गुरवे मगलचउसरण लोयपरियरिए।
लेख उनका मानस्तम्भ ही है। इस सबके बीच उनकी जरसुरखेयरमहिए भाराहण्णायरे बोरे ॥
प्राचीनता निविवाद और प्रामाणिक है। जहा तक आज अर्थ-पंचपरमेष्ठी उत्तम है, वीर है, नर-सुर तथा
उनकी मान्यता का सम्बन्ध है, वह सार्वभौम है-जैसी विद्याधरों से पूज्य है । ससार के दुखाभिभूत प्राणियो के श्वेताम्बरों मे, वैसी ही दिगम्बरो में। कोई तरतमांश नही लिए वे ही एकमात्र शरण है। उनका स्वभाव मंगतरूप
है। वे एकता के प्रतीक हैं, प्रत. प्राज भी बिखराव को
समेटकर एक सूत्र में बाधने की उनमे क्षमता है। माला के प्राकृत का ही एक अन्य ग्रंथ है--भगवती पाराधना।
टूटे मोती फिर एक माला के रूप मे सजाये जा सकते है, रचयिता थे प्रसिद्ध प्राचार्य शिवार्यकोटि । उन्होंने लिखा
यदि जैन लोक पवपरमेष्टी को सार्वभौमिकता पर ध्यान है-"जो पुरुष पंचपरमेष्ठी में भक्ति नहीं करता, उसका है। संयम धारण करना. ऊसर खेत मे बीज बोने के समान
साहित्य के पृष्ठो पर सूक्ष्म भावनामों तक के रंग है। पंचपरमेष्ठी की भक्ति के बिना यदि कोई अपनी
निर्धारित किए गए है, तो वहां पंचपरमेष्ठी के रगो की माराधना चाहता है, तो वह ऐसा ही है, जैसे बीज के
भी बात मिली। जैन ग्रथ 'बृहद्रव्य संग्रह" मे पाच मूल बिना धान्य की इच्छा करना और बादल क बिना पानी
वर्ण माने गये है-श्वेतपीतनीलारुणकृष्णसज्ञाः चाहना।
पचवर्णाः ।" इनमे श्वेत रग क्षाणलेश्या और पूर्ण मात्मतेसि माराहण्णा, यगाण ण करेज्ज जो णरोति ।
शुद्धि का प्रतीक है । लेश्या और कर्मों के क्षीण हो जान त्ति पि सजम तो, सालि सो ऊसरे क्वदि । ५३।।
पर ही प्रात्मा नितान्त पावन, अनन्तदर्शन, ज्ञान भोर बीएण विणा सस्सं, इच्छदि सो वासमभएणं विणा।।
बल-युक्त हो पाती है। लाल रग मगल का द्योतक है, शायव पारायणछिन्ता, पाराभक्तिभकर तो ।। ५४।।
इसी कारण विवाहादि के अवसरों पर लाल वस्त्र धारण भगवज्जिनसेनाचार्य ने महापुराण में लिखा है- करना सौभाग्य का चिह्न समझा जाता है। प्राकृत का