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प्रादि जिन, शिव एवं शैव परम्परा
श्री मुनीशचन्द्र जोशी, नई दिल्ली
जैन और ब्राह्मण परम्परायें भारतीय मूल की होने पर भी है (एवं) केशी ही ज्योतिस्वरूप (ज्ञान के तेज से प्रकाशपरस्पर मौलिक रूप मे मिन्न है। इन दोनों विचारपाययो मान) कहे जाते है। केशी का यह वर्णन जैन मान्यतामो में, इनके दार्शनिक तत्वो के पृथकत्व के साथ-साथ, प्रधान से बहुत दूर नहीं है, और इसे अादि जिन मे सम्बद्ध अन्तर है इनके प्रादों की कल्पना में । जैन धर्म मनुष्य मानना उचित ही लगता है। भगवान ऋपभ का ब्राह्मणी को देवता से श्रेष्ठ मानता है और मनुष्यत्व का ही चरम परम्परामो में ऊचा स्थान है। उन्हे भागवतादि पूगण विष्ण विकसित रूप जित्व मे देखता है और कैवल्य द्वारा प्राणि । के चौबीम अवतारों में गिनते है। अन्य ब्राह्मण पुगणों में मात्र के लिए खुला है। किन्तु ब्राह्मण परम्पराग्रो मे भी उनकी गणना महापुरुषो में हुई है। ब्रह्माण्डपुराण उन्हें ब्रह्माण्ड के नियन्ता के रूप में ईश्वर की स्थिति सर्वोपरि श्रेष्तम नरेश (पार्थिव श्रेष्ठ) तथा सभी क्षत्रियो के मल. है और वहां तक पहुंच पाना ही उपासक का उच्चतम लक्ष्य पुरुष के रूप में (मर्वक्ष त्रस्य पूर्वजम् ) उल्लिखित करता है। साथ ही देवयोनि मनुष्य योनि से श्रेष्ठतर अवस्था है। ब्राह्मण परम्परा उनके महायोगी एवं मनिराट के के रूप में मान्य है।
ग्वरूप में भी परिचित है। तभी तो 'योगवाशिष्ट' के ____ इतना सब कुछ होन पर भी जन धर्म एवं ब्राह्मगो लेखक ने राम के मुख से कहलवाया है-- विचारधारा से अनुप्रेरित सम्प्रदायो ने एक दूसरे को नाह रामो न ने वाञ्छा भावेष न च मे मनः । प्रभावित किया है। विद्वानों ने इस विषय पर काफी शान्तभासितुमिच्छामि स्वात्मनीव जिनो यथा ।। विवेचन किया है । इसलिए हम इस लेख में केवल इस प्रकार अर्थात् (राम अपने लिए कहते है) न तो मै अभिराम के सांस्कृतिक एवं दार्शनिक पादान-प्रदान के सर्वाधिक हूं, न मैं इच्छा मुक्त हूं (किन्तु ) मैं सर्वमयी जिन की भांति महत्त्वपूर्ण पक्ष पर पुन: विचार करना चाहेगे। यह महत्व (शाश्वत ) शान्ति प्राप्त करना चाहता है।' पूर्ण पक्ष है : आदि तीथंकर भगवान ऋषभ के स्वरूप का किन्तु ऋषभनाथ के पुनीत स्वरूप का दूसरा पक्ष है ब्राह्मण परम्पराग्रो पर प्रभाव ।
उनका भगवान शकर से सादृश्य । शिवपुराणकार ने इसका ___डा. हीरालाल प्रभत्ति विद्वानों ने ऋग्वेद के कुछ अनुमोदन करते हुए उन्हें शिव का अवतार कहा है : मंत्रों में केशी पौर ऋषभ के नाम से प्रादि जिन सम्बन्धी इत्थप्रभावऋषभोऽवतारशंकरस्य मे। सन्दर्भ देखे है । डा० हीरालाल जैन के अनुमार तो सम्भ- सतां गतिर्दीनबन्धु वमकथितस्तु नः ॥ वतः ऋग्वेदीय जनो मे केशो, अर्थात् ऋषभ वात रशना
--शि० पुराण १-४१ मनियों के प्रधान के रूप में मान्य थे। उन्होने इस सम्बन्ध
शंकर मोर ऋषभ दोनों जटाधारी है, योगी हैं, धर्ममे ऋग्वेद की निम्नस्थ ऋचा का उल्लेख किया है: शास्ता है तथा कैलाश एव वृषभ से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध
केश्यग्नि केशी विषं केषी विभति रोदसी। है तथा दिगम्बरत्व भी शंकर का एक लक्षण है। यही नहीं केशी विश्वं स्वदशे केशीदं ज्योतिरुच्यते ॥ वरन् शव तथा शाक्त परम्पराग्रो में मादिगुरु तथा आग
ऋग्वेद १०, १३६-१ मादि के सर्वप्रथम उपदेष्टा के रूप में शंकर को प्राविनाथ प्रर्थात 'केशी (ऋषभ) अग्नि, जल, स्वर्ग तथा पृथ्वी की संज्ञा से विभूषित किया गया है। शाक्ततत्रों में स्वगुरु को धारण करते है' समस्त विश्व के तत्त्वो का दर्शन कराते को श्रीनाथ कहा गया है।