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________________ प्रावि जिन, शिव एवं शेष परम्परा शरीर मे गुरु की स्थिति सहस्रार में मानी गयो है दिया जा सकता है। कुछ विद्वानों ने शिवपूजा का मूल. (महस्रारे महापद्म करधवलो गुरु) । जैन देव प्रति- प मिन्धु संस्कृति के अवशेषों में माना है, परन्तु यह केवल मानो के मुकुट या मुकुट के ऊपर प्रकित लघु जिनविम्ब मनुमान मात्र है, किन्ही ठोस प्रमाणो पर प्रात नहीं। शायद तीर्थकर का गुरुत्व ही दर्शाता है। लगता है कि हाल मे विख्यात पुराविद् डा० हंसमुख धीरजलाल प्राचार्य जिनसेन ऋषभ एवं शिव के समान लक्षणों से साकलिया ने सिन्धु सभ्तता के कुछ स्थलों से प्राप्त लिंगाअवात थे। तभी तो उन्होने अपने जिन सहस्रनाम का कृति पत्थरों के शिवलिङ्ग होने में पूर्ण शका व्यक्त की। प्रारम्भ इन शब्दों से किया है : वैदिक साहित्य विशेषकर यजुर्वेद मे शंव सम्प्रदाय श्रीमान् स्वयम्भूवृषभ: शम्भव. शम्मरात्मभूः। का मूल विद्यमान है, किन्तु परवर्ती पौराणिक शैव मत स्वय प्रभः प्रभुभोक्ता विश्वभरपुर्नभवः ॥२॥ से यह काफी अलग है। ऐतिहासिक युग में शैवमत के इस प्रकार की प्रतिध्वनि वप्पट्टि सूरि कृत शारदा. पुनरुत्थान का श्रेय लकुलीश नामक माहेश्वराचार्य को स्नोत्र में भी मिलती है : दिया जाता है। लकुशील पाशुपत सम्प्रदाय का जन्मदाता जिनपतिप्रथिताखिलवाङ्मया। था और उसका उद्देश्य पशु (जीव) की रागात्मक गणधरानन मण्डपनर्तकी ॥ प्रवृत्तियों (पाश) का उच्छेद कर उसे मोक्षमार्गी बनाना गुरुम्ग्वाम्बुजखेलनहंसिका । था । प्राशुपत मत से ही कालान्तर मे अन्य शैव सम्प्रदाय विजयते जगति श्रनदेवता ॥३॥ तथा शाक्त विचारधारा का विकास हुपा। इतिहासकारो सम्भवन जैन परम्परा में सरस्वती (शारदा=श्रुत- ने विविध प्रमाणो के आधार पर लकुलीश को एक ऐतिदेवता) की कल्पना जिनवाणी के रूप मे काफी पहले से हासिक पुरुष माना है और उसकी तिथि ईसवी सन् के की गई थी। इसका प्रमाण मथुरा (ककाली टीला) से प्रारम्भ के आस-पास स्थिर की है। मथुरा लकुलीशप्राप्त कुषाण कालीन जैन सरस्वती की लेखाङ्कित प्रतिमा पाशुपत प्राचार्यों का प्रारम्भिक काल मे मुख्य केन्द्र था। है। यह अभी तक प्राप्त सरस्वती की मूर्तियो मे से इसकी पुष्टि मथुरा के ही एक गुप्तकालीन अभिलेख, प्राचीनतम है। इसमें उत्कीर्ण लेख के अनुसार, इस प्रतिमा से होती है जिसमे पाशुपत गुरु-परम्परा का उल्लेख है। का दान धानुकार गोव ने वाचक (घमं-व्याख्याता) प्रार्य इस सन्दर्भ मे यह बताना उपयुक्त ही होगा कि हस्तहस्तिन के शिष्य वाचक प्राय्यं देव की प्रार्थना पर पाशुपत मत की स्थापना के पूर्व ही मथुरा जैन धर्म का किया था। गुप्तयुगीन संस्कृत कोश 'नामलिङ्गानुशास- उत्तर भारत में एक प्रधान केन्द्र बन चुका था; तो क्या नम्' या अमरकोश मे सरस्वती को वाणी या भाषा का यह सम्भव नहीं था कि वह जैन मान्यताप्रो और विश्वासो पर्याय माना है और कालान्तर मे शाक्त उपासको ने देवी से प्रभावित हो। लकुलीश पाशुपतों ने शिव को एक को शब्दब्रह्ममयी कहा (शब्दब्रह्ममयी परात्परमयी ज्यो- अनठे रूप में प्रस्तुत किया था। यह था शिव का शास्ता तिर्मयी वाङ्मयी)। अभिनवगुप्त ने तो यहां तक कह या गुरु रूप । इसी रूप में शकर ने भागमादि शास्त्रों का डाला है कि 'हे देवी ससार मे कौन मी ध्वनि (वाङ्मय) उद्घोष किया था। चतुमुख लिङ्ग शिव का यही रूप तुम्हारी स्तुति नही है क्योकि तुम्हाग सम्पूर्ण शरीर ही दर्शाते है और शिव लिङ्ग का यह स्वरूप मथुरा की शब्दमय है (तब च का किल न स्तुतिरम्बिके ! सकल प्राचीन चतुजिन युक्त सर्वतोभद्रिका प्रतिमानो से प्रेरित शब्दमयी किल ते तनुः) । है। चतु:जिन संघार शायद मूलतः मानस्तम्भो के शीर्ष के प्रश्न उठता है कि क्या ब्राह्मण परम्पराम्रो का इस रूप में स्थित थे और शायद इन्हे पुनीत जिनवाणी के प्रकार का विकास जैन विचारधारा से किसी प्रकार चहिक प्रसार का प्रतीक मrat चतुर्दिक प्रसार का प्रतीक माना गया था। स्तम्भ या प्रभावित है या नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर शैव सम्प्रदाय दण्ड शिव का भी प्रतीक कहा गया है। यही नही स्वयं के ऐतिहासिक विकास का विवेचन करने के बाद ही (शेष पृ० २१ पर)
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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