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________________ १८, वर्ष ३२, कि० १.२ प्रनेकान्त वान पर्वत स्थित है और मध्य में विजयाघ पर्वत । पूर्व में भगवान प्रादिनाथ ने सूदीर्घकाल तक तप किया। गंगा नदी बहती है और पश्चिम में सिन्धु नदी। इससे अनेक दुस्सह परिषह सहे और अन्तत: केवलज्ञान प्राप्ति उत्तर भारत के तीन खण्ड हो जाते हैं। दक्षिण भारत मे के बाद सहस्रो वर्षों तक प्राणीमात्र को मुक्ति मार्ग का भी पूर्व, मध्य और पश्चिम दिशामों में तीन खण्ड है। सदुपदेश देते रहे। पुराणों में भारत के ये ही छह खण्ड वणित है जिन्हे जीत जिस प्रकार ऋषभदेव आदि तीर्थकर हुए, उसी कर कोई सम्राट् चक्रवर्ती उपाधि प्राप्त करता था। प्रकार उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत प्रादि चक्रवर्ती हुए। भरत मादि तीर्घकर ऋषभदेव :- उल्लेखित त्रेमठ शलाका प्रत्यन्त पराक्रमी, धैर्यशील, सुयोग्य नीतिज्ञ एव प्रत्यन्त पुरुषो मे प्रादि पुरुष प्रादि तीर्थंकर ऋषभदेव थे। इन्ही चरित्रवान व्यक्ति थे। वे संसार मे रहते समय भी सदा से जैनधर्म का प्रारम्भ हुआ। अन्तिम कुलकर नाभिराय जल में कमल की भाति निलिप्त ही रहे। कभी उन्होंने पौर उनकी पत्नी मरुदेवी ही इनके पिता-माता थे । भारत चक्रवर्ती होने का गर्व नही किया। जैन पुराणों में बाहुकी प्रथम राजधानी इक्ष्वाकुभूमि-अयोध्या में ऋषभदेव का बली को वीरता और स्वाभिमान दोनों की भूरि-भरि जन्म हुमा था। अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् सराहना की गयी है और आज तक जनमानस पर भी ऋषभनाथ राजसिंहासन पर बैठे। उन्होने सर्व प्रथम वही छाप है। भरत के चक्रवर्ती पद के प्राग्रह के कारण प्रसि, मसि, कृषि, शिल्प, वाणिज्य और विद्या का छह दोनो भाइयो में युद्ध हुआ। बाहुबली विजयी होकर भी माजीविका साधनों के रूप में सूत्रपात किया। इन संसार से विरक्त होकर तप करने चले गये। बाद में साधनों की विधिवत शिक्षा भी जनता को वी। कर्म की भरत के कारण ही बाहुबली का शल्य दूर हुया और उन्हे क्षमता मोर योग्यता के आधार पर जातियों का सुवि केवलज्ञान प्राप्त हुआ। अन्ततः बाहुबलि ने मुक्ति प्राप्त भाजन भी मादिनाथ ने किया। प्रशासन के लिए प्राप की। भरत चक्रवर्ती ने भी दीर्घकाल तक राजसुख भोगा, ने गणों की स्थापना की। इससे जन-जीवन में व्यवस्था सुशासन किया और फिर श्रमण दीक्षा ग्रहण कर तप का पारम्भ हुआ। करते हुए मुक्ति प्राप्त की। भरत चक्रवर्ती नाम के आधार भगवान प्रादिनाथ के भरत और बाहुबलि नामक पर उनकी महान स्मृति को अमर रखने के लिए इस देश दो प्रसिद्ध पुत्र थे। ब्राह्मी और सुन्दरी नाम की दो का नाम भारत रखा गया। पुत्रियां भी थी। सर्व प्रथम अपनी इन सन्तानो को प्रादिनाथ ने सभी कलाय और विद्यायें सिखाई, फिर परम्परा जैन पुराणो में ऋषभदेव के पश्चात् हए अन्य तेईस से ये सभी समस्त मानव-जाति मे फैल गई। तीर्थकरों का विस्तृत जीवनवृत्त पाया जाता है। परन्तु ___ एक दिन नीलांजना नाम की राजनर्तकी की नृत्य प्रतिम चार तीर्थंकरों के अतिरिक्त अन्य किसी के तुलकरते राज-सभा में ही मृत्यु हो गयी। इस घटना से नात्मक अध्ययन का कोई प्राधार अाज तक प्राप्त नही ससार को प्रसारता और क्षणभगुरता का तीब्रतम बोध हो सका है। अतः इन चार का अर्थात नमि, नेमि, पाश्वंप्रादिनाथ को हुा । ससार से उन्होने वैराग्य ले लिया। नाथ और महावीर का यहा सक्षेप में उल्लेख करना अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को राज्य-भार सौपकर पापने संगत है। प्रादिनाथ के समान इन चार तीर्थकरो का श्रमण धर्म में दीक्षा ग्रहण की ओर विश्व के सर्व प्रथम जनतर पुराणो एवं खनन कार्यों से पर्याप्त हवाला मिला महाश्रमण बने । १. मादिपुराण में ऋषभदेव की मायु ८४ हजार वर्ष माज के मानव को यह अविश्वसनीय सा लग सकता पूर्व भौर शरीर को ऊचाई ६०० धनुष बताई गयी है। पर आज भी अनेक माश्चर्यजनक बातें होती हैं। है । एक पूर्व करोड़ो वर्षों का होता है और एक प्रजन, भीम और हनुमान का पराकम भी तो लोकोधनुष की सामान्य ऊचाई चार हाथ की होती है। त्तर ही था।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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