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जनधर्म : उदभव और विकास
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तीर्थकर नमि:
जीवन में अहिंसक वृत्ति का ऐतिहासिक परिधि के अंतर्गत कीसवें तीर्थकर नमिनाय थे। ये मिथिला के राजा प्राप्त होने वाला उत्तम उदाहरण यह ही है। महाभारत थे।हिन्द पुराणो में इन्हे राजा जनक का पूर्वज माना का काल ईसा से लगभग १००० वर्ष पूर्व या इससे कुछ गया है। नमि प्रत्यन्त शाली होते हुए भी अनासक्त वृत्ति और पहले माना जाता है। प्रतः नेमिनाथ का समय भी के थे। 'नमि की यही अनासक्त वृत्ति मिथिला राजवश में इसी के प्रासपास स्वीकार किया जा सकता है। जनक तक पाई जाती है। प्रतीत होता है कि जनक के कुल
तीर्थकर पाश्र्वनाथ : की इसी प्राध्यात्मिक परम्परा के कारण वह वश तथा
तेईसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता पर तो उनके समस्त प्रदेश विदेह अर्थात् देह से निमुक्त या जीवन
प्राज पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हो चुके है। वे एक इतिहासमुक्त कहलाया और उनकी अहिंसात्मक प्रवृत्ति के कारण
प्रसिद्ध महापुरुष के रूप में स्वीकृत भी हो चुके है । उदयही उनका धनुष प्रत्यचाहीन रूप में उनके क्षत्रियस्व का
गिरि, मथुरा, श्रवणवेलगोला प्रादि के शिलालेखों से वेद, प्रतीक मात्र सुरक्षित रहा। सम्भवतः यही वह जीर्ण
भागवत एव पुराणो से एवं अनेक ऐतिहासिक ग्रन्थों से घनुष था जिसे राम ने चढाया और तोड़ डाला।' तीर्थकर
भगवान पाश्वनाथ की ऐतिहासिकता सिद्ध की जा चुकी नमि के विषय में और अधिक प्रमाण प्राप्त नही है। है और अब यह निर्विवाद रूप से स्वीकृत भी है। पार्वनेमिनाथ: नेमि अथवा अरिष्टनेमि नामक बाईसवें तीर्थंकर नाथ इक्ष्वाकुवशाय राजा अश्वसन पोर महारानी
की सन्तान थे। महावीर से २५० वर्ष पूर्व वाराणसी में महाभारत काल मे हुए। ये श्री कृष्ण के चचेरे भाई थे।
इनका जन्म हुप्रा । तीस वर्ष की अवस्था में प्रापने श्रमण ये जैन परम्परा के अत्यन्त मान्य एवं लोकप्रिय तीर्थकर
दीक्षा ग्रहण की और सम्मेदशिखर पर्वत पर दीर्घकाल हए । इनके जीवन पर आधारित विपुल एव विशिष्ट
पर्यन्त कर्मनाशिनी पौर मुक्तिदायिनी तपस्या की। अनेक साहित्य भी उपलब्ध है। शौरीपुर के यादववंशी राजा
विघ्न-बाधामो के बीच भी पार्श्वनाथ सुमेरुपर्वत की समद्रविजय के घर महारानी शिवा के गर्भ से उत्पन्न
भाति स्थिर रहे। राक्षसी उपद्रव भी उनकी अजरामर हुए थे। समुद्रविजय के लघु भ्राता वसुदेव के कृष्ण
प्रात्मा से टकराकर चूर-चूर हो गये। केवलज्ञान प्राप्त होने दासुदेव उत्पन्न हुए। अतः स्पष्ट है कि दोनों चचेरे भाई
के सत्तर वर्ष बाद तक वे प्राणीमात्र को प्रात्मकल्याण और थे। नेमिगाथ का विवाह राजा उग्रसेन की बेटी राजल से
मुक्तिमार्ग का उपदेश देते रहे। पार्श्वनाथ की श्रमण होना निश्चित हा। जब बारात लेकर नेमि राजल को
परम्परा पर बहुत गहरी छाप पड़ी। आपने जैन सस्था ब्याहने पहुंचे तो बरातियो के भोजनार्थ बध हुए असख्य
को ठोम एव स्थायी रूप मे संगठित करने के लिए उसे पशुषों को देखकर, उनकी छटपटाहट और चीत्कार सुनकर
श्रमण-श्रमणी और धावक-श्राविका इन चार भागो में नेमिनाथ का परम हिसक हृदय तड़प उठा। वे ससार
विभक्त किया। इन चारों के कार्यक्षेत्र की सीमाए भी की इस मांसाहारीवत्ति और भोगलिप्सा के इस नारकीय
निश्चित की गयी। दृश्य को देखकर लोकोत्तर विरक्ति से भर गये। वे तत्काल वहां से लौटकर सीधे गिरनार पर्वत पर तय करने तीर्थकर नेमिनाथ के अहिंसा एव प्राचार के महोपचले गये। राजुल भी परम पतिव्रता नारी थी। जब उसे देश को पार्श्वनाथ ने प्रत्यन्त वैज्ञानिक ढग से चातुर्याम अपने भावी प्राणनाथ की विरक्ति का पता लगा, तो वह
व्यवस्था के अन्तर्गत रखा और इनके पालन के लिए भी तत्काल उनके पीछे गिरनार पहची और उन्ही से सर्वथा नयी दृष्टि भी प्रदान की। बाद में रचे गय जैन दीक्षा ग्रहण कर तपस्विनी बनी। सुदीर्घ तपश्चरण के प्रागमो और बौद्ध ग्रन्थो में भी इन चातुर्यामो का वर्णन पश्चात् तीर्थकर नेमिनाथ ने मुक्ति प्राप्त की। भारतीय किया गया है। पाश्वनाथ ने वेदविहित हिंसा के विरुद्ध
१. 'भारतीय संस्कृति मे जैन धर्म का योगदान'-लेखक डा. हीरालाल जैन, पष्ट २६ ।