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एलाचा शब्द मीमांसा
को नाम एलाचार्य था। वे चित्तौड़ (राजस्थान ) मे निवास करते थे। जैनागम साहित्य मे "एलाचार्य" नाम के अन्य विद्वानों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। पं परमानन्द शास्त्री ने "जैनधर्म का प्राचीन इतिहास" (भाग २) मे सूरस्त गण के विद्वान रविनन्दी प्राचार्य के शिष्य व तपस्वी एलाचार्य का परिचय दिया है। अपने उसी ग्रन्थ में विद्वान् लेखक ने कौण्डकुन्दान्वय के भट्टारक कुमारनन्दि के शिष्य "एलाचार्य" का भी उल्लेख किया है, जिनके शिष्य वर्धमान गुरू थे । सम्भव है कि 'एलाचार्य श्रीर 'एलवाचार्य' एक ही व्यक्ति का नाम रहा हो, जो बोलीभेद से उच्चारण में भिन्न रहा हो। दोनों का समय भी लगभग समान कहा जाता है ।
'एलाचार्य' शब्द के अर्थ का विचार करें, इसके पहले यह उचित प्रतीत होता है कि शब्द रचना की दृष्टि से मीमांसा करना उपयुक्त होगा । 'एलाचार्य' प्राकृत 'एलाइरिय' शब्द का रूपान्तरण है। प्राकृत और संस्कृत दोनों शब्द दो-दो शब्दो से संयुक्त होकर बने है, जैसे कि
१. एला
।
२. एल + आचार्य ।
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इन दोनों शब्दों में 'एल' मूल शब्द है । श्राचार्य शब्द सामान्य है। आचार्य शब्द के कई अर्थ है । प्रकरण के अनुशर वाचक होता है जैन शास्त्रों में गृहस्थाचार्य, नियापिकाचार्य, पत्राचार्य सिद्धान्ताचार्य आदि शब्दो मे सामान्य अर्थ में ही 'प्राचार्य' शब्द का प्रयोग मिलता है । जो अपने-अपने विधि-विधानों को विशेष रूप से जानते हा, विज्ञ हो, उनको सामान्य रूप से प्राचार्य कहा जाता है, जैसे कि प्रतिष्ठा की विधि भली भांति जानता हो, उसे प्रतिष्ठाचार्य कहते है। इनके अतिरिक्त छत्तीस गुणों के धारक जैनाचार्य साधु की विशिष्ट संज्ञा है । उससे यहां कोई अभिप्राय नही है। जिनागम में प्राचार्य परमेष्ठी के किसी भेद का वर्णन नही मिलता सा प्राचार्य उसे कहते है, जो पाच प्रकार के प्राचार का पालन करते है । प्राचार्य के ३६ गुण हे वारह् प्रकार के तप, छह श्रावश्यक, पाच प्रकार के श्राचार, दस प्रकार के धर्म धौर तीन गुप्तियों का पालन करने वा
'एलाचार्य' शब्द की मीमांसा करते हुए सर्वप्रथम
'एल' शब्द का विचार करना इष्ट है। यह विचारणीय है कि 'एल' शब्द' प्राकृत का है या संस्कृत का है ? इस शब्द का मूल संस्कृत प्राकृत के शब्दकोशो को पलटने से 'एल' शब्द का एक ही अर्थ लक्षित हुआ है, जो इस प्रकार है
हपरे चंदणम्पि एक्कंगं । पविसंतम्मि एमाणो ॥
हे
- देशीनाममाला १,१४४ 'पाइप्रसद्द महण्णव' मे 'एल' शब्द के दो अन्य प्रथं मृगो को एक जाति, भेड़ । ये दोनों ही प्रथं सस्कृत से प्रागत प्रतीत होते है। प्राकृत मे यह एक देशी शब्द है जो का वाचक है। दूसरे शब्दो मे कुशल श्राचार्य को 'एलाइरिय' या 'एलाचार्य' कहा जाता था । यह शब्द भारतीय प्रार्य भाषाओं के विकास काल मे प्रयुक्त नही होता था। किसी प्राचीन परम्परा से आगत शब्द है । इस शब्द की रचना प्रवृत्ति यह रही है कि चाहे प्राकृत हो, चाहे संस्कृत दोनो मे समान रूप से एक जैसी रूप-रचना में इसका प्रचलन रहा है जैसे कि एलाचार्य, वालाचार्य कालकाचार्य प्रादि
एलो कुसले एक्को एलोप्य एमप्यहूदि
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मूल शब्द भी एक जैसी रचना की समानता को घोषित करने वाले है; जैसे कि एल, वेल, फेल प्रादि । 'एल' शब्द से 'य' स्वाधिक प्रत्यय जुड़ कर प्राकृत में 'एलय' तथा संस्कृत में 'क' स्वार्थिक प्रत्यय संयुक्त होकर 'एलक' मद की रचना हुई। जैन शास्त्रों में 'ऐलक' मोर 'क्षुल्लक' दोनो शब्द 'बाल' या 'लघु' पर्व में प्रयुक्त होते है ।
केवल एलाचार्य, बालाचार्य ही नही हेलाचार्य, कूवि लाचार्य, गोल्लाचार्य, तुम्बुलचार्य, तोरणाचार्य, उग्रदित्याचार्य तथा महावीराचार्य जैसे नाम भी जैन इतिहास मे मिलते है। कुछ नामो के श्रभिधान का कारण उन-उन स्थानों में निवास करने वाले व्यक्ति को वहा का कहा जाता है; जैसेकि कोण्डकुन्द' (कौण्डकुण्डल) स्थान के निवासी होने के कारण धाचार्य कुन्दकुन्द को 'कोण्ड कुन्दाचार्य' कहा जाता था। इसी प्रकार 'गोल्ल' देश के राजा होने के कारण गोल्लाचार्य नाम प्रसिद्ध हो गया ।