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३४, वर्ष ३२, कि०:१२
अनेकान्त
इसी तरह, भाचार्य वीरसेन के गुरू भी किसी 'एल' ग्राम अपनी प्रवशिष्ट प्राय का विचार कर अपने शिष्य समुदाय के निवासी रहे हों, जिसके कारण उनका नाम 'एलाचार्य' को मोर अपने स्थान में जिसकी स्थापना की है ऐसे बाल पड़ गया हो।
प्राचार्य को बुला कर सौम्यतिथि, करण, नक्षत्र पौर लन जैसे कि पंचपरमेष्ठी के पदो मे 'प्राचार्य' एक पद है, के समय शभ प्रदेश में बालाचार्य को अपना गण विसजित वैसे ही पा 'एलाचार्य' भी कोई पब है ? जब मैं यह कर देते है। लेख लिख रहा हूं, तभी गुरुवर्य सिद्धान्ताचार्य पं० कैलाश- इस प्रकरण में 'बालाचार्य' कोई पद नहीं है। जैसे चन्द्र जी सिद्धान्तशास्त्री का एक लेख 'एलाचार्य पद कि बालाचार्य, युवाचार्य, वृद्धाचार्य अवस्था से सम्बन्ध कल्पना' देखने में प्राया। इस लेख में कई महत्त्वपूर्ण बातों रखने के कारण प्रयुक्त होने वाले शब्द हैं, वैसे ही वहां का उल्लेख किया गया है। प्रयम यह 'प्राचार्य कुन्दकुन्द पर जिसने अभी-अभी गण को सम्हाला है, वह 'बालाचार्य' को और वीरसेन स्वामी के गुरु को उनके विशिष्ट गुणों कहा गया है। वास्तव मे पद तो 'माचार्य' का है, 'बाल' के कारण यह पद दिया गया था, यह कहा लिखा है ?' शब्द तो दशा का वाचक है। गण की परिपाटी चलाने के (जैन सन्देश, पृ० २४६) ।
लिए इस विधि का निर्देश किया गया है। जैसे बालमुनि, दूसरे, टीका ग्रन्थों में 'एलाचार्य' और 'बालाचार्य' वृद्धमनि का व्यपदेश किया जाता है, उसी प्रकार बालासमान अर्थ में प्रयुक्त हुए है। तीसरे, जब कोई प्राचार्य चायं या एलाचार्य समझना चाहिए। समाधि प्रहण करता है, तो वह अपने योग्य शिष्य को 'भगवती माराधना' की माथा २७५ की मूलाराधना प्राचार्य बनाता है। समाधि का काल बारह वर्ष तक है। टोका ये 'दिसं' का अर्थ 'एलाचार्य' किया गया है किन्तु इतने लम्बे काल तक यदि प्राचार्य जीवित रहते है, तो विजयोदया' में 'दिस प्राचार्य' कह कर प्राचार्य अर्थ किया उनके द्वारा स्थापित प्राचार्य एलाचार्य या बाला वार्य गया है। वास्तव में क्या शब्द-रचना की दृष्टि से, क्या शब्द कहलाता है । (वही, पृ० २५.) ।
से और क्या अर्थ से प्राकृत का 'एल' शब्द संस्कृत 'बाल' यह निश्चित है कि 'एलाचार्य' के पद के सम्बन्ध मे का वाचक है। दोनों के मूल भाव में प्राज भी 'प्रज्ञानता' 'भगवती पाराधना' और 'मूलाचार' ग्रन्थों में मुख्य रूप का भाव छिपा हुआ है। प्रागम में बाल प्राचार्य ही नहीं से विवरण मिलता है । यहा पर निम्नलिखित उद्धरणो के ज्ञानघाल और चारित्रवाल का विवरण भी मिलता है। प्राधार पर सक्षिप्त विचार प्रस्तुत है :
उक्त अभिप्राय का समर्थन निम्नलिखित गाथा से भी (१) 'मनुगुरोः पश्चात् दिशति विधत्तं चरणक्रम- होता है। कहा हैमिश्यनुदिक एलाचार्यस्तस्मै विधिना।'-मूलाराधना भा०
प्रागमदो जो बालो परियारण व हवेज जो बालो। १, बा. १७७ की टीका।
तस्स सगं दुवरियं पालोचेदूण बालमदी ।। अर्थात्-गुरू के पश्चात् जो मुनि चरित्र का क्रम
-मूलाराधना, गा० ५९८
जो मनि मागम से बाल है अर्थात् जिसको पागम का मुनि और प्रार्यादिक को कहता है, उसको अनुदिश अर्थात्
ज्ञान नही है तथा जो चारित्रबाल है अर्थात् चारित्र भी एलाचार्य कहते है। अनुदिश का अर्थ क्या है ? यह भी
जिसका श्रेष्ठ नहीं है उसको वाल कहते हैं। ऐसे मुनि के उसी ग्रन्थ से जानना चाहिए। कहा है
पास जाकर लोई कल्पज्ञानी मुनि अपने दोषों को पालोकाल संभाविता सव्वगणमणु दिस च वाहरिय।
चना करता है। सोमतिहिकरणणखतविलग्गे मगलोगास ।।
यथार्थ में प्राकृत के 'एल' और संस्कृत के 'एलक'बा - मूलाराधना, गा० २७३
'एला' अथवा लक' शब्द में अर्थ मेद होने पर भी मूल इस गाथा की विजयोदया टीका में लिखा है
भाव में कोई असर नही है। सस्कृत में 'एला' इलायची को 'सध्वगणं सवंगणं अणु दिस च बालाचार्य च । वाइरिय
कहते है। यह अर्थ उसके लघु प्राकार के कारण प्रसिद्ध ध्याहृत्य ।' (पृ० ४५२)।
000 भाव यह है कि सल्लेखना के लिए उद्यत प्राचार्य
२४३, शिक्षक कालोनी, नीमच (म०प्र०)