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________________ श्रमण संस्कृति का उदात्तदृष्टिकोण मानव समाज में जब वैचारिक हास प्रा जाता है, तब उसमें संकीर्णता का प्रवेश होता है और उसकी चिन्तन धारा का उदास दृष्टिकोण संध केवलके में दिग्भ्रान्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में विशेष रूप से जाति और धर्म ही सीता के प्रवेश द्वार हुआ करते हैं। जाति और धर्म के प्रति दुराग्रह या ठाग्रह ही वैचारिक सकीर्णता को जन्म देता है। इस संदर्भ में श्रमण-संस्कृति का दृष्टिकोण इसलिए उदास है कि यह वैचारिक संकीर्णता का सर्वथा प्रत्याख्यान करती है । श्रमण संस्कृति घोर वैदिक संस्कृति के बीच ऐति हासिक दृष्टिकोण से कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। ये दोनों संस्कृतियां चक्रगति के अनुक्रम से समय-समय अपनी सत्ता स्थापित करती रही है। जिस संस्कृति में जितनी कि वैचारिक उदारता रहेगी, अधिक उसकी सत्ता उतनी ही अविचल प्रोर लोकादृत होगी । अधुना श्रमण संस्कृति के प्रति अत्यधिक लोकाग्रह का कारण उसकी वैचारिक उदारता ही है। कोई भी संस्कृति मानव-जिजीविषा की पूर्ति के साधनों की प्राप्ति के उपायों का समर्थ निर्देश तभी कर सकती है, जब कि वह वैचारिक दृष्टि से अपने को कभी अनुदार नही होने देती। इसीलिए, जनकल्याण के निमित्त वैचारिक उदारता की शर्त आवश्यक ही नही, अनिवार्य मानी गई है। लोहमार्ग का नेतृत्व वही कर सकता है। जो विचार से उदार होता है और प्राचार की दृष्टि से 'प्रात्मनेपदी' जो प्राचार की दृष्टि से केवल 'परस्मैपदी' होता है, उसका विचार या प्राचार कभी लोकशाप नही होता । इसीलिए, सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति में श्रात्मचिन्तन को सर्वोपरि महत्व दिया गया है। उदारवादी दृष्टि से यह स्पष्ट है कि प्रात्मचिन्तन का सम्बन्ध प्रात्म-संयम या श्रात्मनियन्त्रण या श्रात्मदमन से जुड़ा हुआ है। भ्रमण तीर्थकर भगवान् महावीर ने श्रात्मदमन को बड़ा कठिन बताया है। उन्होंने कहा है : अप्पाचे दमेव प्रप्पा हु खलु दुद्दम । प्पा दन्तो सुही होइ सि लोए परस्य य ॥ - ( उत्तरा०, १०१५) D प्रो० श्री रंजन सूरिवेद पढ़ना निश्चय ही दुर्दम घारमा का दमन करने वाला व्यक्ति ही इस लोक और परलोक में सुखी होता है । प्रारमदमन आत्मपीडन का पर्याय है। बात्मा के धनुकूल वेदनीय सुख है और प्रतिकूल वेदनीय दुख तीर्थंकर पुरुष चूंकि स भूतहित के प्राकांक्षी होते है, इसलिए वे प्रतिकूल वेदनीयता पर विजय पाने के निमित्त भात्मदमन या भात्मपीड़न करते हैं, अर्थात् परजान के लिए प्रतिकूल को अनुकूल बनाकर पात्मसुख धनुभव करते हैं और सही मायने में उदार व्यक्ति वही होता है, जो पल के विनाश के लिए प्रात्मदुःख के वरण करने में ही सुख का अनुभव करता है। इसीलिए 'वसुदेवहिण्टी' के 'धम्मिल चरित' मे धर्म की परिभाषा करते हुए संघदासगणिवाचक ने कहा है- 'परस्स दुक्खकरणं घमोत्ति ।' इस प्रकार, सम्पूर्ण धामण्य संस्कृति पर दुःख को विनाशमूलक उदारता की उदात्त भावना से श्रोतप्रोत है । भगवान् महावीर के पंचयाम धर्म में श्रमण संस्कृति के उदात्त दृष्टिकोण का ही भव्यतम विनियोग हुआ है । महिमा, सत्य, अस्तेय, बानयं और अपरिग्रह ये पत्रों साधारण जन जीवन को उदात्त दृष्टिकोण से सबलित करने वाले ऐसे विचार-बिन्दु है, जिनसे सम्यक दर्शन, सम्पक ज्ञान पोर सम्यक्चारित्र की उपलब्धि सम्भव होती है और मोक्ष का मार्ग उद्घाटित होता है। । लोकपणा या लोकहित श्रमण संस्कृति के उदात्त दृष्टिकोण का महनीय पक्ष है। चाधुनिक लोकदृष्टि इस लिए अनुदार हो गई है कि वह हिंसा, असत्य, चोयंवृति, कामला और सपति से माकात है अनुदारता ही संकीर्ण विचार की जननी है। धाम के वकबड़ चोग श्राज वक्रजड़ दुपख्या के विष में मूर्छित है । प्रात्महित के लिए पर हित का प्रत्याख्यान उनका धर्म हो गया है। भास-पड़ोस के जलते हुए घरो के बीच अपने घर को सुरक्षित समझने का प्रमाद ही उनका श्रात्मसंस्कार बन गया है। परदु:ख के विनाश मे ग्राम को सहो न मानकर वे भ्रात्मसुख को परदुःख का कारण बनाना उचित समझते है | श्रमणसंस्कृति इसी अनुदार दृष्टि के निर्मूलन के प्रयास के प्रति सतत मास्याशील है ।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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