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________________ एलाचार्य : शब्द-मीमांसा डा० देवेन्द्रकुमार शास्त्री, नीमच (म.प्र.) [प्रत्येक लेखक अपने विचारों के लिए स्वतन्त्र होता है । प्रस्तुत लेख के विद्वान् लेखक ने भी अपने स्वतन्त्र विचार व्यक्त किये हैं । यह आवश्यक नहीं कि सम्पादन-मण्डल लेखक के सभी विचारों से सहमत हो।-सम्पादक] प्रत्येक भाषा के शब्द रूपो के निर्माण के अपने कुछ (३) "एदेण वयणेण सुत्तस्म देसभासियत जेण जाणानियम होते है । उन नियमों के अनुसार ही उसकी शब्द. विद नेण च उण्ह गईण उतुच्चारणाबलेण एलाइसम्पदा का वैभव वृद्धिगत होता रहता है। उस सम्पत्ति रियपसाएण य मेमकम्मापा ग्रूवणा कीरदे।" को देख कर हम किसी भी युग में उस भाषा की शब्द. __ - -कषायपाहुड, भा० ४ १० १६६ । सामर्थ्य, शब्द-निर्माण की क्षमता, रूपगत विकास एव (४) "एत्थ एलाइरियवच्छयस्म णिच्छयो ..." प्राकृति का निर्णय कर सकते हैं। इसी सन्दर्भ में प्रस्तुत - जयधवला, प्रे० १० १९५३ । "एलाचार्य" शब्द का विचार करना ही हमे इष्ट है। (५) "एत्थ ण बाहइ जीव्ममेलाइरिवच्छतो अलद्धोवजैन समाज का बौद्धिक वर्ग यह भली भांति जानता देसत्तादो, दोण्हमेकसा बाहाणवलम्भादो। है कि जब से उपाध्याय मनिश्री विद्यानन्द जो को 'एला. __-कषायपाहुड, भा० १, पृ० ८१ । चार्य" पद से विभूषित किया गया, तब से इस शब्द की (६) काले गते कियत्यपि ततः पुनश्चित्रकूटपुरवासी। मोर सभी का ध्यान आकृष्ट हमा है। जिन्होंने कभी श्रीमानेलाचार्यो बभूव सिद्धान्ततत्वज्ञः ।। "एलाचार्य" नाम तक नही सुना था, वे भी इसके विषय तस्य समीपे मकलं सिद्धान्तमधीत्य वीर सेन गुरुः । मे जिज्ञासा रखते है । कई लोग पूछ चुके है कि यह कौन उपरितम निबन्धनाद्याधिकारानष्ट च लिलेख ।। सा पद है ? तथा "एलाचार्य" का मतलब क्या होता है ? - इन्द्रनन्दि श्रुतावतार, श्लो० १७७, १७८ । सर्वप्रथम हमे यह देखना है कि "एलाचार्य' शब्द इनके अतिरिक्त, "कषायपाहुड" मे "एलाइरिय" किन-किन ग्रन्थों में पाया है ? यह तो निश्चित है कि शब्द कई स्थानो पर मिलता है । प्राचार्य वीरसेन स्वामी प्राकृत तथा संस्कृत दोनों भाषाओं में रचित जिनागम में ने स्वय मतभेदो का उल्लेख करते हुए स्पष्ट रूप से निर्देश उक्त शब्द का प्रयोग हुमा है । मूल ग्रन्थों के उद्धरण इस किया है कि भट्टारक एलाचार्य के द्वारा उपदिष्ट व्याध्यान प्रकार हैं समीचीन होने के कारण ग्रहण करने योग्य है । उनके ही एलायरियस्स दिणाण दस, मायरियस्स पण्णरस दिवसा। शब्दों में--- छिज्जति परगणगयस्स, पुण सपण्णस्स वीसदिणा ॥ "तदो पुवुत्तमेलाइरियमडारएण उवइट्ठवक्खाणमेव -प्रायश्चित्त ग्रन्थ गा० २५७ पट्ठाणभावेण एत्थ घेतव्य ।" (१) एलायरियस्स दिणाण..... छेदपिंड, गा० २५१ । -कषायपाहुड, भा० १, पृ० १६२ । (२) जस्साएसेण मए सिद्धांतमिदं हि अहिलहुदं । उक्त सभी प्रसगो को ध्यान से देखने पर स्पष्ट है मह सो एलाइरियो पसियउ वरवीरसेणस्स ।। कि “छेदपिण्ड" को छोड़ कर सभी स्थलों पर "एलाइ. -घवला टीका, पुस्तक १६, मन्स्यप्रशस्ति, गा.१ रिय" शब्द अभिषानवाचक है। प्राचार्य वीरसेन के गुरु
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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