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४४, वर्ष ३२, कि.३-४
अनेकान्त
जैन धर्म के पांच व्रत प्रसिद्ध है : अहिमा, सत्य, प्रचौर्य, प्राणीमात्र के एक स्वामी थे। उन्होंने प्राकाश सहित पृथ्वी भनेकान्त पौर अपरिग्रह । इनका सर्व देश पालन श्रमण करते को धारण किया। हैं और एक-देश गृहस्थ पालता है । प्रतः श्रमणों के व्रतों उघर महाभारत, शान्तिपर्व अ० ३४६ मे हिरण्यगर्भ को महावत और गृहस्थो के व्रतो को प्रणुव्रत कहते हैं। को योग का वक्ता कहा हैभगवान ऋषभदेव से लेकर महावीर पर्यम्त चौबीस "हिरण्यगर्भः योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ।" तीपंडों ने गहवास छोड़कर श्रमण धर्म को मनोकार प्रर्यात हिरण्यगर्भ योग-मार्ग के प्रवर्तक है अन्य कोई उनसे किया था।
प्राचीन नही है, तो क्या ऋषम ही तो हिरण्यगर्भ नही है ? श्रीमदभागवत में ऋपभदेव का जो चित्रण है वह भी भगवान ऋषभ इक्ष्वाकुवंगी थे। इक्ष्वाकु मूलतः पुरु जैन मान्यता का ही समर्थन करता है । उसमे उनकी गजामा को एक परम्परा थो। यद्यपि ऋग्वेद मे पुरुषो को तपस्या का वर्णन करते हुए कहा है -उम समय के बल सरस्वती के तट पर बनाया है। किन्तु नतर इवाकूमों शरीर मात्र उमके पास था और वे दिगम्बर बेश मे नग्न का सम्बन्ध प्रयोध्या में था। जैन शास्त्रो में अयोध्था का विचरण करत थे। मोन मे रहने थे । काई डगये मार, ही ऋषभदव का जन्म स्थान माना गया है। उधर कार थके, पत्थर फेक, मूत्र-विष्टा फकता इन मबका साम्पायन धोत्र मुत्र में हिरण्यगम को कौशल्य कहा है। भार ध्यान नही देते थे। यह शरीर असत् पदार्थों का घर ।
अयोध्या का काशल देश में कहा है । अत: कोशल देश में मा समझकर पहकार-ममकार का त्यान करक प्रकल जन्म लन सपनदेव का कोशध्य कहा जा सकता है। श्रमण करते थे। उनका कामदेव के समान सुन्दर शगर इस तरह कयानक वक्ता हिरण्यगम के साथ योगी ऋपभ मलिन हो गया था, प्रादि ।
की एकरूपता अन्वेषणीय है। इसी में यह भी कहा है कि वातरशन श्रमणों के धर्म का
धर्म का मिन्धु घाटी क उत्खनन के सहयोगी रामप्रसाद चदा
... उपदेश देने के लिए उनका घवतार हुपा। जन्महीन ने अपने तक लेख में लिया
ने अपने एक लेख में लिखा है-'माहन जोदड़ो से प्राप्त ऋषभदेव जी का अनुकरण करना तो दूर अनुकरण करने लाल पापाण की मूति, निमे पुजारी की मनि समझ लिया का मनारथ भी कोई अन्य योगो नही कर सकता, क्यो कि
गया है, मुझे एक योगी की मूर्ति प्रतीत होती है पोर वह
मा जिस योगवल को ऋषभ जी ने प्रसार समझकर ग्रहण नहीं मझ दम निस्कर्ष पर पहचने के लिए प्रेरित करती है कि किया. अन्य योगी उसी के पाने की चेष्टाय करने है। मिन्धुपाटी में उस समय योगाभ्यास होता था और योगी
जैन ग्रन्थो में ऋषभ को हिरण्य गर्भ भी कहा है क्यो की मुद्रा में मूर्तियां पूजी जाती थी। मोहे-जोदडो पोर कि उन के गर्भ में पाने पर माकाश से स्वण को वर्षा हुई हरप्पा से प्राप्त मोहरे, जिन पर मनुष्य रूप में देवो की थी। यथा
प्राकृति प्रकित है, मेरे इस निष्कर्ष को प्रमाणित करती है। 'गद्रियम्य जस्स उ हिरण्णवुटी सकवणापडिया।
मिन्धुघाटी में प्रा मोहरो पर बैठी अवस्था मे तेण हिरणगम्भो जयम्मि उवगिज्जए उसभी ।।
अकित मूर्तियाँ हो योग को मुद्रा मे नहीं है किन्तु खडी प्रर्थात जिसके गर्भ में पाने पर सुवर्ण की वष्टि हुई अवस्था में अकित मूतिया भी योग की कायोत्सर्ग मृद्रा को उसी में ऋषभ जगत मे हिरण्यगर्भ कहलाये।
बतलाती है। मथग म्यूजियम मे दूसरी शती की कायोत्सर्ग ऋग्वेद मं० १०, मूत्र १२१ को पहनी ऋचा इम। में स्थित एक ऋषभदेव जिन की मूर्ति है। इस मूर्ति की प्रकार है
शैली मिन्धु से प्राप्त मोहरो पर अक्ति खड़ी हुई देव 'हिरण्यगर्भ समवन्ताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक प्रासीन । मूर्तियो को गनी से बिल्कुल मिलती है। सदाचार पृथिवी द्या मुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ऋषभ या वृषभ का प्रथं बल होता है और ऋषभदेव
इस में कहा गया है कि पहले हिरण्यगर्भ हुए। वह तीर्थदर का चिह्न बल है। मोहर नं ३ से ५ तक के ऊपर