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________________ श्रमण परम्परा की प्राचीनता ४५ अकित देवमूर्तियो के साथ बल भी अकित है जो ऋषभ का उक्त तथ्यों के प्रकाश में जैन धर्म के प्रथम तीर्थडुर पूर्णरूप हो सकता है। योगी ऋषभ देव का स्थिति पुरातत्वज्ञो के लिए अन्वेषण इसी पर डा. राधाकुमद मकर्जी ने अपनी हिन्दू का रुचिकर विषय हो सकती है, और उनकी स्थिति सभ्यता नामक पुस्तक मे लिखा है - 'श्री चन्दा ने ६ प्रन्य स्पष्ट होने पर श्रमण परम्परा के उदगम पर भी प्रकाश महरो पर खड़ी हई मूर्तियो की भोर भी पान दिलाया पड सकता है। श्रीमद् भागवत में जो 'वातरशनना श्रमणाहै । फलक १२ पोर ११८ प्राकृति ७ (माशलकृति, मोहे नामषीणा' प्रादि लिखा है ये शब्द अनुसन्धान की दृष्टि से जोदडो) कोयत्म नामक योगामन मे बड हये देवताप्रो महत्व के है। को सूचित करती है। यह मद्रा जैन योगियों की तपश्चर्या नतिय प्रार. में भी इसी प्रकार कहा है-'बात मे विशेष रूप से मिलती है, जैसे मथुरा मग्रहालय में रशनाह ऋषयः श्रमणा उध्वंपन्थिनो वभुवः' (२-७)। स्थापित तीर्थदर श्री ऋषभदेव की मूर्ति मे ऋषभ का ऋग्वेद (१०-१३६-२) मे भी मुनियो के जिए वातअर्थ है बैल जो प्रादिनाथ का लक्षण है। महर सख्या रशना कहा है । अथर्ववेद (२।५।३) मे इन्द्र के द्वारा एफ० जी० एच. फलक दो पर अकित देवमूर्ति मे एक यतियो का वध किये जाने को कथा पाती है। यह कथा बल ही बना है। मम्भव है यह ऋषभ का ही पूर्वरूप हो। एतेश्य प्रा० (७-२८) पोर पञ्चविमा० (१३१४१७, यदि ऐमा हो तो शैवधर्म की तरह जैन धर्म का मून भी ८१४४) मे भी प्राई है। सायण ने अपने भाष्य में ताम्रयुगीन सिन्धु सभ्यता नक चला जाना है। (हि. स० लिखा है२३-२४) यतिनं यतयो नाम नियम घोला प्रामुर्या प्रजा ।... यद्वात्र यति शब्देन वेदान्तायं विचार शन्या: परिव्राजका विवक्षिता । (अर्थव०), अर्थात् यति माने प्रत नियम का 'अनेकान्त' के स्वामित्व सम्बन्धी विवरण पालन करने वाले असुर लोग । अथवा यहाँ प्रति शब्द से वेदान्न के विचार से शन्य परिव्राजक लेना चाहिए । प्रकाशन स्थान-वीर सेवामन्दिर, २१ दरियागज, नई दिल्ली पंचविश ब्राह्मण की व्याख्या में सायण ने एक स्थान मद्रक-प्रकाशन-वीर सेवा मन्दिर के निमिन पर यति का अर्थ 'यजनविरोधी जना:' किया है अर्थात् इन्द्र प्रकाशन अवधि-मामिक श्री प्रोमप्रकाश जैन ने जिन यतियो को मारा वे मव यज्ञयागादि विरोधी पौर राष्ट्रि कता-भारतीप पता-२३, दरियागज दिल्ली-२ वेद विरुद्ध व्रतनिवयादि का पालन करने वाले थे। । ऋग्वेद के वातरशन मनि, तं० प्रा० के वातरशन मम्पादक- श्री गोकुलप्रमाद जैन श्रमण भिन्न प्रतीत नही होते। वे ही सम्भवतः यति भी राष्ट्रिकता-भारतीय पता-वीर सेवा मन्दिर २१, हो। श्रीमद भागवत में उन्ही वातरशन थमणों के धर्म के दरियागज नई दिल्ल-२ माथ ऋषभावतार को जोडा गया है। यह प्राकस्मिक | स्वामित्व धोर मेवा मन्दिर, २१, दरियागंज, नई दिल्ली-२ प्रतीत नही होता। इन सबके प्रकाश में श्रमण परम्परा की मैं, मोमप्रकाश जैन, एतद्वारा घोषित करता हूं कि प्राचीनता के दर्शन होते है। उमी परम्परा को भगवान मेरी पूर्ण जानकारी एवं विश्वास के अनुसार उपर्युक्त महावीर ने प्रपनाकर प्राज से २५०५ वर्ष पहले पावा से विरण सत्य है। निर्वाण लाभ किया था। हैम उनकी उम शुद्ध-बुद्ध मात्मा -प्रोमप्रकाश जैन, प्रकाशक को नमन करके अपनी श्रद्धाजलि अर्पित करते है । -
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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