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ध्यान विषयक महत्त्वपूर्ण जैनग्रंथ ध्यानशतक और उसके विविध संस्करण
श्री अगरचन्द नाहटा, बीकानेर
[यह द्यावश्यक नहीं कि सम्पादन मण्डल विद्वान् लेखक के सभी विचारों से सहमत हो सम्पादक ]
जंन बागमो से यह तो
विदित है कि भ० महावीर की साधना का मुख्य केन्द्र 'ध्यान' था । साढ़े बारह वर्षों के साधना काल मे उन्होंने अधिक से अधिक समय ध्यान श्रोर मौन मे बिताया था । उन्होने ध्यान करते-करते ही कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था और अपने साधु-साध्वियों के लिए, पाठ प्रहर में से चार प्रहर स्वाध्याय, दो प्रहर ध्यान, एक प्रहर निद्रा, एक प्रहर बाहार आदि शारीरिक मादि शारीरिक कार्यों के लिए निहित कार्यों के लिए निहित किए थे। ग्राम्यतरिक तप मे भी उन्होंने स्वाध्याय
और ध्यान को तप में सम्मिलित किया है। छह भाववयकों मे भी कामोत्सर्ग-ध्यान नित्य करने को एक प्रावश्यक कार्य बतलाया गया है । खेद है भागे चलकर ध्यान की वह परम्परा जैन धर्म मे कम होती गई । बौद्ध धर्म मे आज भी ध्यान का एक स्वतन्त्र सम्प्रदाय विद्यमान है, जिसकी एक प्रक्रिया विपासना का प्रचार श्री सत्यनारायण जी गोयन्दका श्रभी भारत मे जगह-जगह कर रहे है एवं उससे लोगो को बडी शान्ति मिलती है । समय-समय पर ध्यान की साधना करने वाले कई जैन सन्त हुए हैं और कई लेखकों ने इस विषय पर छोटे-बड़े ग्रन्थ लिखे है। जहाँ तक मेरी जानकारी है, ध्यान विषयक प्राप्त प्रथो मे सबसे पहला प्रथ ध्यान शतक" है । इसका मूलनाम ध्यानाध्ययन है । प्राकृत भाषा की एक सो पाच गाथाओं का यह ग्रंथ है । इस पर ० हरिभद्रसूरिजी सक्षिप्त टीका संस्कृत में छप चुकी है पर हिन्दी-गुजराती मे इमी प्रथ का विवेचन प्रका शित न होने के कारण साधारण जनता के लिए यह सुलभ और सहज नहीं था। इधर छह-सात वर्ष के भीतर इस ग्रंथ के कई महत्वपूर्ण संस्करण प्रकाशित हो चुके है। उनको जानकारी इस लेख मे इसीलिए दे रहा
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है कि इस विषय मे रुचि रखने वाले इन प्रकाशित सम्करणों को मगा का पूरा लाभ उठायें ।
to मान्यतानुसार इस ग्रन्थ के अन्त मे एक ऐसी गाधा मिलती है जिसमे ग्रन्थकर्ता का नाम जिनभद्र श्रमण पाया जाता है। इस नाम वाले प्राचार्य छठीसातवी शताब्दी में हो गये है, जिनके रचित विशेष भाष्य बहुत ही प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इस ग्रंथ के महत्व के सम्बन्ध में विचारक विद्वान मुनि नथमलजी ने कहा है ' इस ग्रन्थ के पढने से लगता है कि इसके रचयिता जैन-ध्यान प्रणाली के विशेष ज्ञाता प्रौर पुरस्कर्ता थे । वे स्वय ध्यान के क्रियात्मक भोर संद्धांतिक पक्ष के पारगामी विद्वान् थे ध्यान के क्रियात्मक अनुभव के बिना, इतनी सूक्ष्ममा सेनपण होना सम्भव है। जब तक ध्यान सिद्ध नही होता तब तक उसके निरूपण मे वह सूक्ष्मता या सत्यता प्रकट नही हो सकती ।" यह ग्रन्थ अपने आप मे पूरा ग्रंथ है । इस पर यदि विस्तार से व्याख्या ग्रन्थ लिखा जाय तो ध्यान के क्षेत्र मे कई नये तथ्य प्रकट हो सकते है ।"
१. मुनि खुल्लराज जी ने मुनि नयमलजी से प्रेरणा प्राप्त करके सन् १९७१ मे इसका हिन्दी एवं अग्रेजी में अनुवाद करके मूल सहित बाद साहित्य सथ, चुरू से सन् १९७२ मे प्रकाशित करवाया मूल्य १) है। उसके प्रारम्भ के 'दो शब्द' में उन्होंने इस ग्रन्थ के एक अन्य सस्करण की सूचना भी दी है।
२. "मभी-अभी प्रो. एस. के. रामचन्द्र राव ने इस ग्रन्थ पर कार्य किया है और उसको मोरिएण्टल रिसर्व इस्टीट्यूट, मद्रास से छपाया भी है। उसमें ध्यान शतक' का मूल हरिभद्र वृत्ति, प्रग्रेजी - मनुवाद घोर सक्षिप्त (शेष पृष्ठ ४८ पर )