SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 58
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५०, वर्ष ३२, कि० ३-४ अनेकांत आज समाज के अधिकाश विद्वज्जनो, पत्र-पत्रिकामो, वस्तु का-जैसी कि वह है-ज्ञान करना-कराना हो धर्मसभाम्रोएवम घर-घर में पिना पुत्र से, भाईबहिन से पति हितकर, प्रामाणिक व मत्य हो सकता है, न कि एक नय पत्नी से तथा एक धर्मबंधु इतर धर्मबधू से विभिन्न नयो की सर्वथा एकान-दृष्टि से । श्रीमदमतचन्द्र स्वामी ने द्वारा प्रतिपादित वस्तु स्वरूप के सम्बन्ध मे सर्वथा एकात पुरुषार्थसिद्ध्युपाय मे नयो की एकानपरक खीचतान करनेदृष्टिपक्ष को ग्रहणकर परस्पर में विसंवाद करता दिखाई वालो को इसी लिए चेतावनी देते हए लिखा भी है .है रा है पीर हम प्रकार दष्टिमोर वा दगग्रही बनकर "अत्यतनिशितधार दुरामद जिनवरम्य नयनकम। अपने प्रिय नय पक्ष को ही पूर्ण सत्य एव इतर पक्ष को खंडयति धार्यमाण मूर्धान झटिति दुर्विदग्धानाम् ॥" मर्वथा मिथ्या मान व प्रतिपादन कर वस्त के अनेकातमयी (अर्थात्) जिनेन्द्र का नयचक अत्यत तीक्ष्ण धारवाला स्वरूप एव उसके भगवद्वाणो द्वारा स्याद्वाद रूप प्रति- होने में बड़ी मावधानी में प्रयोग करने योग्य है : क्योकि पादन का खडन वा उपहास करने में अपनी अज्ञतावश इसकी मूर्खतापूर्ण खीचतान कर प्रयोग करने वालो के मस्तक (स्वय को सर्वज्ञ मान) तनिक भी सकोच नहीं कर रहा। को यह तुरन्त ही विदीर्ण कर डालता है, अर्थात् निश्चया अनेक विद्वज्जन भी वीतराग वाणी का बीतगग भाव भास की तेज धार से सद्ज्ञान का घात कर उसे मार्गभ्रष्ट से प्रतिपादन न करते हुए पक्षव्यामोह के कुचक्र में पड़कर कर देता है। अनेकात और स्याद्वाद को सत्यतापरक गरिमा को भलाकर तात्पर्य यह है कि जैन मिद्धान वैज्ञानिक सत्य पर प्राधाया जानवभकर अथवा अज्ञतावश (जाने-अनजान रित है और वह मत्य अनेकानात्मक है, जबकि प्रत्येक नय अनेकानमयी वस्तु स्वम्प का स्याद्वाद रूप प्रतिपादन करने यदि वह मुनय है तो वह इनग्नय मापेक्ष होकर ही सत्य का से दिनादिन विमुख होते जा रहे है । इससे कभी-कभी ऐसा द्योतक कहा जाता है और यदि वह इतर नय निरपेक्ष है, प्रतीत होने लाता है कि जैनसिद्धात या तो अन्य साख्य अर्थात् अन्य मुनय द्वारा प्रतिपादित वस्तु में विद्यमान धर्म वेदातादि दर्शनों के समान मर्वथा एकातपरक है (जैसा कि को गौण न करके उसका निषेध कर उसे झुठलाने और वे प्रतिपादन कर रहे है) और या भगवान ने जो अनेकात बंडन करने लगता है तो वह एकान मिथ्यात्व का पोपक को परमागम का प्राण तथा नयो के भिन्न विषयो सबधी दुर्न य बन जाता है। परमपूज्य स्वामी समन्तभद्र ने निम्नपरस्पर विरोध को मथन करने वाला प्रतिपादन किया है लिखित श्लोकांश द्वारा इसी तथ्य को प्रगट किया है :-- वह शायद ठीक नहीं है या फिर जैन सिद्धांत अभी अनिर्णीत “निरपेक्षा नया मिथ्या मापेक्षा यस्तु नेऽर्थकुन्।" और विवादास्पद है, जिसका निर्णय होना शायद अभी शेष (अर्थान) कोई भी नय इतर नय निरपेक्ष होकर मिथ्या बन जाता है और इतर नय मापेक्ष होकर वस्तु के स्वरूप जंनी जिस स्यादाद प्रणाली द्वारा दुनिया के मत- का प्रकाशक । मतान्तरो के सर्वथा एकात पक्षजन्य विवादो का निर्मलन भगवान महावीर ने अनेकानात्मक वस्तु को, एक नय कर सत्य और समन्वय के उदार दृष्टिकोण द्वारा द्वाग वस्नु में विद्यमान एक धर्म को मध्य तथा ग्रेप धर्मों साप्रदायिकता का विनाश एव विश्वबन्धुत्व की भावना के को गौण (न कि निषेध) कर प्रतिपादन करने की गति प्रचार-प्रसार से मानव समाज में पारस्परिक सद्भाव एव एव नीति को ही वस्तु स्वरूप का यथार्थ बोध करानेवाला विश्व में सत्य व शाति की प्रतिष्ठा करने का दावा करने या कहा है, जैसा कि पुरुषार्थमिद्ध्युपाय के अन्तिम पद्य में रहे है, उन्हें स्वय ही एकात की तलवार लेकर परस्पर में श्रीमदमतचन्द्र स्वामी ने दरशाया है :-- प्रहार करते देखकर बड़ा खेद और पाश्चर्य होता है। "एकनाकर्पन्ती इलथयतो च वस्तुतत्त्वमितरेण । प्रत्येक वस्तु के अनेकानात्मक (निश्चय-व्यवहारात्मक) अन्तेन जयति जैनीनीतिमथान नेत्रामव गोपी।" होने से निश्चय और व्यवहार नय उसका यथा ज्ञान (अर्थात्) जिस प्रकार गापिका दहा से मक्खन निकालने कगने के साधन है, अत निष्पक्ष भाव से उभय नयो द्वारा के लिए मथानी की रम्सी के एक छोर को अपनी ओर
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy