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________________ प्राकत का बृवष्य संग्रह और उसको महत्ता खींचती व दूसरे छोर को ढील देते हुए भी पकडे रहकर, नय को प्रधानकर ग्रहण करें तो मिथ्यात्त्व के बिना चरित फिर उसे अपनी प्रोर खीचती व प्रथम को ढील देती है मोह के पक्ष से गग रहे और जब नय पक्ष को छोड़ वस्तएवं अपनी इस बारंबार की प्रक्रिया द्वारा ही मक्खन स्वरूप को केवल जानता ही हो तब उस काल श्रतज्ञानी निकालने में समर्थ होती है (यदि वह ऐसा न करे और भी केवली की तरह वीतराग के समान ही होता है ऐसा रस्सी के किसी एक छोर को पकडकर ही खीचती जाय तो जानना।"-(समयसार, पृष्ठ २०७, परथत प्रभावक दही से मक्खन नही निकल सकता) उसी प्रकार जैनी नीति मंडल द्वारा प्रकाशित-सन् १९१६) भी वस्तु विषयक एक नय पक्ष को मख्य व शेष को गौण बात असल में यह है कि वस्तु स्वय अनेकान्तात्मक या तथा पुन. शेष को मुख्य व मख्य को गौण कर वस्तु स्वरूप निश्चय व्यवहारात्मक है । तभी वह निश्चय और व्यवहार का यथार्थ प्रतिपादन व ज्ञान करने में समर्थ होती है, अन्यथा नय का विषय होकर निश्चय नय द्वारा उसके स्थाई अश को नहीं। ध्रौव्य रूप मे तथा व्यवहार नय के द्वारा उसी के अस्थायी पूज्य स्वामी जी ने इसके पूर्व ग्रंथ की प्रस्तावना में अश (पर्याय) को उत्पादश्ययात्मक अध्र व रूप में प्रतीत अपने शिष्यो को यह भी स्पष्ट किया है कि होती है। उत्पादव्ययघ्रीव्ययुक्त सत्' एवं 'सद्रव्यलक्षण' 'व्यवहारनिश्चयो य. प्रबद्धय तत्वेन भवति मध्यस्थः। इन मूत्रो द्वारा वस्तु के इस अनेकांतमयी स्वरूप का ही प्राप्नोति देशनाया. म एवफलमविकल शिष्य. ॥" तत्त्वार्थ-मूत्रकार ने प्रतिपादन किया है। "प्रपितानपिन (अर्थात) व्यवहार और निश्चय द्वारा प्रतिपादित सिद्ध.'' अर्थात् प्रयोजन वश कभी प्रयायो को गोण कर द्रव्य अनेकान्तात्मक वस्तु के स्वरूप को जानकर जो मध्यस्थ की मख्यता मे उसका (वस्तु का) नित्य (ब्रोव्य) रूप कथन बना रहता है-किमी न य के पक्ष व्यामोह में न ही पडता- और कभी पर्यायो की मुख्यता से द्रव्य दष्टि को गौण कर वही शिष्य भगवान की देशना के सम्पूर्ण फल को प्राप्त पदार्थ का अनित्य रूप (उत्पादव्ययान्मक) कथन कर वस्त करता है, अर्थात् सम्यक ज्ञानी बनकर आत्म कल्याण का में कथचित नित्यता और अनित्यता की मिद्धि होती है, पात्र होता है, एकाती नही। किन्त हम प्राज मताग्रही जैमी वि प्रत्येक वस्तु सामान्य विशेषात्मक या निन्याबनकर मध्यस्थ भाब का परित्याग करते जा रहे है। नित्यात्मक स्वतः सिद्ध है। न तो वम्त में नित्यता परमपूज्य भगवन् कद-कद स्वामी ने यही बात समय- असत्त है और न अनित्यता । यही बात भेद-अभेद, बद्धमार में भी स्पष्ट रूप में घोषित कर दी है । वे ग्रथ के कर्ता अबद्ध, शुद्ध-अशुद्ध प्रादि दृष्टियो में भी लागू होती है। कर्माधिकार में कहते है उदाहरण के रूप में, प्रत्येक जीव जीवत्व (चैतन्य )मामान्य "दोहषि णयाण भणिय जाण इ णवरंतु समयपडिबद्धा। की प्टि में (अजीव द्रव्य के गण पर्याय से रहित) शुद्ध ण दु णयपक्व निहदि किचिवि णयपक्व परिहीणो । निना की Tier निश्चय नय की अपेक्षा शुद्ध है, कित व्यवहार नय स (अर्थात् प्रात्मा के स्वरूप को जाननेवाला ज्ञानी दोनो कामी, क्रोधी, मानी आदि कोई स मार्ग है और कोई ही नयौ (निश्चय और व्यवहार) के कथन को केवल परमात्म्य दशा को प्राप्त अग्हत या सिद्ध है। इसी प्रकार, जानता ही है, परन्तु नय पक्ष को किचित् भी ग्रहण नही भेद-प्रभेद आदि दृष्टियों से भा वर्णन किया जाता है। करता, क्योकि वह नयो के पक्षपान से रहित (मध्यस्थ) अपने-अपने विषय को मध्य और शेप का गौण कर कथन होता है। करनेवाले इस प्रकार सभी नय सत्य है । न तो पर्याय दष्टि इस गाथा के मावार्थ में समयसार के मर्वप्रथम हिंदी से जीव का मसाग या मक्तपना झूठा है और न जीवत्व टीकाकार श्रद्धेय स्व. श्रीमान् प. जयचद जी छाबड़ा ने दष्टि से उसका शुद्ध चतन्यपना। इसी प्रकार, भेद दष्टि निम्न वाक्य लिखे हैं -- से जो मसारी है बह मुक्त नही, जो देव है वह मनुष्य एक नय की पक्ष के सर्वथा ग्रहण करें तो मिथ्यात्व नही। अभेद दृष्टि से मनुष्य भी जीव है, देव भी, तया से मिला हुआ पक्ष का राग हो तथा प्रयोजन के वश से एक ससारी भी और मुक्त भी।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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