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________________ ५२ वर्ष ३२, कि० -४ निक युग में कुछ मनीषी उत्पादव्ययात्मक पर्यायों को प्रात्मा या वस्तु से सर्वथा भिन्न व मिथ्या मान उनको बिषय करनेवाले व्यवहार नय को भी सर्वथा मिथ्या मान व घोषित कर अपने को सम्पदृष्टि मान रहे हैं। वे यहां तक मानते और दूसरो को प्रतिपादन करते है कि जो अपनी शुद्ध पर्याय को भी अपनी मानता है वह मिथ्या दृष्टि है । यह सूविरुद्ध भ्रमपूर्ण मान्यता अनेकात मिद्धात का स्पष्टतया अपलाप है । क्या कोई भी वस्तु या आत्मा कभी भी पर्याय रहित होती या हो सकती है? पर्यायें शुद्ध पौर अशुद्ध परिस्थिति के अनुसार हो सकती है और है । किन्तु वे हैं द्रव्य की ही । न तो कभी द्वत्य पर्यायों से भिन्न या शून्य होता है और न पर्यायें ही स्वतंत्र रूप में द्रव्य से भिन्न कभी और कही उत्पन्न होती या हो सकती है। पाखिर पर्यायें स्वतंत्र वस्तु न होकर द्रव्य का परिणमन ही तो हैं, जो कि वस्तु का स्वभाव है। परमपूज्य द्याचार्य कूदकूद देव ने प्रवचनसार में इसी सत्य को उद्घाटित करते हुए गाथा नं. १०१ मे स्पष्ट किया है। अनेकांत "उप्पादट्ठिदिभगा विज्जते पज्जयेसु पज्जाया । दव्वति सतिणियदं तम्हा दव्वं हवदि सव्व ।। " (अर्थात् उत्पाद स्थिति (प्रोव्य) और विनाश पर्यायो में रहते है और निश्चय करके ये पर्याय द्रव्य में रहती है। इस कारण निश्चित रूप में वे उत्पाद व्यय धीव्य मयी पर्यायें द्रव्य ही है। उपर्युक्त कथन की पुष्टि में प्रागे उन्होंने गाथा नं. १०२ से १०५ तक इसी सत्य और तथ्य को निरूपित कर और भी स्पष्टीकरण किया है। यहां साचार्य महोदय ने न केवल उत्पादव्यय-स्वरूप अशों को ही पर्याय माना है, प्रत्युत वादा को भी पर्याय ही मानकर द्रव्य को पर्यायों का समूह प्रतिपादित किया है। यदि पर्यायों और उनमें भी अपनी शुद्ध पर्यायों को दृष्टि अपनी नहीं मानता तो किसको मानता है? यदि वह अपनी शुद्ध पर्याय को अपनी मानने से मिध्यादृष्टि हो जाता है, तब अाचार्य श्री का उक्त कथन ही मिथ्या सिद्ध होगा जो कि इनकी मान्यता से सर्वथा मेल नही खाता और चाचार्य श्री के कथन को मिथ्या तथा इन मनीषियो के कथन को सम्यकू मानकर श्रद्धान करना सभव नहीं है; क्योंकि वह सत्य और तथ्य शून्य होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी विरुद्ध है । यहां प्रश्न हो सकता है कि तब फिर शास्त्रो में पर्यायदृष्टि को मिध्यादृष्टि क्यो कहा ? समाधान यह है कि पर्याय को द्रव्य की जानने या पर्यायो पर दृष्टि डालनेवालों को मिथ्यादृष्टि नहीं कहा है, बल्कि उस व्यक्ति को मिध्यादृष्टि कहा है कि जो केवल मनुष्य देवादि रूप संयोगी पर्याय मात्र को ही आत्मा मानकर अपने चैतन्य स्वरूप श्रात्मद्रश्य को न समझता हुआ भ्रमित हो रहा है, अर्थात् मनुष्यादि अशुद्ध पर्यायों में अहंकार ममकार करता हुआ अपने वास्तविक रूप को भुला देता है और अपने वास्तविक गुण पर्यायों के स्वरूपो को न जानता हुआ सयोगी पर्याय में ही मृग्ध हुआ उसे अपना स्वरूप मान तावन्मात्र अपनी श्रद्धा कर लेता है। प्रवचनसार की गाथा ६३ और ६४ में इसी तथ्य को मूल ग्रंथकर्ता आचार्य श्री ने तथा उसके टीकाकारों ने स्पष्ट भी किया है । वास्तविकता यह है कि विभिन्न नयों द्वारा परस्पर बिरोधी कथन का होना - वस्तु में विद्यमान परस्पर विरोधी जैसे धर्मो गुण या पर्यायों की विभिन्नता को विषय करने के कारण स्वाभाविक है। जैसे एक नय वस्तु को द्रव्यत्व या गुणों के अन्वयी भाव के कारण नित्य व शुद्ध जानता व प्रतिपादन करता है तो दूसरा उसी वस्तु की पर्यायों की मुख्यता से अनित्य व अशुद्ध नित्यता द्रव्यगुण सापेक्ष और प्रनित्यता पर्याय सापेक्ष है । इसीलिए उभय नयों का कथन भी परस्पर में सापेक्ष व एक दूसरे का पूरक होकर अनेकातात्मक वस्तु का यथार्थ ज्ञान कराने में सहायक होता है, न कि एक-दूसरे के विषय का खंडन करके सभी नयो को अपने-अपने विषय को मुख्य करके कथन करने को स्वतंत्रता एवं अधिकार है, साथ ही उन्हें उस समय दूसरे नम के विषय को गौण करते हुए उनसे मित्रता (सापेक्षता) बनाए रखना भी अनिवार्य है, यदि वे सुनय है। एक सुनय दूसरे मुनय के विषय में न तो हस्तक्षेप करता है और न उसका खडन ही । श्रतः दूसरे नयो के विषय की सत्यता को वह भलीभांति जानता है। इसके सिबाय दूसरे नयो या उनके विषयो को खडन करने प्रथबा 1 -
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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