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________________ मालवा के परमार नरेश और जैन धर्म डा. शिवकुमार नामदेव, डिण्डौरी (मला) मालवा के परमार राजवंशीय शासकों ने प्राचीन परमार नरेश वाक्पति मुंज ने जैन आचार्य अमितभारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण भाग का अभिनय गति, महाक्षेत्र, धनपाल व घनेश्वर प्रादि को राजाश्रय किया और किसी समय मे उच्च चक्रवर्ती पद को मी प्राप्त प्रदान किया। अमितगति बहुमुखी प्रतिभा के विद्वान थे। किया। कभी वे मालवा के अधिपति के रूप मे पोर कभी जैन धर्म के अतिरिक्त सम्कृत के क्षेत्र में भी उनका ऊंचा प्रवती नरेश के नाम से अभिहित किये जाते थे। परमार स्थान माना जाता है। इनका 'सुभाषित रत्न संदोह' नरेश उज्जैन और घास के शासकों के नाम से भी सुवि- नामक ग्रंथ प्रसिद्ध है। अमितगति माधवसेन का शिष्य था ख्यात थे । परमार राजवशीय नरेशों को प्रारम्भिक राज• जिमका गुरु माथुरसंघ के जैन साधुपो का प्रधान नेमिषण धानी उज्जयिनी थी परन्तू भोन के काल में उनकी राज- था । जैनाचार्य धनपाल को जैन ग्रन्थों से राजा भोज का ta नीतिक राजधानी का केन्द्र धारा नगरी हो गई। अपने समकालीन माना गगा है। परन्तु घार के इतिहास में उत्कर्ष के काल में उनके राज्य की सीमा उत्तर में वर्त इनको राजा मुंज का समकालीन तथा उनका कुल पुरो. मान कोटा और बूदी, पूर्व में विदिशा, होशगाबाद एव । एव हित बताया गया है। सस्कृत एवं प्राकृत दोनों भाषामों सागर के भाग एवं दक्षिण मे ग्वान्देश प्रदेश एवं गोदावरी पर इनका समान अधिकार था। ये श्वेताम्बर सम्प्रदाय क्षेत्र नक के भूभ ग परमार नरेशो के अधीन थे। के अनुयायी थे इस सम्प्रदाय में इन्हे इनके भाई ने मध्य भाग में स्थित होने के कारण परमार राज्य का दीक्षित किया था। इनका छोटा भाई शोमन भी जैनाचार्य सपर्क उत्तर न लेकर दक्षिण तक तथा पूर्व से लेकर पश्चिम था । तक के अनेक ममकालीन राज्यो मे हुया। इमसे न केवल परमार नरेश भोजदेव ने प्रभाचन्द्र मुनि को सम्मान मालवा को सस्कृति की श्रीवृद्धि हुई अपितु परमारकालीन प्रदान किया। दिगम्बराचार्य श्री शान्ति सेन ने भोज की कला ने अन्य राज्यों की कला तथा संस्कृति पर गहरा सभा मे सैकड़ों विद्वानों से वादविवाद करके उन्हे पराजित प्रभाव डाला। किया था। 'चतुर्विशति प्रबन्ध' से ज्ञात होता है कि परमार काल मे मालवा मे जैन धर्म का पर्याप्त उज्जयिनी मे विशालकोति नामक दिगंबराचार्य के शिष्य समन्नत विकास हमा । यद्यपि परमार नरेश ब्रह्मण धर्म मदनकीर्ति ने परवादियों पर विजय पाकर 'महाप्रमाणिक' के अनुसरणकर्ता थे, परन्तु उन्होने जैन धर्म के उत्थान व की पदवी प्राप्त की थी। सूराचार्य व देवभद्र ऐमे जैनाचार्य प्रसार मे अभूतपूर्व योगदान दिया। परमार नरेशो ने जैन थे जिनका भोज के दरबार मे प्रादर किया जाता था। विद्वानों को राजाश्रय प्रदत्त किया। उज्जैन एवं धारा एवं धारा साथ ही नयनदि, जिनवर सूरि अन्य जैन कवि थे, जिन्हे नगरी जैन प्राचार्यों के स्थायी स्थान बने भोर जैना आदर प्राप्त था। चार्यों ने बहुत बड़ी सरूपा म प्रना को जैन धर्म की डोर ब्राह्मण धर्म के साथ ही साथ जैन धर्म भी मालवा प्राकषित किया । इसी काल मे अनेक जैन तीथों की भी। मे फला-फूला । ११वी शताब्दी ई. के प्रारम्भिक भाग मे नीव पड़ी और जैनाचार्यों ने पूर्व परम्परा से चले आए हुए महान जैन श्वेताम्बर गुरु अम्भदेव परमार राज्य के स्थानों की महत्ता बताई तथा वहां पर तीर्थों का शुभारभ खान्देश मे थे। उन्होंने जैन सिद्धान्तों का प्रचार किया मौर भनेक लोगों को इस धर्म में दीक्षित हुमा।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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