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________________ ६, पर्ष ३२, कि. १.२ बनेका किया। इस भू-भाग पर अनेक जैन देवालयों का निर्माण अंतिम क्षोर पर निमाड़ के मैदानी क्षेत्र में ऊन नामक इमा। ११वीं शताब्दी ई. के मध्य में निर्मित किये गए एक ऐतिहासिक स्थान है जो जिला मुख्यालय खरगोन से जैन देवालय निमाड़ जिले के ऊन में भी पाये गयेहै। इससे लगभग १६ कि०मी० की दूरी पर अवस्थित है। परमार वंश यह प्रमाणित होता है कि उस काल में जैन धर्म न केवल के शासनकाल में यह एक महत्वपूर्ण नगर एवं वास्तु सक्रिखान्देश तक ही सीमित था अपितु परमार राज्य की यता का एक मुख्य केन्द्र था। इसके प्राचीन गौरव के सीमानों के मध्य प्रदेश मे और पूर्व मे भी उसका प्रसार साक्ष्य स्वरूप यहां पर अब भी अनेक जैन एवं हिन्दू मदिर था। वर्तमान है। यहां के मंदिरों की वास्तुशंली खजुराहोविन्ध्याचल पर्वत के उत्तर मे भी जैन धर्म की समूह के सदृश है : यहा के एक मन्दिर की दीवाल पर प्रत्यधिक प्रगति हुई थी। जैनाचार्यों ने परमार नरेशों को परमार नरेश उदयादित्य का एक अभिलेख है। सदा ही प्रभावित करने का प्रयास किया। राजा नरवमन ऊन मे दो महत्वपूर्ण जैन मदिर है -(१) चौबार जैन धर्म के प्रति सभाधना रखते थे। वे जैन गुरु वल्लभ डेरा क्रमाक २ तथा (२) शातिनाथ । के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे । परमार नपति विन्ध्य वर्मन चौबारडरा क्रमाक २ एक प्राचीन जैन मन्दिर है। जैनियों का बड़ा आदर करता था। जैन व्याकरण एव इसका प्राकार वर्गाकार है और इसके मध्य पाठ स्तम्भों जैन सम्प्रदाय के समस्त सिद्धान्तों के महान विद्वान् पडित पर एक गुम्बज है। इसमे चार द्वार मार्ग है जिनमें से एक धारासन के शिष्य महावीर को विन्ध्यवर्मन ने संरक्षण गर्भगृह का जाता है । गभंगह मे दो विशाल जैन मूर्तियां पदान किया था। इसी काल में प्राशाधर अपने सपूर्ण है। इनमें से एक मूर्ति तीर्थ कर शातिनाथ की है। इसका परिवार के साथ पाकर मालवा मे बस गया और महावीर स्थापना काल माघ शुक्ल ७ स. २८२ वि. मति पर को अपना पथप्रदर्शक बनाया। विन्ध्यवर्मन का उत्तराधि- प्रकित है। दूसरी मूर्ति का स्थापनाकाल स. १२६३ कारी सुभट वर्मन जैन धर्म का विरोधी था। अर्जुन वर्मन वि है। के सिंहासनारोहण के पश्चात् मालवा मे पुनः जैन धर्म की सड़क के दक्षिण की प्रोर कुछ दूरी पर एक टेकड़ी के प्रगति हुई। याशाधर ने लिखा है कि अर्जुन वर्मन का प्रदेश ऊपर श्री शातिनाथ मदिर है, जा ग्वालेश्वर मंदिर के नाम जैन श्रावकों से भरा था और वह स्वय जैन धर्म के पक्ष से प्रसिद्ध है। इसका प्रामलक शिला एव कलश नष्ट हो गए का प्रसार करने के लिए नलकच्छपुर नगर में रहता था। है। मण्डप चार गुम्बदयुक्त एक वर्गाकार कक्ष है। इसमें उसने जैन धर्म सप्रदाय के विभिन्न पक्षों का निरूपण करने दालान नहीं है । गर्भगृह सभा मण्डप से लगभग १० फुट के लिए अनेक यो रचना की थी। जैन धर्म सुदीर्घ काल नीचा है। गर्भगृह से मडप में पाने के लिए सीढ़ियां बनी तक मालवा मे फलता-फूलता रहा । हुई है। मुख्य शिखर के चारों ओर उसी प्रकार के शृंग जैन कला एवं स्थापत्य को परमार काल में चरमो. है जैस कि खजुराहो के पाश्वनाथ मन्दिर में है। गर्भगृह के स्कर्ष पर पहुंचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसका कारण अन्दर तीन दिगम्बर जैन प्रतिमानो की एक पंक्ति एक यह भी है कि भागवत धर्म के अनुयायी होने के बावजूद पादपीठ पर खड़ी है। उनमें से भगवान शातिनाथ की उन्होने जैन धर्म के प्रति न केवल उदार दृष्टिकोण पप. प्रतिमा १८' ऊची है जिनके दोनों ओर भरहतनाथ तथा नाया बल्कि उनके काल में अनेक जैन मन्दिरों का निर्माण कुन्थनाथ की प्रतिमाएं कायोत्सर्ग मुद्रा मे खड़ी है। मध्य हुमा और जैन धर्म के उन्नयन मे उन्होने गहरी अभिरुचि की प्रतिमा पर स्थापना काल ज्येष्ठ शुक्ल १३ सं० १२६३ व्यक्त की। मंकित है। परमारों के प्रतापी शासनकाल मे भनेकानेक भव्य भोपाल से लगभग २५ कि. मी. की दूरी पर स्थित एवं विशाल देवालयो का निर्माण हुमा जिनके कुछ उदा- समरूगढ़ नामक एक छोटा-सा ग्राम है। ग्राम के बायें हरण माज भी उपलब्ध है । सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के उत्तरी अचल में अनेक पुरात्वीय अवशेष मंदिरों के भग्नावशेषों
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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