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________________ ६, वर्ष ३२, कि. १.२ अनेकान्त न किया, उसने कनक को छोड़कर भूसा ही कूटा है। देवलि पाहणु तिथि जलु पुत्थई सम्बई कन्च । पंडिल पंडिय पंडिया कण छविवि तुस कंडिया । वत्थु जु वीस्सइ कुसुभियउ इषय होसइ सम्खु ।। प्रत्ये गये तुठो सि परमस्थ ण जाणहि मूढ़ोसि ॥ इत्यादि... इन पक्तियों में स्पष्ट ही कहा गया है कि देवालय(२) पुस्तकी ज्ञान की अवहेलना के साथ संतो का गमन या तीर्थभ्रमण से कुछ नही होने का-जब तक मन दूसरा सवादी स्वर है -भीतरी साधना या अंतर्याग पर में काषाय शेष है। मनोगत काषाय का संबरण पौर बल । सिद्धो, नाथो पोर सतो की भांति इन जैन मुनियो म ने भी कहा है कि जो साघु बाह्य लिंग से तो युक्त है किंतु (४) चौथी समानता संतों, सिद्धों और रहस्यवादी प्रांतरिक लिंग मे शन्य है वह सच्चा साधक ता है ही नाथों से प्रागमिक परम्परा से प्रभावित इन जैन मुनियो नही, विपरीत इसके मार्गभ्रष्ट है। सच्चा लिग भाव की की यह है कि ये भी वहिम खी साधना से हटकर शरीर है-भाव शुद्धि से ही प्रात्म प्रकाश सम्भव है । मोरूब नारी के भीतर की साधना पर बल देते है । देवसेनाचार्य ने 'तत्वपाहुड में कहा गया है--- सार' में स्पष्ट कहा है - बाहिर लिगेण जदो प्रम्यंतरलिग रहिय परियम्मो। पक्के मण संकप्पे रुद्दे प्रव वाण विषयवावारे । सो सगचरित्तभट्टो मोव व पहविणासगो साहू ।। पगट इ वंमसरूवं अप्पा झाणे जो ईणं ॥ इसी बात को शब्दान्तर से कुन्दकुन्दाचार्य ने 'भाव पाहुड़' मे भी कहा है प्रात्मोलब्धि करनी है तो मनोदर्पणगत काषाय मल का भावो हि पढ़मलिग न दिव्यालगं च जाण परमत्थं। अपवारण आवश्यक है । रत्नत्रय ही मोक्ष है-किन्तु उसका भावो कारणमदो गुणदोसाणं जिणाविति ॥ पोथियों मे नही, स्वसंवेदन से ही सवेतवा संभव है। स्व. (३) अन्तर्याग पर बल ही नहीं, उसे विच्छिन्न मूल संवेदन अपने से ही अपने को जानना है । इसलिए उक्त दोहे वहिर्याग, वालिग अथवा बाह्याचार का उसी प्रावेश में कहा गया है कि यह उक्तसंवेन ही है जिसके द्वारा मन के और विद्रोह की मुद्रा में इन जैन मुनियों ने खण्डन भी संकल्प मिट जाते है, इन्द्रियां विषयों से उपरत हो जाती है किया है। प्रानन्दतिलक ने स्पष्ट ही कहा है कि कुछ और प्रात्मध्यान से योगी अपना स्वरूप जान लेता है। लोग या तो बालों को नुचवाते है अथवा व्यर्थ मे वहन (५) पाँचवा साम्य है --गुरु माहात्म्य या महत्व करते है, परन्तु इन सबका फल जो आत्मबिन्दु का बोध का। प्रागमसम्मत धारा कि साधन को सर्वाधिक महत्व है, उससे अपने को वचित रखते है देती है, अतः निर्देशक के प्रभाव मे वह कार्यान्वित हो के केस लुचाहिं, केह सिर ज भारू। प्रबिणजाहि, पाणंदा। किम जावहिं भयपारू? १ नही सकती। संतों ने 'गुरु' को परमात्मा का शरीरी रूप मनि योगीन्दु ने भी कहा है कि जिन लोगों ने केवल ही कहा है । जैन मुनियो मे भी गुरु महिमा का स्वर उतना ही उदग्र है । मुनि रामसिंह ने पाहुण दोहा मे गुरु जिनवरों का बाहरी वेष मात्र अपना रखा है. भस्म से __ की वंदना की है और कहा हैकेश का लुचन किया है किन्तु अपरिग्रही नहीं हुप्राउसने दूसरों को नही अपने को ठगा है। इसी प्रकार इन गुरु विणयरु गुरु हिमकिरणु गुरु दीवउ गुरु देउ । अप्पापरहं परंपरह जो बरिसाव भेउ। मुनियो ने तीर्थभ्रमण तथा देवालय गमन का भी उग्र स्वर मे विरोध किया है। मनि योगीन्दु ने तीर्थ भ्रमण के अर्थात् गुरु दिनकर, हिमकर, दीप तथा देव सब कुछ विषय में कहा है-- है। कारण, बही तो प्रात्मा और अनात्मा का भेद स्पष्ट तित्थई तित्य भमंताह मणह मोव वण होह। करता है । यह सद्गुरु ही है जिसके प्रसाद से केवल ज्ञान णाण वि वज्जिउ जेण जिय मुनिधरु होइ ण सोइ॥ का स्फुरण होता है उमी की प्रसन्नता का यह परिणाम है देवलगमन तथा भर्तिपूजा के विपक्ष के उद्गार देखें - कि साधक मुक्ति रूपी स्त्री के घर निवास करता है। पत्तिम पाणि चव तिल सम्बइ जाणि सवष्णु । कवलणणवि उपज्जइ सद्गुरु वचन पसावु । जं पुण मोव वहं जाइवउ तं कारण कुछ अण्णु । निष्कर्ष यह कि अपभ्रंशबद्ध जैन काव्यो मे उस स्वर पत्तिय तोडि म जोहया फसहि ज इत्थु म बाहि । का स्पष्ट ही पूर्वाभास उपस्थित है जो सतों मे लक्षित जसु कारणि तोदेहि तुहु सोउ एत्थु चाहि ॥ होता है। 000 विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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