SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 5
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मोम पहन নীকান परमागमस्य बीज निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥ वर्ष ३२ वीर-सेवा-मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ 5 जनवरी-जम किरण १ और २४ वीर-निर्वाण संवत् २५०५, वि० सं० २०३५ । १९७९ सम्मइसुत्तं णयकंड सिद्धं सिद्धस्थाणं ठाणमणोवमसह उवगयाणं । कुसमयविसासणं सासणं जिणाणं भवजिणाणं । [सिद्ध सिद्धार्थानां स्थानमनुपमसुखमुपगतामाम् । समयविशासनं शासनं जिनानां भवजिनानाम् ॥] जिन-शासन स्वतः प्रमाण-सिद्ध है भावार्थ :-जो संसार के दुःखों को जीत कर अनुपम सुख को उपलब्ध हो चुके हैं, उन जिनेन्द्र भगवान का प्रमाण-प्रसिद्ध अर्थों का स्थान जिन-शासन स्वतः सिद्ध है। वह मिथ्यामतो का खण्डन करने वाला है। जिन-शासन स्वत: प्रमाण इसलिए है कि वह वीतरागी देव द्वारा प्रकाशित है। कोई भी जीव स्वयं वीतरागी बन कर उसे प्रमाणित कर सकता है। अतः प्रमाण वीतरागता ही है। राग द्वेष से रहित अवस्था हो वीतरागता है। विशेष-ग्रन्थ के प्रारम्भ में 'सिद्ध' शब्द का प्रयोग मगल सूचक है। ग्रन्थ-कर्ता के नाम का सूचक भी 'सिद्ध' शब्द कहा जाता है। तित्थयरवयणसंगहविसेसपत्थारमुलवागरणी । दवटियो य पज्जवणयो य सेसा वियप्पा सि ॥ [तीर्थकरवचनसंग्रह विशेषप्रस्तारमूलव्याकरणी। द्रव्याथिकश्च पर्यवनयश्च शेषा विकल्पास्तयोः ।। तीर्थकर-वाणी : सामान्य-विशेषात्मक भावार्थ-तीर्थकरों के वचन सामान्य-विशेषात्मक हैं। वे सामान्य रूप से द्रव्य के प्रतिपादक हैं और विशेष रूप से पर्याय के। द्रव्याथिक (निश्चय या परमार्थ) और पर्यायाथिक (व्यवहार) नयों (सापेक्ष दृष्टियों) से मूल वस्तुओं की व्याख्या की गई है। शास्त्रों में जिन सात नयों का वर्णन मिलता है, वह इन दो नयों का विस्तार है। सभी नय द्रव्यात्मक और पर्यायाथिक इन दो नयों में गभित हैं। इनमें द्रव्याथिक नय का विस्तार नैगम, संग्रह एवं व्ययहार रूप है तथा पर्यायाधिक नय का विस्तार ऋजसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ पीर एवंभन रूप है। मुल जिनवाणी का विवेचन करने वाले ये दो ही नय हैं। 000
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy