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________________ पंच परमेष्ठी और णमोकार मंत्र डा० प्रेमसागर जैन, बड़ौत अरिहन्त, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और साधु को वह सूत्र है.---"णमो अरिहन्ताणं" मन्त्र । उसमें पंच परमेष्ठी पच परमेष्ठी कहते है। जैन शासन उनकी महिमा से को समान रूप मे नमस्कार किया गया है। मन्त्र होने के समन्वित है। उन्हे अधिष्ठातृ देव माना जाता है। साधु कारण यहाँ नमस्कार का अर्थ है -साक्षात् करना । तभी से मरिहन्त तक का क्रम उत्तरोत्तर अधिकाधिक प्रात्म- मन्त्र की सार्थना है। साक्षात का अर्थ है-अनुभूति की शुद्धि की दृष्टि से किया गया है। सिद्ध के पूर्ण पावन होने गहराइयों में स्पष्ट दर्शन । पर भी, लोकोपकार की दृष्टि से अरिहन्त को प्रथम जन परमग मे यह मन्त्र, मुष्टि की भांति ही अनास्थान प्राप्त हया है। पाठो कर्मों को जीतने से सिद्धों को दिनिधन माना जाता है। भगवान महावीर ने १४ पूर्वो पूर्ण शाश्वत प्रात्म-सुख प्राप्त हो जाता है । वे "लोयगणि- की विद्या अपने गणवरो को स्वयं प्रदान की थी। पूर्व वासिणो", "लोयसिंहरत्यो" और "लोकत्रयशिखरपुरी. विद्या का अर्थ है, भगवान महावीर से पहले की विद्या, वासिनः" कहलाते है। इसके विपरीत, अरिहन्त केवल जो श्रवण कर-करके सतत चली पा रही थी। हो सकता चार घातियां कर्मों का क्षय कर पाते है। अतः चार अवा- है कि तीर्थकर पाश्वनाथ के समय में भी १४ पूर्व पहले से तिया कमी के चुकने तक उन्हे इस संसार मे रुकना होता पाई हई विद्या के रूपमे प्रतिष्ठित हों। जो कुछ हो, १४ पूर्त है। इस बीच उन्हे समवशरण को बिभूति प्राप्त हो जाती में एक पूर्व था-विद्यानुवाद । उसका प्रारम्भ णमोकार है और उसके माध्यम से वे अपनी दिव्य ध्वनि का प्रमार । मन्त्र से हवा था, अर्थात् पंच परमेरठी के नमस्कार से हुमा करते है, जिससे संसार का भला होता है। जैनाचार्या ने था। विद्यानुवाद एक अद्भत मन्त्रग्रन्थ था। प्राज वह जागतिक उपकार को ही मुख्यता दी है, इसी कारण सिद्ध हा मुख्यता दी है। इसी कारण सिद्ध विनुन माना जाता है, किन्तु कहा जाता है कि उसकी से पूर्व परिहन्त को मान्यता मिली है। इसी सन्दर्भ मे बिखरी सामग्री का संकलन मनि सुकुमार सेन (७वी 'षट् खण्डागम' का एक उद्धरण महत्वपूर्ण है शती ईगवी) के विद्यानुशामन में हुआ है। "असत्यहत्याप्तागमपदार्भावगमो न भवेवस्मदादीनां, विद्यानुशासन की हस्तलिखित प्रति जयपुर और संजातश्चैतद् प्रमादावित्युपकारापेक्षया अजमेर के शास्त्र-भण्डारो में मौजूद है। श्री मोहनलाल वादाहन्नमस्कारः क्रियते ।" । भगवानदास झावेरी ने ऐतिहासिक दृष्टि से जैन मन्त्र इसका अर्थ है कि यदि ग्रहन्त न होते तो हम को शारत्र का प्रारम्भ ईमा से ८५० वर्ष पूर्व, अर्थात् तीर्थकर प्राप्तागम में कहे हुए पदार्थों का प्रवगम न हो पाता। पाश्र्वनाथ के समय मे स्वीकार किया है । झावेरी की इस महन्तो के प्रसाद के कारण ही हम प्रामाणिक श्रुत को प्राप्त मान्यता के सम्बन्ध मे डा० पाल्तेकर ने लिखा है।कर सके है, अत: उन्हे आदि मे नमस्कार करना उचित "Mr. Jhaveri thinks that Mantrashastra among the Jains is also of hoary antiquity. ___ यद्यपि प्रास्मशुद्धि की दृष्टि से साधु सबसे नीचे है He claims that its antiquity goes back to the भौर गिद्ध सबसे ऊपर, किन्तु जैनाचार्यों ने पांचों को days of parsuvnatha, the 23rd Tirthankata, समान रूप से वन्दनीय कहा है। शायद यही कारण who fiourished about 850 B. C." है कि पांचों का सम्गुम्फन एक ही सूत्र में किया गया है। उपलब्ध पुरातात्विक आधार पर णमोकार मन्त्र का
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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