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________________ हे भव्यकीयो ! यदि तुम जिनमत का प्रवर्तन करना पादित प्रवृत्ति के कथन को निश्चयनय द्वारा प्रतिपादित चाहते हो तो व्यवहार पोर निश्चय दोनों को मत छोड़ो, प्रवृत्ति के ज्ञान का साधन नही मान कर निश्चय नय द्वारा क्योंकि व्यवहार के बिना तो तीर्थ (धर्म तीर्थ याने ज्ञान प्रतिपादित प्रवृत्ति की उत्पत्ति का साधन मानना मात्र तीर्थ जो कि तस्वरूप निज शुद्धात्म स्वरूप के निकट समझ की विपरीतता ही है। इस तरह से सत्य प्रतिपादन किनारे गक पहुंचाने का साधन है) का नाश हो जावेगा करने की क्षमता रखने वाले उपचरित कपन को अपनी तथा निश्चय के बिना तत्व (निज शुद्धात्म स्वरूप साध्य विपरीत समझ के द्वारा मिथ्या मान्यता रूप मानना स्वयं रूपमात्मतत्व का नाश हो जावेगा)। अपनी ही भूल है। प्राचार्यों के कथन करने में भल नहीं है। इसके लिये समयसागर मूलगाथा १२ मे श्रीमद् कुन्द- इस विवेचना का यही निष्कर्ष निकलता है कि उपकुन्दाचार्य देव ने स्पष्ट निर्देश किया है कि अपरम भाव चरित कथन का कहना तो व्यवहार है लेकिन उसको वैसा (विकल्पात्मक अवस्था) में व्यवहार प्रयोजनीय है, अर्थात् ही मानना मिथ्यात्व है; जैसे कि राग को धर्म कहना भेदज्ञान का विकल्प याने दोनो नयो द्वारा वस्तु स्वरूप को। व्यवहार है, उपचार है लेकिन राग को धर्म मानना जानने रूप व्यवहार जानने की अपेक्षा प्रयोजनवान् है मिथ्यात्व है। क्योंकि राग रूप से कहना तो मुख्य कथन है, तथा परमभाव (निर्विकल्प अवस्था) में निश्चय नय द्वारा यथार्थ कथन है. सत्य वचन है तथा राग को धर्म का व्यव. प्रतिपादित स्वयं के शुद्धात्म स्वरूप का अर्थात् प्रात्मज्ञान हार है. उपचरित कथन है; उपचार रूप से यथार्थ है, सत्य का ज्ञान प्राश्रय ग्रहण करने की अपेक्षा से प्रयोजनीय है। वचन है क्योकि अपने लक्ष्य रूप धर्म के कथन का ज्ञान भेद नाम व्यवहार का है। निश्चय तथा व्यवहार रूप कराने की अपेक्षा प्रयोजनवान है । लेकिन राग में धर्म उपभेद मात्र ज्ञान का ही भेद है । ज्ञान की अपेक्षा याने सम- चार किया अर्थात् राग को धर्म कहा इसलिये राग को भी झने की अपेक्षा से अन्य गणों में भी निश्चय व्यवहार के धर्म मान लिया जावे या राग से धर्म की उत्पत्ति मान ली भेद का प्रयोग शब्द द्वारा किया जाता है लेकिन उस प्रयोग जावे तो यह मानना विपरीत हो जाता है तथा ऐसा मानना करने के यथार्थ अभिप्राय को भूलकर श्रद्धा मोर प्रवृत्ति मिथ्यात्व कहलाता है। वगैरह में भी जो निश्चय व्यवहार की मान्यता मान ली इसी तरह से प्रात्म-स्वभाव की अपेक्षा शरीर मादि जाती है, इसी समझ की भूल के कारण उपचरित कथन नोकर्म तथा ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म रूप परपदार्थ तथा के सही माशय को भूलकर विपरीत मान्यता बनी रहती है। रागादिक परभावरूप भावकर्म को अपना कहना प्रारमयह समझ बहुत मोटी भूल है। प्रबुद्ध जिज्ञासुपों को इस स्वभाव का उपचार है। लेकिन इनको अपना मानना अर्थात विषय पर विशेष ध्यान देकर चिन्तन-मनन करके निर्णय मबको अपना प्रारम स्वभाब मानना मिथ्यात्व है। ज्ञानी करना चाहिये । अन्य गुणों का परिणमन शुद्ध या प्रशुद्ध जीव के स्वभाव दृष्टि की वजह से मान्यता में यह विलयथार्थ ही है। मात्र ज्ञान को प्रपेक्षा शब्द द्वारा उनमें क्षणता पाई जाती है। निश्चय व्यवहार का उपचार किया जाता है। ___ सारांश यही है कि बिल्ली में शेर का उपचार करके जैनागम में जगह-जगह व्यवहारनय को निश्चयनय शेर का ज्ञान तो किया जा सकता है लेकिन बिल्ली में शेर का साधन कहा है, क्योकि निश्चय नय के प्रथंभूत निज का उपचार करने के कारण बिल्ली को भी शेर मान लेना शुद्धात्म तत्व पात्मज्ञान का कथन वचनरूप व्यवहार या बिल्ली से शेर की उत्पत्ति मान लेना स्वयं अपनी ही द्वारा होता है। इस तरह से बचनरूप व्यवहार जान समझ को भूल है। निश्चय साध्यरूप प्रात्मज्ञान के ज्ञान का साधन है। लेकिन इस प्रकार से अचरित कथन का सही प्रयोजन समझ निज के ज्ञान स्वभाव को भूलकर व्यवहारनय द्वारा प्रति- कर भव्य जोब जिनवाणी के यथार्थ रहस्य की समझ द्वारा पादित प्रवृत्ति के कथन को निश्चयनय द्वारा प्रति. स्वभाव दष्टि को अपना कर अपना कल्याण करें। .
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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