Book Title: Punyasrav Kathakosha
Author(s): Ramchandra Mumukshu, A N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
Publisher: Bharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad

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Page 218
________________ :५-२, ३५ ] ५. उपवासफलम् २ १९७ चित्कर्तुमशक्तः। स तु तूष्णीं स्थितः। तं कुपितं ज्ञात्वा धनमित्रकीर्तिसेनाभ्यां प्रियवचनैरुपशान्ति नीतः। स धनमित्रः कीर्तिसेनाकृतपञ्चम्युपवासेऽत्यन्तं मुमोद तां प्रशशंस। सधनदत्तो मृत्वा धनपतिः श्रेष्ठी जातो नन्दिभद्रा कमलश्रीर्जाता वज्रसेनोऽरिजयोऽभूत. कौशिको राक्षसो बभूव । धनमित्रो जैनोऽपि परिणामवैचित्र्याद्विरोधको भूत्वा ममार । तथाप्युपवासानुमोदजातपुण्येन त्वं जातोऽसि, कीर्तिसेना भविष्यानुरूपाभूदिति स्नेहादिकारणं निरूपितम् । विचार्य गृहाणेति (?) स कीर्तिसेनायाः भर्ता बन्धुदत्तोऽभूदिति कथितेsतोतभवस्वरूपे भविष्यदत्तो जहर्ष, तद्विधानविधिक्रमं तदुद्यापनक्रमं च पृच्छति स्म । मुनिना कथितस्तत्क्रमः समयानन्तरमेव नागकुमारकथायां कथितो ज्ञातव्योऽयं तु विशेषः नागकुमारकथायां शुक्लपञ्चम्यामुपवासः कथितोऽयं कृष्णपञ्चम्यामिति । इति श्रुत्वा भविष्यदत्तो वनितादियुक्तस्तद्विधि स्वीकृत्यानुष्टायोद्यापनं कृत्वा बहुकालं राज्यं विधाय स्वनन्दनसुप्रभाय राज्यं वितीर्य वहुभिः पिहितास्रवान्तिके दीक्षितो धनपतिरपि । कमलश्रीभविष्यानुरूपादयः सुव्रतार्जिकासकाशे दीक्षिताः । यथोक्तं तपो विधाय प्रायोपगमनसंन्यासविधिना भविष्यदत्तमुनिः शरीरं विहाय सर्वार्थसिद्धि जगाम । धनपत्यादयोऽपि स्वपुण्ययोग्यस्थलेबहुत हुआ, परन्तु वह कर कुछ नहीं सकता था, इसीलिए वह उस समय चुपचाप ही स्थित रहा। उसे क्रोधित देखकर धनमित्र और कीर्तिसेनाने प्रिय वचनोंके द्वारा शान्त किया। उस धनमित्रने कीर्ति सेनाके द्वारा किये गये पञ्चमी-उपवासकी अतिशय अनुमोदना करते हुए उसकी बहुत प्रशंसा की। वह धनदत्त मरकर धनपति सेठ हुआ है, नन्दिभद्रा कमलश्री हुई है, वज्रसेन अरिंजय हुआ है, तथा कौशिक तापस राक्षस हुआ है। धनमित्र यद्यपि जैन था, फिर भी परिणामोंकी विचित्रतासे वह विरोधी होकर मरा और उपवासकी अनुमोदना करनेसे प्राप्त पुण्यके प्रभावसे तुम हुए हो । कीर्तिसेना भविष्यानुरूपा हुई है। इस प्रकार तुम्हारे द्वारा पूछे गये उन स्नेह आदिके कारण का मैंने निरूपण किया है। तुम विचार कर [ उस पञ्चमीत्रतको ] ग्रहण करो। वह कीर्तिसेनाका पति बन्धुदत्त हुआ है। इस प्रकार मुनिके द्वारा प्ररूपित अपने पूर्व भवोंके स्वरूपको सुनकर भविष्यदत्तको बहुत हर्ष हुआ। फिर उसने उन मुनिराजसे उस पञ्चमीव्रतके अनुष्ठानकी विधि तथा उसके उद्यापनके क्रमको भी पूछा । तब मुनिराजने जिस प्रकारसे उसके क्रमका निरुपण किया वह पीछे नागकुमारकी कथामें कहा जा चुका है, अतएव उसको वहाँ से जानना चाहिये । विशेष इतना ही है कि नागकुमारकथामें जहाँ शुक्ल पञ्चमीको उपवासका निर्देश किया गया है वहाँ इस व्रतविधानमें उसे कृष्ण पञ्चमीको जानना चाहिये। इस प्रकार उक्त व्रतके विधानादिको सुनकर भविष्यदत्तने पत्नियों आदिके साथ उस व्रतको ग्रहण कर लिया । फिर विधिपूर्वक पालन करके उसने उसका उद्यापन भी किया। भविष्यदत्तने बहुत समय तक राज्य किया। तत्पश्चात् उसने अपने पुत्र सुप्रभको राज्य देकर पिहितास्रव मुनिके समीपमें दीक्षा ग्रहण कर ली। साथमें धनपति सेठने भी दीक्षा धारण कर ली। कमलश्री और भविष्यानुरूपा आदि सुत्रता आयिकाके निकटमें दीक्षित हो गईं। भविष्यदत्त मुनिने उक्त क्रमसे तपश्चरण करके प्रायोपगमन (स्व-परवैयाव्रत्य की अपेक्षासे रहित) संन्यासको ग्रहण किया। इस क्रमसे वह शरीरको छोड़कर सर्वार्थसिद्ध विमानमें देव उत्पन्न हुआ। धनपति आदि भी अपने अपने पुण्यके अनु १. पत्यन्त मुमोद फ शत्यन्तानुमोद । २. ज प्रशसंसे ब प्रसंस। ३. ब ‘स कीर्तिसेनायाः भर्ता बधुदत्तोऽभूदिति' नास्ति । ४ श 'च' नास्ति । ५. फ 'इति' नास्ति । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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