Book Title: Jain Vidyalay Granth
Author(s): Bhupraj Jain
Publisher: Jain Vidyalaya Calcutta

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Page 185
________________ आचार्य जवाहर ब्रह्मचारी बना है, उसे अखण्ड ब्रह्मचारी कहते हैं। अखण्ड ब्रह्मचारी का मिलना इस काल में अत्यन्त कठिन है। आजकल तो अखंड ब्रह्मचारी के दर्शन भी दुर्लभ हैं। अखंड ब्रह्मचारी में अद्भुत शक्ति होती है। उसके लिए क्या शक्य नहीं है? वह चाहे सो कर सकता है। अखंड ब्रह्मचारी अकेला सारे ब्रह्माण्ड को हिला सकता है। अखंड ब्रह्मचारी वह है जिसने अपनी समस्त इन्द्रियों को और मन को अपने अधीन बना लिया हो-जो इन्द्रियों और मन पर पूर्ण आधिपत्य रखता हो। इन्द्रियाँ जिसे फुसला नहीं सकतीं, मन जिसे विचलित नहीं कर सकता, ऐसा अखण्ड ब्रह्मचारी ब्रह्म का शीघ्र साक्षात्कार कर सकता है। अखंड ब्रह्मचारी की शक्ति अजबगजब की होती है। २-ब्रह्मचर्य का व्यापक अर्थ परमात्मा के प्रति विश्वास स्थिर क्यों नहीं रहता? यह प्रश्न अनेकों के मस्तिष्क में उत्पन्न होता है। इसका उत्तर ज्ञानी यह देते हैं कि आन्तरिक निर्बलता ही परमात्मा के प्रति विश्वास को स्थायी नहीं रहने देती। परमात्मा के प्रति विश्वास न होने के जो कारण हैं, उनमें से एक कारण है ब्रह्मचर्य का अभाव। जीवन में यदि ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा हुई तो निसन्देह ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धाभाव स्थायी रह ब्रह्मचर्य सकता है। ब्रह्मचर्य शब्द कैसे बना है और वह क्या वस्तु है? सर्वप्रथम इस ज्ञानीजन कहते हैं-समस्त इन्द्रियों पर अंकुश रखना और बात पर विचार करना चाहिए। हमारे आर्यधर्म के साहित्य में ब्रह्मचर्य विषयभोग में इन्द्रियों को प्रवत्त न होने देना पूर्ण ब्रह्मचर्य है और वीर्य शब्द का उल्लेख मिलता है। जिन दिनों अवशेष संसार यह भी नहीं की रक्षा करना अपूर्ण ब्रह्मचर्य है। आज वीर्य रक्षा तक ही ब्रह्मचर्य जानता था कि वस्त्र क्या होते हैं और अन्न क्या चीज है तथा नङ्ग- की सीमा स्वीकार की जाती है। पर वास्तव में सब इन्द्रियाँ और मन धडंग रहकर, कच्चा माँस खाकर अपना पाशविक जीवन-यापन कर को विषयों की ओर प्रवृत्त न होने देना पूर्ण ब्रह्मचर्य है। केवल वीर्यरक्षा रहा था, उन दिनों भारत बहुत ऊँची सभ्यता का धनी था। उस समय अपूर्ण ब्रह्मचर्य है। अलबत्ता अपूर्ण ब्रह्मचर्य की साधना के द्वारा पूर्ण भी उसकी अवस्था बहुत उन्नत थी। यहाँ के ऋषियों ने, जो संयम, ब्रह्मचर्य तक पहँचा जा सकता है। योगाभ्यास, ध्यान, मौन आदि अनुष्ठानों में लगे रहते थे, संसार में . ३-वीर्य का दुरुपयोग ब्रह्मचर्य नाम को प्रसिद्ध किया। ब्रह्मचर्य का महत्व तभी से चला आता देश में आज जो रोग, शोक, दरिद्रता आदि जहाँ-तहाँ दृष्टिगोचर है-जब से धर्म की पुनः प्रवृत्ति हुई। भगवान् ऋषभदेव ने धर्म में होते हैं उन सबका एकमात्र कारण वीर्यनाश है। आज बेकार वस्तु की ब्रह्मचर्य को भी अग्रस्थान प्रदान किया था। साहित्य की ओर दृष्टिपात तरह वीर्य का दुरुपयोग किया जा रहा है। लोग यह नहीं जानते कि कीजिए तो विदित होगा कि अत्यन्त प्राचीन साहित्य-आचारांग सूत्र वीर्य में कितनी अधिक शक्ति विद्यमान है। इसी कारण विषय-भोग में तथा ऋग्वेद में भी ब्रह्मचर्य की व्याख्या मिलती है। इस प्रकार आर्य वीर्य का नाश किया जा रहा है। उसी में आनन्द माना जा रहा है। ऐसा प्रजा को अत्यन्त प्राचीन काल से ब्रह्मचर्य का ज्ञान मिल रहा है। करने से जब अधिक सन्तान उत्पन्न होती है तो घबराहट पैदा होती १- ब्रह्मचर्य की शक्ति है। पर उनसे मैथुन त्यागते नहीं बनता। भारतीयों को इस प्रश्न पर आजकल ब्रह्मचर्य शब्द का सर्वसाधारण में कुछ संकुचित-सा गहरा विचार करना चाहिये। विदेशी लोग ब्रह्मचर्य की महत्ता को भले अर्थ समझा जाता है। पर विचार करने से मालूम होता है कि वास्तव ही न समझते हों या स्वीकार न करते हों परन्तु भारत में तो ऐसे महान् में उसका अर्थ बहुत विस्तृत है। ब्रह्मचर्य का अर्थ बहुत उदार है ब्रह्मचारी हो गये हैं जिन्होंने ब्रह्मचर्य द्वारा महान शक्ति लाभ कर जगत अतएव उसकी महिमा भी बहुत अधिक है। हम ब्रह्मचर्य का के समक्ष यह आदर्श उपस्थित कर दिया है कि ब्रह्मचर्य के प्रशस्त महिमागान नहीं कर सकते। जो विस्तृत अर्थ को लक्ष्य में रखकर पथ पर चलने में ही मानव समाज का कल्याण है। ब्रह्मचर्य ही कल्याण विद्वत खण्ड/६ शिक्षा-एक यशस्वी दशक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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