Book Title: Anusandhan 1999 00 SrNo 15
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 14
________________ ॥३४॥ ॥३५।। ॥३६।। अनुसंधान-१५ .9 सर्वप्रकाशप्रवणार्कदीपोत्सर्पच्छविच्छद्मशिखान्तसूतैः । नभःशरावक्षरितैरभारि क्षोणीतमः कज्जलचूर्णपुजैः ध्वान्तावलिश्यामलितां विचित्राकाराञ्चितोद्रुप्रकराभिरामाम्। दीपोत्सवे रात्रिवधूरपि द्यां चक्रे विलिप्योज्ज्वलमण्डनां नुः कोपेन जज्वाल तरङ्गिरागा नूनं वनस्था ततिरौषधीनाम् । प्राणेश्वरः शीतकरोऽकरोद्यना(न)मां करस्पर्शनतोऽपि तोषं स्मेरं मरन्दामृतमिन्दिरायाः सद्माल्परोलम्बकलङ्कपङ्कम् । अन्तः सरस्तारकपत्यपत्यव्रातोपमां कौमुदमाप वृन्दम् उच्चस्तरादम्बरतोऽस्तशैले पातेन तेजो यदभाजि भानोः । दीपालयस्तच्छकलायमानाः प्रत्यालयं दिद्युतिरे तदानीम् लोकेन हेमन्तसमन्तशीतावपीतसीतङ्कतया हुताशः । दा(दी)पावलीदीपकदम्बदम्भादूपे तमःसन्ततिकृष्णभूमौ मा संविगृह्येन्दुरहोदुरन्तैस्तत्राऽह्नि जिग्ये तिमिरैस्ततोऽसौ । नष्टो गृहीतोडुदलोऽथ दीप ॥३७॥ ॥३८॥ ॥३९॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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