Book Title: Anusandhan 1999 00 SrNo 15
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 22
________________ अनुसंधान-१५ . 17 श्लिष्यन्नुरोहिङ्गलरङ्गचोलं यस्याः स्तनास्फालजकोपशंसी । शुक्लोऽपि लौहित्यमुपैति हारो वीक्ष्याऽपि को वा सुकुचां न रागी ॥८८॥ कम्बुः किमु स्याद्यदकुण्ठकण्ठस्पर्धाय पूर्णोऽप्ययमुज्ज्वलात्मा । यधुच्चरत्योमिति वाद्यमानः पापापहं नो परमेष्ठिबीजम् ॥८९|| देदीव्य(प्य)ते देव्यधरारुणास्यासिन्दूरपादा कुमुदावदाता । या मानसे सौमनसे न सेवालस्याऽऽलये दिव्यसितच्छदीव ॥९॥ वाद्धि विना विद्रुममुद्बभूवाऽशोकं विनाऽस्योदलसत् प्रवालम् । बिम्बी विना बिम्बमलालगी(लीलग ?)द्वा किं धूतबन्धूकमदो यदोष्ठः ॥९॥ पद्मेन्दनाद्यद्वदनं समासभ्रूश्रीकरी ध(धा)रयते पुरापि । राज्ञो जयाल्लोहितशुण्डदडं (दण्ड-) भालातपत्रं त्वधुना तदूर्वम् . ॥१२॥ आच्छिद्य पुष्पेषुभटाद्दयालुः शङ्के स्वनासामिषतो निषङ्गम् । या न्यग्मुखीकृत्य करोति रिक्तं न्यध्याय्यधस्तद्विजपुष्पपङ्क्तिः ॥९३।। स्वत्यागधत्तूरकृतार्चशम्भोः खेदाय तद्वन्द्यपदामुपास्ते । सूक्ष्मान्तपक्ष्माङ्कुरकण्टकोद्य Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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