Book Title: Anusandhan 1999 00 SrNo 15
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 57
________________ महोपाध्याय श्रीसकलचंद्रजीगणि विरचित भुनिवरसुरखेली -सं. मुनि कल्याणकीर्तिविजय आ मुनिवरसुरवेलीनी रचना सत्तरभेदी पूजाना कर्ता तरीके जगप्रसिद्ध एवा महोपाध्याय श्रीसकलचंद्रजी गणिए करेली छे । नाम प्रमाणे ज आमां २४ तीर्थंकरोना शासनमां थयेल विविध साधुभगवंतो तथा महासतीओनी स्तवना करवामां आवी छे । तेमां मुख्यत्वे ठाणांग, भगवतीसूत्र, ज्ञाताधर्मकथा, अंतगडदसा, इसिभासिआई वगेरे आगमोना आधारे २४ तीर्थंकरोना गणधरो तथा साधुओनी संख्या कही छे; अने ऋषभदेव भगवानना पुत्रो तेमनी परंपरामां मोक्षे तथा अनुत्तरविमाने गयेला असंख्यात राजाओनी अने २३ तीर्थंकरोना शासनमां थयेल घणा उदारचरित साधुभगवंतो, साध्वीजीओ तथा महासतीओनी स्तवना करी छे । तदुपरांत महावीरस्वामी भगवाननी पाट - परम्परामां आवेला श्रीदेवर्द्धिगणि क्षमाश्रमण सुधीना स्थविर भगवंतोनी स्तवना करी छे । छेल्ली ढाळमां २० विहरमान जिनेश्वर भगवंतोने नामपूर्वक वंदना करी छे अने प्रान्ते, पांचमा आराना छेडे थनारा आचार्य श्रीदुप्पसहसूरिमहाराजने वंदना करी सुरवेलीनुं समापन कर्तुं छे । वच्चे वच्चे मधुर प्राकृत गाथाओथी मिश्रित आ सुरवेलीमां कुल २१ ढाळो छे, जेमां १४४ कडी छे । छट्ठी ढाळ प्राकृतभाषामां छे अने छेल्ली ढाळ संस्कृतमां छे । प्राकृत गाथाओ १६ छे । प्रतिनां कुल ८ पत्रो छे, अने तेनुं लेखन वि. सं. १६८२ ना कार्तिक सुदि १५ना दिवसे थयुं छे तेवुं अंते लखेली पुष्पिकाथी जणाय छे। मुनिवरसुरवेली ॥ नमः ॥ तुं जिनवदनकमलनी देवी तुं सरसति सुरनरपति सेवी । तुं कविजन - माता सुअदेवी तिइ मुझ निर्मल- प्रतिभा देवी ॥१॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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