Book Title: Anusandhan 1999 00 SrNo 15
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 13
________________ अनुसंधान - १५ • 8 दैत्यादृतध्वान्तचमूदयेऽचिश्चकारुणं चक्रमभूत्तदीयम् रेजेऽर्कबिम्बि(म्बं ?) वरुणेभकुम्भः सिन्दूरपूरच्छुरणारुणः किम् ? |. किं तद्वधूकुङ्कुमितास्यपद्मच्छायारुणः स्फाटिकदर्पणो वा श्रीकण्ठकान्तामगमं न गङ्गामित्यात्मशुद्ध्यै पुरतः सुराणाम् । उत्तुङ्गकल्लोलकरेऽर्कगोलं दधे क्रमादम्बुधिरग्निवर्णम् पत्युः प्रतीच्यास्तुरगेभगर्भरत्नैर्भृतं मन्दिरमम्बुराशि: । तस्योपरिष्टादहिमांशुबिम्बं (?) शिश्राय शोणोपलकुम्भशोभाम् अम्भोल्पमग्नार्कमिषेण लक्ष्म्याः प्रमीलितायाः प्रियसिन्धुतल्पे । तुङ्गः स्तनः पीडनपाटलः किं जातोऽनिलोद्भूतदुकूलदृश्य: मन्ये तमोभिः कृतरथ्यरङ्गतुरङ्गरूपै रविरात्मवैरी । नीत्वोपकण्ठं धिगपाति पापैः पाथोधिमध्ये तदनु प्रसस्ने ॥२७॥ Jain Education International ॥२८॥ ॥२९॥ ||३०|| ॥३१॥ ॥३२॥ कालीं तम:कञ्चलिकां सतारा-मुक्तामदृश्येन्दु-तरण्यु रोजाम् । सन्ध्यानुरागोरगवल्लिरङ्गा चङ्गा मुखे (s ? ) वस्त कुहूकुलस्त्रीः ॥ ३३ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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