Book Title: Uttaradhyayan Sutram
Author(s): R D Wadekar, N V Vaidya
Publisher: Fergussion College

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Page 31
________________ ११.३२-] उत्तराध्ययनसूत्रम् तम्हा सुयमहिटिज्जा उत्तमट्टगवेसए । जेणऽप्पाणं परं चेव सिद्धि संपाउणेज्जासि ॥ ३२ ॥ त्ति बेमि॥ · ॥ बहुस्सुयपुज्जं समत्तं ॥११॥ ॥हरिएसिज्जं द्वादशं अध्ययनम् ॥ सोवागकुलसंभूओ गुणुत्तरधरो मुणी। हरिएसबलो नाम आसि भिक्खू जिइन्दिओ ॥१॥ इरिएसणभासाए उच्चारसमिईसु य। जओ आयाणनिक्खेवे संजओ सुसमाहिओ ॥२॥ मणगुत्तो वयगुत्तो कायगुत्तो जिइन्दिओ। भिक्खट्टा बम्भइज्जाम्मि जन्नवाडं उवढिओ ॥३॥ तं पासिऊणमेज्जन्तं तवेण परिसोसियं। पन्तोवहिउवगरणं उवहसन्ति अणारिया ॥४॥ जाईमयपडिबद्धा हिंसगा अजिइन्दिया। अवम्भचारिणो बाला इमं वयणमब्बवी ॥५॥ कयरे आगच्छइ दित्तवे काले विगराले फोकनासे। ओमचेलए पंसुपिसायभूए संकरसं परिवरिय कण्ठे ॥६॥ को रे तुवं इय अदंसणिज्जे काए व आसाइहमागओ सि। ओमचेलगा पंसुपिसायभूया गच्छ क्खलाहि किमिहं ठिओ सि ॥७॥ जवखे तहिं तिन्दुयरुक्खवासी अणुकम्पओ तस्स महामुणिस्स। पच्छायइत्ता नियगं सरीरं इमाइं वयणाइमुदाहरित्था ॥८॥ समणो अहं संजओ बम्भयारी विरओ धणपयणपरिग्गहाओ। परप्पवित्तस्स उ भिक्खकाले अन्नस्स अट्ठा इहमागओ मि ॥९॥ वियरिज्जइ खज्जइ भुज्जई य अन्नं पभूयं भवयाणमेयं । जाणेह मे जायणजीविणु त्ति सेसावसेसं लभऊ तवस्सी ॥१॥ उवक्खडं भोयण माहणाणं अत्तट्रियं सिद्धमिहेगपखं । नऊ वयं एरिसमनपाणं दाहामु तुज्झं किमिहं ठिओ सि ॥११॥

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