Book Title: Purudev Champoo Prabandh
Author(s): Arhaddas, Pannalal Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 315
________________ २७६ पुरुदेवचम्पूप्रबन्धे [७१५१महाकच्छप्रधानपार्थिवैश्च निरीक्ष्यमाणपरिनिष्क्रमणः, साकेतपुरस्य नातिदूरे सिद्धार्थकवनोद्देशे, निरन्तरनिचिततरुनिकरनिष्पतत्पुष्पोपहारशोभिते, पुरंदरसुन्दरीकरारविन्दकल्पितरत्नचूर्णरङ्गवलिविराजिते, सुरवाराङ्गनारब्धमङ्गलसंगीतमनोहरे, विशङ्कटपटपरिकल्पितमण्डपमण्डिते, पर्यन्तनिहितविविधमङ्गलद्रव्यसंगते, पाण्डुकशिलातलविलासोपहासिनि, कस्मिंश्चिच्चन्द्रकान्तशिलातले ५ गीर्वाणैरुर्वीमवतारिताद्यानादवततार । $ ५१ ) क्षणं तत्र स्थित्वा नरसुरसभां स्निग्धमधुरैः ___कटाक्षः संभाव्य स्वजनमयमापृच्छय सहसा। सुरेन्द्र संनद्धे परिचरति मध्येयवनिक ___ स नःसङ्गयं भेजे वसनमणिमाल्यानि विसृजन् ॥३८|| १० ५२ ) ततः पूर्वमुखं स्थित्वा कृतसिद्धनमस्क्रियः । तत्सर्वं विभुरत्याक्षीन्निव्यंपेक्षं त्रिसाक्षिकम् ।।३९।। भरतेश्वरबाहुबलिकच्छमहाकच्छाः ते प्रधानाः प्रमुखा येषु तथाभूता ये पार्थिवा राजानस्तैः निरीक्ष्यमाणं समवलोक्यमानं परिनिष्क्रमणं विरज्य निर्गमनं यस्य तथाभूतः, सन्, साकेतपुरस्य अयोध्यानगरस्य नातिदूरे समीपस्थे सिद्धार्थकवनोद्देशे सिद्धार्थकाभिधानवनमध्ये, निरन्तरनिचितात् निर्व्यवधानसंगतात् तरुनिकरात् १५ वृक्षसमहात निष्पतता पप्पोपहारेण कुसमोपायनेन शोभिते समलंकृते, परंदरसुन्दरोणामिन्द्राणीनां करारविन्दैः पाणिपः कल्पिता रचिता या रत्नचर्णरङ्गवलिस्तया विराजिते शोभिते, सूरवाराङ्गनाभिरप्सरोभिरारब्धं प्रक्रान्तं यत् मङ्गलसंगीतं तेन मनोहरे रमणीये, विशङ्कटपटैर्विशालवस्त्रः परिकल्पितेन रचितेन मण्डपेन आस्थानेन मण्डिते शोभिते, पर्यन्ते समीपे निहितानि स्थापितानि यानि विविधमङ्गलद्रव्याणि नानामङ्गल वस्तूनि तैः संगते सहिते, पाण्डुकशिलातलस्य विलासं शोभां उपहसतीत्येवं शीले कस्मिश्चित् चन्द्रकान्तशिलातले २० चन्द्रकान्तदृषत्तले गीर्वाणैरमरैः उर्वी पृथिवीम, अवतारितात् प्रापितात् यानात् शिविकायाः अवततार अवतरति स्म ॥६५१) क्षणमिति-सोऽयं जिनः तत्र शिलातले क्षणं स्थित्वा स्निग्धमधुरैः स्नेहपूर्णमनोहरैः कटाक्षरपाङ्गः नरसुरसभां मनुजामरसमिति संभाव्य संमान्य स्वजनमात्मीयजनं नाभिराजादिकमित्यर्थः आपृच्छय आमन्त्र्य संनद्ध तत्परे सुरेन्द्र सौधर्मेन्द्र परिचरति परिचर्या कुर्वाण सति, सहसा झटिति मध्येयवनिकं यवनि काया मध्ये वसनमणिमाल्यानि वस्त्ररत्नस्रजो विसृजन् त्यजन् नैःसङ्गयं नैर्ग्रन्थ्यं भेजे प्राप। शिखरिणी २५ छन्दः ॥३८॥ ६ ५२ ) तत इति-ततस्तदनन्तरं पूर्वमुखं यया स्यात्तथा स्थित्वा कृता सिद्धेभ्यो नमस्क्रिया महाकच्छ आदि राजा जिनके दीक्षाकल्याणकको देख रहे थे ऐसे भगवान् वृषभदेव, अयोध्या नगरके समीपवर्ती सिद्धार्थकवनके मैदानमें चन्द्रकान्त मणिके किसी शिलातलपर देवों द्वारा पृथिवीपर उतारी हुई पालकीसे नीचे उतरे। जिस शिलातलपर भगवान उतरे थे वह व्यवधान रहित एक दूसरेसे मिले हुए वृक्षसमूहसे गिरनेवाले फूलोंके उपहारसे ३० सुशोभित हो रहा था, इन्द्राणी द्वारा अपने करकमलसे रचित रत्नोंके चूर्णकी रंगवलिसे शोभायमान था, अप्सराओंके द्वारा प्रारब्ध मंगलमय संगीतसे मनोहर था, विशाल वस्त्रोंसे निर्मित मण्डपसे सुशोभित हो रहा था, समीपमें रखे हुए नाना प्रकारके मंगलद्रव्योंसे सहित था, और पाण्डुक शिलातलकी शोभाका उपहास कर रहा था। $५१) क्षणमिति-वृषभ जिनेन्द्रने वहाँ क्षणभर ठहर कर स्नेहपूर्ण मनोहर कटाक्षोंसे मनुष्य और देवोंकी सभाको ३५ सम्मानित किया तदनन्तर आत्मीयजनोंसे पूछकर सावधान इन्द्र के परिचर्या में लीन रहते हुए परदाके भीतर वस्त्र मणि तथा मालाओंका त्याग कर उन्होंने शीघ्र ही निर्ग्रन्थमुद्रा धारण कर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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