Book Title: Purudev Champoo Prabandh
Author(s): Arhaddas, Pannalal Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 379
________________ ३४० पुरुदेवचम्पूप्रबन्धे [९।१४०स्वेत्याज्ञप्तश्चमपतिरधिरूढवाजिरत्नः पुरस्कृतदण्डरत्नः तद्गुहाद्वारमासाद्य निभिद्य च दण्डरत्नेन तन्मुखनिसृतोष्मज्वालाकलापादश्वरत्नरयेण सुरनिकरेण च रक्षितो बभूव । $ ४० ) निपेतुरमरस्त्रीणां कटाक्षः सममम्बरात् । सुमनःप्रकरास्तस्मिन् हारा इव जयश्रियः ॥२६।। ६४१ ) तदनु चम्पतिः सकलबलपरिवृतो विजयागिरितटवेदिकामतीत्य सिन्धुनदीपश्चिमदिग्भागवेदिकातोरणद्वारेण निर्गत्य म्लेच्छखण्डमण्डनायमानविविधाकरपुरग्रामसीमारामादिषु विगाह्य प्रतिष्ठापितचक्रवर्तिशासनः समागतम्लेच्छभूपालान् पुरस्कृत्य त्रिःपरीत्य च म्लेच्छखण्डं म्लेच्छराजसेनया सह निर्याय पर्यायेणातीतसिन्धुवनवेदिकाद्वारः षण्मासैः प्रशान्तोष्मदुःखं तद्गुहामुखं पुनरासाद्य संशोध्य च कृतरक्षाविधिश्च चक्रघरदर्शनलालसा प्रविश्य विजयशिबिरं तत्र १० तगिरिगुहाद्वारप्रवेशोपायो येन तथाभूतम् आदितेयं देवं सबहुमानं ससत्कारं विसयं, प्रसन्नेन प्रसन्नचेतसा चक्रधरेण चक्रवर्तिना शेषं सुगमम् । ६४० ) निपेतुरिति-तस्मिन् भरतनिधीश्वरसेनापती अमरस्त्रीणां देवाङ्गनानां कटाक्षरपाङ्गः समं सार्धम् अम्बरात् गगनात् जयश्रियो विजयलक्ष्म्या हारा इव सुमनःप्रकराः पुष्पसमूहाः निपेतुः निपतन्ति स्म ॥२६॥ ६.) तदन्विति तदनु तदनन्तरं सकलबलेन समग्रसैन्येन परिवृतः परीतः चमूपतिः सेनापतिः विजयाईगिरितटवेदिकां रजताचलतटवितर्दिकाम् अतीत्य समुल्लङ्घय १५ सिन्धुनद्याः पश्चिमदिग्भागवेदिकायास्तोरणद्वारेण निर्गत्य म्लेच्छखण्डस्य मण्डनायमाना ये विविधा नानाप्रकारा आकरपुरग्रामसीमारामास्तदादिषु विगाह्य प्रविश्य प्रतिष्ठापितं चक्रवर्तिशासनं येन तथाभूतः सन् समागताः समायाता ये म्लेच्छभूपाला म्लेच्छराजास्तान पुरस्कृय अग्रेकृत्य म्लेच्छखण्डं त्रिःपरीत्य च त्रीन् वारान् परिक्रम्य च म्लेच्छराजसेनया सह निर्याय निर्गत्य पर्यायेण क्रमेण अतीतं सिन्धुवनवेदिकाया द्वारं येन तथाभूतः सन्, षण्मासैः मासषट्केन प्रशान्तोष्मदुःखनिवृत्तोष्ण्यदुःखं तद्गुहामुखं पुनरासाद्य प्राप्य संशोध्य च कृतो २० रक्षाविधिर्येन सः चक्रधरस्य दर्शने लालसा यस्य तथाभूतः सन् विजयशिबिरं प्रविश्य तत्र विचित्रो विलक्षणो देवको सम्मानके साथ विदा कर चक्रवर्तीने गुहाका द्वार खोला तथा जब तक यह शान्त होता है तब तक पश्चिम खण्डपर विजय प्राप्त करो इस प्रकार सेनापतिको आज्ञा दी। सेनापति भी अश्वरत्नपर सवार हो तथा दण्डरत्नको आगे कर उस गुहा द्वारपर पहुँचा । पहुँचते ही उसने दण्डरत्नके द्वारा गुहाद्वारको तोड़ा। उस समय गुहाद्वारके मुखसे जो २५ अत्यन्त गर्म ज्वालाओंका समूह निकल रहा था उससे अश्वरत्नके वेग तथा देवों के समूहने सेनापतिकी रक्षा की थी। $ ४० ) निपेतुरिति-सेनापतिपर देवांगनाओंके कटाक्षोंके साथ आकाशसे पुष्पसमूहकी वर्षा हुई। उस समय वे पुष्पसमूह ऐसे जान पड़ते थे मानो विजय लक्ष्मीके हार ही हों ।।२६।। ६ ४१ ) तवन्विति-तदनन्तर समस्त सेनासे घिरा हुआ सेनापति विजयाध पर्वतकी तटवेदीको लाँघ कर तथा सिन्धु नदीके पश्चिमदिग्भाग सम्बन्धी वेदिकाके तोरण द्वारसे निकल कर म्लेच्छ खण्डके आभूषण स्वरूप नाना प्रकारके खान, पुर, ग्राम और सीमाके उद्यानादिमें जा पहुँचा। वहाँ उसने चक्रवर्तीका शासन स्थापित किया तत्पश्चात् आये हुए समस्त म्लेच्छ राजाओंको आगे कर तथा म्लेच्छ खण्डके तीन चक्कर लगा कर वह म्लेच्छ राजाओंकी सेनाके साथ वहाँसे निकला और क्रमसे सिन्धु नदीकी वन वेदिकाके द्वारको पार कर छह माहमें जिसकी गर्मीका दुःख शान्त हो गया था ऐसे गुहाके ३५ द्वारपर फिरसे आया। उसका शोधन कर तथा रक्षाकी विधिको पूर्ण कर चक्रवर्ती के दर्शनकी लालसा रखता हआ वापस आया। वहाँ विजय-शिविर में प्रवेश कर वह चक्रवर्तीके अद्धत Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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