Book Title: Samveg Rangshala
Author(s): Jinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
Publisher: Kantilal Manilal Zaveri

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Page 674
________________ संवेग रंगसाला सिद्धभगवतः गुणानां स्वरूपं शरण-स्वीकारे उपदेशः च । ॥६३६॥ सव्योवलेवरहिए, अहेउणो सपरकम्मबंधस्स । अह भगवंते सिद्धे, सुंदर! सरणं पवजाहि ॥८२६५॥ ववगयकम्माऽऽवरणे, नित्थरियसमत्थजम्मजरमरणे । तेलोक्कसिराऽऽभरणे, सव्वजगजीववरसरणे ॥८२६६॥ खाइयगुणप्पभूए, समत्थतेलोककयपरमपूए । सासयसोकूखसरूवे, दूज्झियवन्नरसरूवे ॥८२६७॥ मंगलनिलए मंगल-निबंधणे परमनाणमयतणुणो। अह भगवंते सिद्धे, सुंदर! सरणं पवजाहिं ॥८२६८॥ लोयऽग्गसंनिविटे, साहियदुस्सज्झसन्वपरमढे । पत्तपगिट्ठपइठे, एत्तो च्चिय निट्ठियढे वि ॥८२६९।। सद्दाऽऽईणमऽगम्मे, अमुत्तिमंते अनि दियजनाणे । परमाऽइसयसमिद्धे, सिद्धे सरणं पवजाहि ॥८२७०॥ अच्छिज्जे धाराणं, अमिंदणिज्जे य सव्वअणियाणं । अपलावणिजरूवे, जलाणमऽग्गीण य अडझे ॥८२७१।। पलयपबलानिलाण वि, अहीरणिज्जे न वजदलणिज्जे । सुहमे निरंजणे अकुख-ए य अच्चिन्तमाहप्पे ॥८२७२।। अच्चन्तपरमजोगीहि, चेव जाणियजहट्ठियसरूवे । कयकिच्चे निच्चे वि य, अजे य अजरे अमरणे य ॥८२७३॥ इणिउमणो नियकम्म, सम्म आराहणाणिविट्ठो य। सुंदर ! तुम विसप्पंत-तिव्वसंवेगरसफुण्णो ॥८२७४॥ सिरिमते भगवंते, अरुहंते सव्वहा विजयवंते । परमेसरे सरण्णे, सिद्धे सरणं पवजाहि ॥८२७५॥ सइ अहिगयजीवाऽजीव-पमुहपरमत्थवित्थरे सम्म । समवगयपयइनिग्गुण-संसाराऽऽवाससब्भावे ॥८२७६॥ संवेगगरुयगीयत्थ-सुद्धकिरियापराण धीराणं । सारणवारणचोयण-पडिचोयणदायगाणं च ॥८२७७॥ सुगुरूण पायमूले, सम्म पडिवनपुन्नसामण्णो । अह समणे निग्गंथे, सुदर! सरणं पवजाहि ८२७८॥ ॥६३६॥

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