Book Title: Samveg Rangshala
Author(s): Jinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
Publisher: Kantilal Manilal Zaveri
View full book text
________________
संवेगरंगसाला
सिद्धस्य स्वरूपं सौख्यं च।
॥७४९॥
सव्वं खवेइ तं पुण, निल्लेवं किंचि दुचरिमए समए । किचि व्व होइ चरिमे, सेलेसीए तयं वोच्छं ॥९७७०॥ मणुयगइजाइतसबाय-रं च पजत्तसुभगमाऽएजं । अन्नयरवेयणिज्ज, नराउमुच्च जसो नाम
॥९७७१॥ संभवओ जिणनाम, नराऽणुपुब्बी य चरिमसमयम्मि। सेसा जिणसंताओ, दुचरिमसमयम्मि निद्दिति ॥९७७२।। ओरालियाऽऽइसव्वाहि, चयइ विप्पजहणाहिं जं भणियं । निस्सेसतया न जहा, देसच्चारण सो पुब्बिं ॥९७७३॥ तस्सोदइया भावा, भव्वत्तं च विणियत्तए समयं । सम्मत्तनाणदंसण-सुहसिद्धत्ताणि मोत्तूर्ण
॥९७७४॥ रिजुसेडिं पडिवनो, समयपएसंऽतरं अफुसमाणो। एगसमएण सिज्झइ, अह सागारोवउत्तो सो ॥९७७५॥ उड्ढं बंधणमुक्को, तहा सहावत्तओ य सो जाइ । जह एरंडस्स फलं, बंधणमुक समुफिडइ
॥९७७६॥ परओ धम्माऽभावा, तस्स गई नत्थि कम्ममुक्कस्स । होइ अधम्मेण ठिई, साइअणतं च से कालं ॥९७७७॥ इह देहतिगं मोत्तुं, सिज्झइ गंतुं तहिं सहावत्यों। चरिमतणुतिभागूणं, अवगाहमुवेइ जीवघणं ॥९७७८॥ ईसीपब्भाराए, सीयाए जोयणेण लोगऽतो। सिद्धाणोगाहणया, उक्कोसं कोसछब्भाओ
॥९७७९॥ तेलोकमत्थयत्थो, सो सिद्धो दव्वपञ्जवसमेयं । जाणइ पासइ भगवं, तिकालजुत्तं जयमऽसेसं ॥९७८०॥ भावे समविसमत्थे, सूरो जुगवं जहा पयासेइ । लोगमलोगं च तहा, निव्वाणगओ पयासेइ ॥९७८१॥ जं नत्थि सबबाहाओ, तस्स सव्वं पि जाणइ जयं जं । जं च निरुस्सुगभावो, परमसुही तेण सुपसिद्धो ॥९७८२॥ परमिड्ढीपत्ताण, मणुजाणं नत्थि तं सुहं लोगे। अव्वाबाहमऽणुवर्म, जं सोक्खं तस्स सिद्धस्स ॥९७८३॥
।७४९॥

Page Navigation
1 ... 785 786 787 788 789 790 791 792 793 794 795 796 797 798 799 800 801 802 803 804 805 806 807 808 809 810 811 812 813 814 815 816 817 818 819 820 821 822 823 824 825 826 827 828 829 830 831 832 833 834 835 836