Book Title: Samveg Rangshala
Author(s): Jinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
Publisher: Kantilal Manilal Zaveri
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संवेग
रंगसाला
| सद्गुरोः
स्वरूपम् ।
॥६८१॥
सुयविमुद्दो गडरिया-पवाहमेत्ताऽणुसारिचरिओ य । धम्मऽत्थी वि सबुद्धीए, कट्ठाऽणुट्ठाणविहियरुई ॥८८६५॥ मग्गं पि चरिउकामो, चरमाणो वा मुणी तहारूवो। तस्स वि न चेव जायइ, विसओ एसो गुरुपरिक्खा ॥८८६६॥ भावियभवनेगुन्नस्स, जंतुणो जायभवविरागस्स । सद्धम्मपरूवगगुरु-गवेसिणो नणु इमा विसओ ॥८८६७॥ ता भवभयभीएणं, भविणा सद्धम्मबद्धलक्खेणं । धणवं व दरिदेणं, तरंडमिव जलहिपडिएण ॥८८६८॥ इह परमपयपुरप्पह-पयट्टपाणीण परमसत्थाहो । सन्नाणाऽऽड्गुणगुरू, परिकिखयव्वो गुरू णिउणं ॥८८६९॥ तुच्छप्फलो वि एको वि, रूबगो जइ परिक्खि गज्झो। परमफलओ गुरू ता, परिकिखयब्वो पयत्तेणं ।।८८७०॥ करितुरयोऽऽइ जह जए, सुगुणं ति मुणिज्जए सुचि'धेहि। तह सुहगुरू वि नेओ, धम्मुज्जमणाऽऽइलकखणओ॥८८७१॥ धम्मऽत्थकाममोक्खा, चत्तारि भवंति एत्थ पुरिसत्था । ते सुहगुरूवएसा, लब्भति विणा किलेसेणं ॥८८७२॥ इह जोगिणो कयत्था, विसिट्ठनाणाऽवलोइयपयत्या । दकखा सावाऽणुग्गह-करणे गुरुसंगमा होति ॥८८७३॥ | तिहुयणभवणऽभतर-पसरंतऽनाणतिमिरभरहणे । सन्जोइदित्तरूवो, पावपयंगकूरखए दकूखो ॥८८७४॥ बंछियपयत्थपयडण-परो य न भवेज नइ गुरुपईवो। अंधबहिरं इमं तो, जगं वरायं कहं हुन्तं ॥८८७५॥ गच्छद य समुच्छेयं, जह नाम सुवेजवयणओ वाही। तह सुहगुरूवएसाउ, कम्मवाही वि विन्नेयो ॥८८७६॥ कलिकालकवलियजए, वंछियविविहफलदाणदुल्ललिओ। अखंडगुणो सकखा, होइ गुरू कप्परुकूखो व्य॥८८७७॥ सम्मत्तनाणचरणाऽऽ-इएहिं भवजलहितारणसहेहि। निव्वाणकारणेहि य, गुणेहिं गरुओ गुरू होई ॥८८७८||
॥६८१॥
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