Book Title: Samveg Rangshala
Author(s): Jinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
Publisher: Kantilal Manilal Zaveri

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Page 749
________________ संवेग रंगसाला नन्दकृता वीरभगवतः |स्तुतिः । ॥७११॥ जय देव ! भीमभवसंभ-वोरुभयभंगविमलबाहुबल!। कलिकलिलहरणजलभर !, भूरिमहागुणगणाऽगार! ॥९२५९।। परसमयबहलतमतिमिर-हरणखरकिरण ! मारतरुदाव ! । जय तरलतरतुरंगम-समकरणोदारदामसम! ॥९२६०॥ जय मोहमहाकुंजर-कंठीरव ! लोभकमलहिमकिरण ! । संसारसरणिसंचरण-रीणबहुदेहिदाहहर! ॥९२६१॥ जय रोगजरामरणारि-वारभयविरहिदेह ! परमदम !। अदयापरागखरतर-समीर! मायाहिविहगवर ! ॥९२६२॥ जय करुणारससागर !, गरलसमाऽमय ! महीमहासीर! । रंभाभिरामरामा-रमणरसाऽबद्धसंबंध! ॥९२६३॥ जय जंतुविसरबंधुर-बंधो! संबंधबुद्धिविलयकर!। करणवरचरणसंगिरण-सार ! नयनिवहमयसमय! ॥९२६४॥ जय वंदारुसुरासुर-चूडामणि किरणपिंगचरणतल!। कंकेल्लिपल्लवाऽरुण-पाणिसरोरुह ! महाभाग! ॥९२६५॥ भववारिनिलयपारग!, गरिमाऽऽकर ! वीर ! धरणिधरधीर!। भवविच्छितिनिमित्त, भवंतमहमऽहमऽभिवंदे॥९२६६।। इय समसक्कयगाहाहिं, थुणि वीरं पवनजिणधम्मो । नंदमणियोरसेट्ठी, पहङ्कचित्तो गओ सगिहं ॥९२६७॥ परिवालेइ जहुत्त, बारसवयसुंदरं पि जिणधम्मं । विहरिउमाऽऽरद्वो जय-गुरू वि अन्नन्नट्ठाणेसु ॥९२६८॥ अह अन्नया कयाइ, विरहम्भि सुविहियोण साहूण । पुणरुत्तदसणेण य, अञ्चन्तमऽसंजयजणस्स ॥९२६९॥ हीयंतेसु य सम्मत्तपज्ज-वेसु पइकूखणं चेव । वच्चंतेसु य वुदि, बादं मिच्छत्तदलिएसु ॥९२७०॥ सो सम्मत्तविउत्तो, पोसहसालाए जेट्टमासम्मि । एगम्मि अवसरम्मि, सअट्ठमं पोसहं कुणइ ॥९२७१॥ अह अट्ठमतवकम्मे, परिणममाणमि नंदसेडिस्स । तन्हाछुहाकिलन्तस्स, एरिसी वासणा जाया ॥९२७२॥ ॥७११॥

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