Book Title: Samveg Rangshala
Author(s): Jinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
Publisher: Kantilal Manilal Zaveri

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Page 748
________________ संवेगरंगसाला ॥९२४६॥ ॥९२४७॥ ॥९२४८॥ ॥९२४९॥ वीरजिनस्य समीपे नन्दश्रेष्ठिकृतं ब्रतानां ग्रहणम् । ॥७१०॥ एवं मायासल्ल, वजित्ता खवग! सम्ममुज्जुत्तो। दुग्गइगमणनिमित्तं, चयाहि मिच्छत्तसल्ल पि मिच्छादसणसल्ल', मिच्छत्तं चेव सल्लमक्खायं । मिच्छत्तमोहकम्मस्स, उदयभावम्मि तं च तिहा उप्पजइ मइभेएण, संथवेणं कुतित्थियाऽऽणंदा। अहवाऽभिनिवेसेणं, जीवाणमऽपुण्णवन्ताणं एयं च अमुचतो, दाणाऽऽइरओ वि दुग्गई जाइ। नंदमणियारसेटिव्व, कलुसबुद्धीए हयसम्मो तहाहिएत्थेव जंबुद्दीवे, भरहे वासम्मि रायगिहनयरे । अतुलियबलसिरिसेणिय-भूवइभुयपरिहकयरकूखो वेसमणसमाणधणो, लोयाऽऽणंदो अहेसि नंदो त्ति । मणियारवणिपहाणो, सेट्ठी रनो वि महणिजओ सो एगया निसामिय, सामि जयवंधवं जिणं वीरं । पुरपरिसरे सुराऽसुर-थुणिजमाणं समोसरियं वंदणवडियाए लहुं, समागतो जायभत्तिपब्भारो। पयचारेणं चिय पउर-पुरिसपरियालपरिखित्तो तिपयाहिणापुरस्सर-मह महया गउरवेण जिणनाई। वंदित्ता धरणियले, आसीणो धम्मसवणत्थं अह तिहुयणेकतिलएण, धम्मनिलएण वीरनाहेण । पाणिवहविरइसारो, असञ्चचोरेकपम्मुक्को मेहुणचायपहाणो, परिग्गहग्गहविणिग्गहुग्गाढो। साहुगिहीण समुचिओ, रम्मो धम्मो समुवइट्ठो नंदमणियारसेट्ठी, सोऊण इमं च जायसुहबोहो । बारसवयसंपुग्नं, गिहत्थधम्म पवज्जेइ संसारुत्तिन' पित्र, मन्नता अप्पयं ततो सामि । गुरुभत्तीए भुज्जो, वंदित्ता थोउमाऽऽरद्धो ॥९२५०॥ ॥९२५१।। ॥९२५२॥ ॥९२५३॥ ॥९२५४॥ ॥९२५५॥ ॥९२५६॥ ॥९२५७॥ ॥९२५८॥ ॥७१०॥

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