Book Title: Kasaypahudam Part 13
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh
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गाथा १२३] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकन्जणिदेसो
* एदेण कमेण संखेन्जाणि ठिदिबंधसहस्साणि बहूणि गदाणि । $ ११६. सुगमं । * तदो अण्णो डिदिबंधो। $ ११७. तदो अण्णारिसो द्विदिबंधपयारो आढत्तो त्ति भणिदं होदि । * एकसराहेण मोहणीयस्स हिदिबंधो थोवो ।
११८. सुगमं । * णामा-गोदाणं पि कम्माणं ठिदिबंधो तुल्लो असंखेजगुणो । 5 ११९. एदं पि सुबोहं ।
* णाणावरणीय-दसणावरणीय अंतराइयाणं तिण्हं पि कम्माणं ठिविधंधो तल्लो असंखेजगुणो ।
$ १२०. पुव्वं वेदणीयडिदिबंधेण सरिसो एदेसि तिण्हं घादिकम्माणं ठिदिबंधो विसेसघादवसेण तत्तो असंखेज्जगुणहीणो होदूण हेट्ठा णिवदिदो त्ति एसो पुग्विन्लप्पाबहुअपयारादो एत्थतणो भेदो ।
* वेदणीयस्स डिदिबंधो असंखेजगुणो। * इस क्रमसे बहुत संख्यात हजार स्थितिबन्ध व्यतीत हुए । ६११६. यह सूत्र सुगम है। * तत्पश्चात् अन्य स्थितिबन्ध प्रारम्भ होता है ।
$ ११७. तत्पश्चात् अन्य प्रकारका स्थितिबन्ध प्रकार प्रारम्भ हुआ यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
* तब एक वारमें मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध अल्प हो जाता है। ६ ११८. यह सूत्र सुगम है।
* उससे नाम और गोत्रकर्मोंका भी स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य होकर असंख्यातगुणा होता है।
६११९. यह सूत्र भी सुबोध है।
* उससे ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय इन तीनों ही कर्मोंका स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य होकर असंख्यातगुणा होता है ।
5 १२०. पहले वेदनीयकर्मके स्थितिबन्धके सदृश इन तीन घाति कर्मोंका स्थिति बन्ध था जो विशेष घात होनेके कारण उससे असंख्यातगुणा हीन होकर नीचे निपतित हुआ यह पूर्वके अल्पबहुत्व प्रकारसे इस अल्पबहुत्वमें अन्तर है । . * उससे वेदनीयकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा होता है ।