Book Title: Kasaypahudam Part 13
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 372
________________ जाणदेसो M गाथा १२३] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकज्जणिहेसो ३२९ अंतोमुहुत्तमेत्तगुणसेढिगोवुच्छाणमेगीभूदाणमुदयदंसणादो । तं जहा-पढमसमयोवसंतकसायस्स ताव गुणसेढिसीसयं तत्थाविणट्टसरूवमुवलब्भदे। विदियसमयोवसंतकसायस्स वि दुचरिमगुणसेढिगोवुच्छा तत्थेव दीसइ । तदियसमयोवसंतकसायस्स त्तिचरिमगुणसेढिगोवुच्छा वि तत्थेव समुवलब्भदे । एवमेदेण कमेण पढमसमयम्मि कदगुणसेढिणिक्खेवायाममेत्तीओ चेव गुणसेढिगोवुच्छाओ तत्थ दोसंति। एदेण कारणेण विसयंतरपरिहारेणेत्थेवुक्कस्सओ पदेसुदओ गहिओ। एत्तो उवरिमसमयप्पहुडि जाव उवसंतकसायचरिमसमओ त्ति एदेसु वि द्विदिविसेसेसु एत्तियमेत्तीओ चेव गुणसेढिगोवुच्छाओ अणूणाहियपमाणाओ लब्भंति, तदो तत्थ वि उक्कस्सपदेसुदयसामित्तेणेदेण होदव्वमिदि वुत्ते ण, तहा घेप्पमाणे पयडिगोवुच्छावेक्खाए जहोकममेगेगगोवुच्छविसेसहाणिदंसणादो । तदो गोवुच्छविसेसलाहमदिसिय जहाणिद्दिढ विसये चेव सामित्तमेदं गहेयव्वमिदि सिद्धं । अत्राह-अपुव्वकरणपढमसमय म्हि कदगुणसेढिसीसयं उवसंतकसायपढमसमयणिक्खित्तगुणसेढिणिक्खेवभंतरे चेव हेट्टा समवलब्भदे, तदो तम्मि उदयमागदे मामित्तमेदं गेण्हामो, संचयगोवुच्छमाहप्पेण तस्स सुह बहुत्तदसणादो त्ति ? एत्थ परिहारो वुच्चदे–णेदं घेत्तु सकिञ्जदे, एदम्हादो सव्वदव्वादो समाधान--क्योंकि वहाँ पर एक पिण्ड होकर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण गुणश्रेणिगोपुच्छाओंका उदय देखा जाता है। यथा-प्रथम समयवर्ती उपशान्तकषायका गुणश्रेणिशीर्ष वहाँ अविनष्टरूपसे उपलब्ध होता है। द्वितीय समयवर्ती उपशान्तकषायकी भी द्विचरम गुणश्रेणिगोपुच्छा वहीं दिखलाई देती है। तृतीय समयवर्ती उपशान्तकषायकी त्रिचरम गुणश्रेणिगोपुच्छा भी वहीं उपलब्ध होती है। इस प्रकार इस क्रमसे प्रथम समयमें किये गये गुणश्रेणिनिक्षेपके आयामप्रमाण ही गुणश्रेणिगोपुच्छाएं वहाँ दिखलाई देती हैं । इस कारण दूसरे स्थानको छोड़कर यहीं पर उत्कृष्ट प्रदेश-उदयको ग्रहण किया है। am- यहाँसे जो अगला समय है उससे लेकर उपशान्तकषायके अन्तिम समय तक इन स्थितिविशेषोंमें भी न्यूनाधिकतासे रहित इतनी ही गुणश्रेणिगोपुच्छाएं प्राप्त होती हैं, इसलिये वहाँ पर भी उत्कृष्ट प्रदेशउदयका यह स्वामित्व होना चाहिए ? समाधान नहीं, क्योंकि वहाँपर उन स्थितिविशेषोंमें वैसा ग्रहण करने पर प्रकृति गोपुच्छाकी अपेक्षा क्रमसे एक-एक गोपुच्छाविशेषकी हानि देखी जाती है । इसलिये गोपुच्छाविशेषके लाभको लक्ष्य कर यथा निर्दिष्ट स्थानपर ही इस स्वामित्वको ग्रहण करना चाहिए यह सिद्ध हुआ। शंका—यहाँ पर शंकाकार कहता है कि अपूर्वकरणके प्रथम समयमें किया गया गुणश्रेणिशीर्ष उपशान्तकषायके प्रथम समयमें निक्षिप्त गुण णिशीर्षके भीतर ही नीचे उपलब्ध होता है, इसलिये उसके उदयको प्राप्त होनेपर इस स्वामित्वको हम ग्रहण करते हैं, क्योंकि संचयको प्राप्त हुए गोपुच्छाके माहात्म्यवश उसके बहुत अधिक प्रदेशोंका संचय देखा जाता है ? समाधान—अब यहाँ पर इस शंकाका परिहार करते हैं सबसे अधिक प्रदेशपुञ्जकी अपेक्षा इसे ग्रहण करना शक्य नहीं है, क्योंकि इस सम्बन्धी समस्त द्रव्यसे भी उपशान्त

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