Book Title: Anusandhan 2003 06 SrNo 24
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 21
________________ 16 हुं न न राचुं एणि जगि, मात तात सही जाणि । हीरु हीरा वुहुरसि श्रीविजयदान मणिखाणि || ३ || सेठि सधरमी थइ करूं, वुहुरं (रुं) धर्म क्रयाण । श्रीविजयदानसूरिंदनी, मानुं नित प्रति आण || ४ || ढाल ॥ इम कां बोलु बोल मातपिता कहि हीरजी रे, हैअडइ गाढिम कां ग्रही, इंम स्युं हुआ निटोलो रे चरण ( चारित्र) चितई वस्यु ॥१॥ करहु न केलिकल्लोलो, लछी विलसु रंगरोलो रे चारि० ॥१॥ 'नवि जाण्यु संसारनु, लीलां लहरी भोग बालपणइ वयरागस्यु रे, आदर कां मांडिउ तमे योगो रे || चा०२ ॥ अनुसंधान - २४ हीर कहि सुणि मातजी रे, वृद्धपणानी आस घडीइ घूंट भराइसि, चितमांहि घणुंअ उदासो रे ॥ चा० ३|| हीर कहि सुणिपूरवइ, ऋषि थावडुसु जोइ गयसकुमाल नारी तजी, अममत्तु तप सोइ ॥ चा० ४|| मेघकुमर नारी तिजी, छांडी राजनु भार षीधरणि(?वीरतणी ?) सेवा धरी, भवनु पामिउ तेणे पारो रे || चा०५ ॥ अवंतीकुंअर अलवेसरू, छांडी आठइ नारि नलिनीगुलम चिंतन करी, तरीउ एणइ संसारि रे || चा०६ || ढंढण बालऋष (षी) सरू, धन्नु शालिभद्र ते दोइ ऋद्धिरमणि छंडी करी ( पत्र ३ नथी; खंडित प्रति)...... Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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