Book Title: Anusandhan 2003 06 SrNo 24
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसंधान-२४ पहिलि पदि जपीइ अरिहंत बीजि सिद्ध भजो भगवंत । त्रीजि नमो पवयण संधारि चोथि आयरियाणं सार ॥२॥ पंचम पदि थेराणं सुणो छठि उवझायाणं गणो । निपुण नमो लोए[साहूणं] सातमि जपो नमो नाणस आठमि ॥३॥ नमो दंसणस नुमि धन्न दसमि नमो विनय संपन्न । इग्यारमइ नमो चारित्त बंभव्वय बारमि सुपत्त ॥४॥ किरियाणं तेरसमि जाणि नमो तवस्स चउदमि ठाणि । गणो नमो गोयम पनरमि नमो जिणाणं जपो सोलमि ॥५॥ गणि चारित्त नमो सतरमि नाणस्सय पद अट्ठारमि । नमो सुयस्स य ओगणीसमि तिम तित्थस्स नमो वीसमि ॥६।। एक(एम) वीसइ थांनकनां नाम जिनपद वशीकरण अभिराम । श्रीगुरु कनकविजयबुधसीस कहि गुणविजय जपो निसदिस ॥७॥
॥ वीस थानिक नाम सझाय ॥
(१४) श्रीगुणविजयविरचित ॥ श्रावकना पांत्रीस गुणनी सज्झाय ॥
सरसति चरणि नमाडी सीस पभणउं श्रावक गुण पांत्रीस । 'न्याय सहित संपति घरि भरइ शिष्टाचार प्रशंसा करइ ॥१॥
सरिखि धरमि वसि वीवाह करि धरी निज मन उच्छाह । "पाप थकी बीहइ निज हदइ ५अयशवाद नवि कहिनो वदइ ॥२॥ 'जे जे जिणि जिणि देशि उदार करि सदा ते ते आचार । "रूडा पडोसी नइ पासि भलि ठामि जस घरनो वास ॥३॥
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