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मोहरिते सच्चवयणस्स पलिमंथू ('ठाणंग' सूत्र, ५२९ )
'मुखरता सत्यवचननी विघातक छे
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अनुसंधान
प्राकृत भाषा अने जैन साहित्य विषयक संपादन, संशोधन, माहिती वगेरेनी पत्रिका
संकलन कार : मुनि शीलचन्द्र विजय हरिवल्लभ भायाणी
क
1000
શ્રી હેમચંદ્રાચાર્ય
कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्य नवम जन्मशताब्दी स्मृतिसंस्कार शिक्षणनिधि
अहमदाबाद
१९९५
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www.jajnelibrary.org
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मोहरिते सच्ववयणस्स पलिमंथू ( ठाणंग सुत्त, ४२९ ) 'मुखरता सत्यवचननी विघातक छे'
अनुसंधान
प्राकृत भाषा अने जैन साहित्य विषयक संपादन, संशोधन, माहिती वगेरेनी पत्रिका
५
संपादको : मुनि शीलचंद्रविजय हरिवल्लभ भायाणी
कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचंद्राचार्य नवम जन्मशताब्दी स्मृति संस्कार शिक्षणनिधि
अमदावाद
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अनुसंधान : ५
संपर्क :
हरिवल्लभ भायाणी २४/२, विमानगर, सेटेलाईट रोड, अमदावाद-३८० ०१५
प्रकाशक :
कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्य नवम जन्मशताब्दी स्मृति संस्कार शिक्षणनिधि, अमदावाद, १९९५
किंमत :
रू. २५-००
प्राप्तिस्थान : सरस्वती पुस्तक भंडार
११२, हाथीखाना, रतनपोळ, अमदावाद-३८० ००१
मुद्रक :
क्रिश्ना प्रिन्टरी हरजीभाई ऐन. पटेल ९६६, नाराणपुरा जूना गाँव, अमदावाद-३८० ०१३ दूरभाष : ७४८४३९३
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निवेदन
'अनुसन्धान' धीमी गतिए पण आगळ वधी रह्युं छे, ए बदल सहज परितोष अनुभवाय छे. प्रथम त्रण अंको सुधी तेनी नकलो संशोधनना क्षेत्रमां कार्य करनार अनेक मुनिवरो, विद्वानो, अभ्यासीओने तेम ज पत्रपत्रिकाओ तथा संस्थाओने मोकलवामां आवेली. चोथा अंकथी ते प्रथामां थोडीक मर्यादा आंकी, अने केटलांक स्थळे ए अंक भेट मोकल्यो, तेमां एक छापेल पहोंच धरावतुं कार्ड पण मोकल्युं. खेदनी बाबत एटली
आ कार्डमा पोताना हस्ताक्षर करी टिकिट लगाडी पार्छु मोकलवानी चीवट पण, पांचछ व्यक्तिने बाद करतां, कोई राखी नथी ! अने प्रथमना त्रण अंको मेळवनाराओ पैकी कोईनी, चोथो अंक प्रकट थयो के नहि ?/ थशे के नहि ?/ थाय त्यारे मोकलशो के नहि ?, आवी पडपूछ पण आवी नथी. 'अनुसन्धान' अनियतकालिक छे, अने ट्रस्टनी आर्थिक जोगवाईने आधीन तेनी प्रकाशन-वितरण-व्यवस्था होय छे, एटले लवाजमनो तो कोई प्रश्न ज नथी; छतां आटली बधी उदासीनता केम हशे ? तेवो प्रश्न, आ स्थितिमां, कोईने पण थाय खरो.
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अस्तु. फरी एकवार जाहेर करीए के आ पत्रिका संशोधनात्मक पत्रिका छे. ऊहापोह संशोधननो पायो छे. आमां आ आम ज होय/हतुं / हशे एवा वलणने कोई अवकाश न होय. आ दृष्टिने लक्ष्यमां राखी अभ्यासीओ आ पत्रिकामां रस ले ते अपेक्षित छे.
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: आर्थिक सौजन्य :
श्री कारेलीबाग श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ, वडोदरा
तरफथी 'अनुसंधान- ५ 'ना प्रकाशनमां संपूर्ण आर्थिक सहयोग प्राप्त थयेल छे.
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अनुक्रम १. 'धूमावलि'-प्रकरणं
संपा. आ. विजयसूर्योदयसूरि १ २. प्राकृतशब्दा संस्कृते नानार्थाः संपा. शीलचंद्रविजय गणी ४ ३. 'शब्दार्थ चन्द्रिका'
संपा. मुनि धर्मकीर्तिविजय १२ ___ (पं हंसविजय-विरचित) ४. वे सरस्वती-स्तोत्र
संपा. मुनि रत्नकीर्तिविजय २४ ५. हीरविजयसूरिनो लेख
संपा. मुनि महाबोधिविजय ३९ ६. शत्रुजय-मंडन-ऋषभदेव-स्तुति ____संपा. मुनि भुवनचन्द्र ४० ७. 'चोवीस-जिन नमस्कार' (अष्टमी,माहात्म्य-गर्भ)
संपा. शीलचन्द्रविजय गणि ४४ (वापक यशोविजय-कृत) ८. त्रण चउवीसी विहरमाण-जिन-स्तवन संपा. मुनि कल्याणकीर्तिविजय ४७
(लक्ष्मीसगरसृष्टि-शिष्य-कृत) ९. 'उवहाण पइट्ठा पंचासग' उपरथी फलित थतो एक मुद्दो
पं. शीलचन्द्रविजय गणि ५२ १०. उमास्वाति-आर्यसमुद्रनां नवप्राप्त पद्यो विषे मधुसूदन ढांकी ५४ ११. रिस्टोरेशन ऑफ धी ओरिजिनल
के. आर. चन्द्र ६० लेग्वेज ऑफ धी अर्धमागधी टेक्स्ट्स :
एक परिचय १२. ट्रॅक नोंध
६३-६७ १. वाचक उमास्वाति(?)नुं वधु एक पद्य २. शुं आ गप्पुं गणाय ? ३. 'स्थूर' विषे बे वधु उल्लेखो ४. 'नखच्छोटिका', 'ढौक', 'सुखासिका/दुःखासिका', "ललते'
शीलचन्द्रविजय गणि ५. 'पांडवचरित्र-बालावबोध'ना थोडाक शब्दप्रयोगो विषे मुनि भुवनचन्द्र
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६. केटलाक कथाघटको
६८-८० १ परपुरुषनो संग निवारवा स्त्रीने पेटमां संताडी राखवी २. बोलायेला बचनो अकस्मात् सांभळी भळतो.
ज अर्थ लेता हत्याराथी उगारो थवो ३. चार मूर्खाओ ४ गामडाह्यानो अज्ञानविलास : होदड जोशी ५. अक्कलना ओथमीर ६. अज्ञान ढांक्युं न रहे ७. उत्तम पुत्र प्राप्तिनुं शरती वरदान ८. खाउधरो शिष्य
९. सामान्य शब्दोनु मार्मिक अर्थघटन ह. भायाणी ७. प्रयोगनी पगदंडी
८१-८४ १. 'सीझवू' के 'सीजq' २. 'सुनासणा' ३. झंबइकगीत, वधु एक उहाहरण ४. गोरखनाथ, एक पद
ह. भायाणी नवप्रकाशित साहित्यनो परिचय
प्रकाशन-माहिती ८. अज्ञातकर्तृक अर्हत्प्रवचनसूत्र-सविवरण सं. शीलचंद्रविजय गणि ८८
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सूरिपुरन्दर श्री हरिभद्रसूरि-विरचित "धूमावली"-प्रकरण
----सं. आ. विजयसूर्योदयसूरि आचार्य श्री हरिभद्रसूरि महाराजनी अनेक रचनाओ प्रसिद्ध अने प्रतिष्ठित छे. तेमनी रचेली कृतिओनी नोंध 'गणधरसार्धशतकवृत्ति' (सुमतिगणि, सं. १२९५)मां तथा 'चतुर्विंशतिप्रबन्ध' (राजशेखरीय)मां मळे छे. ('हरिभद्रसूरिः जीवन अने कवन', ही. र. कापडिया, वडोदरा, पृ. ४८). पण ते सूचिओमां 'धूमावली' नामनी रचनानी कोई नोंध नथी.
'धूमावली 'नी प्राप्ति फुटकर-पत्रोमांथी आनायासे थई छे. एक ज पत्र, ते पण छेडेथी फाटेखें, जूनां पत्रो फेंदता फेंदता मळी आव्यु, अने ते जोतां १४मी गाथामां स्थित 'भवविरह' पदे ध्यान आकयु. आ पद तो हरिभद्रसूरिजीनी पाकी ओळखनुं पद गणाय. एटले आनी प्रतिलीपि अत्रे प्रस्तुत करी छे. आना विशे क्यांक उल्लेख मळे के आनी बीजी नकलो मळी आवे, तो आ कृति अने तेना कर्ता विशे वधु चोकसाई करी शकाय. अत्यारे तो 'भवविरह' पदने ज प्रमाणभूत गणी ते हरिभद्रसूरिकृत समजी अहीं प्रसिद्ध करवामां आवे छे.
___ 'जिनरत्नकोश' (वेलणकर, ई. १९४४, पृ. १९८) तपासतां तेमां जयभूषणकृत 'धूमावलिका' नामक कृतिनो तथा 'धूमावल्यादिवृत्ति' नामे शीलाचार्यनी रचनानो उल्लेख छे. वादिवेताल शान्तिसूरिकृत 'पर्वपंचाशिका' पर शीलाचार्यकृत वृत्ति ते ज 'धूमावल्यादिवृत्ति' होवानुं प्रा. वेलणकर निर्देशे छे.
_ 'पर्वपंचाशिका' जो के जिनेश्वरनी स्नात्रादिपूजाना विषयनी ज रचना छे, अने प्रस्तुत कृति पण धूपपूजाना विषयनी ज छे, छतां आ 'धूमावली' स्वतंत्र अथवा जुदी ज कृति छे, तेम कल्पना थाय छे. कृतिमां तूटतो अंश अटकलथी [ ] मां उमेर्यो छे. देखीता लेखनदोष सुधारी लीधा छे. लखावट जोतां प्रति (पार्नु) संभवतः १७ मा सैकानुं जणाय छे.
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(२)
"धूमावली"- प्रकरणम् ॥ असुरिंदसुरिंदाणं किनरगंधव्वचंदसूराणं। विज्जाहरियसुराणं सजोगसिद्धाण सिद्धाणं॥१॥ मुणियपरमत्थवित्थर-विगिट्ठविविहतवसोसियंगाणं । सिद्धिवहुनिब्भस्कंठियाण जोगीसराणं च॥२॥ जे पुज्जा भगवंतो तित्थयरा रागदोसतमरहिया। विणयपणएण तेसिं समुद्धओ मे इमो धूओ ॥३॥ तित्थंकरपडिमाणं कंचणमणिरयणविद्रुममयाणं। तिहुअणविभूसगाणं सासय-सुरवरकाणं च॥४॥ चमरबलिप्पमुहाणं भवणवईणं विचित्तभवणेसु। जाओ य अहोलोए जिणिंदचंदाण पडिमाओ॥५॥ जाओ य तिरियलोए किनरकिंपुरिसभूमिनयरेसु। गंधव्वमहोरगजक्खभूय तह(य)रक्खसाणं च ॥६॥ जाओ य दीवपव्वय-विज्जाहरपवरसिद्धभवणेसु। तह चंदसूरगहरिक्ख-तारगाणं विमाणेसु॥ ७॥ जाओ य उड्डलोए सोहम्मीसाणवरविमाणेसु। जाओ मणोहरसणंकुमारमाहिंदकप्पेसु॥ ८॥ जाओ य बंभलोए-लंतयसुक्के तहा सहस्सारे। आणयपाणयआरण-अच्चुयकप्पेसु जाओ य॥ ९॥ जाओ गेविज्जेसुं जाओ वरविजयवेजयंतेसु।
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(३)
तह य जयंतपराजि[यविमा]णसव्वट्ठसिद्धेसु॥ १०॥ सिद्धाण य सियघणकम्म-बंधमुक्काण परमनाणीणं।
आयरिया [ण तहेव य पं] चविहायारनिरयाणं॥ ११॥ तह य उवज्झायाणं साहूणं झाणजोगनिरयाणं। तवसो(सु)सियसरीराणं सिद्धिवहूसंगमपराणं॥ १२॥ सुयदेवया वि पंकय-पुत्थ[य]मणिरयणभूसियकराए। वेयावच्चगराण य समुद्धुओ मे इमो धूओ॥ १३॥ एवं अभित्थुया मो (मे) भावसुगंधेण परमधूवेण। तित्थयरसिद्धपमुहा सव्वे वि कुणन्तु भवविरहं।। १४।।
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प्राकृतशब्दाः संस्कृते नानार्थाः ॥
____ -सं. पं. शीलचन्द्रविजय गणि छाणीना प्र.श्री कान्तिविजयजी-शास्त्रसंग्रहमां क्र. ७१३नी प्रति, नामे 'प्राकृत शब्दोना संस्कृत अर्थ' एवी छे. २ पत्र छे. संभवतः १७मा शतकनी छे...
मूल १४ प्राकृत गाथाओ छे, ते पर संस्कृत विवरण छे. मूळ बीजी गाथाना "निन्हणकइणा भणिज्जंतं" ए सन्दर्भ जोतां 'निन्हण' नामे कोई कवि आ कृतिना कर्ता जणाय छे. आथी विशेष परिचय प्राप्त नथी. ६६ प्राकृत शब्दोना संस्कृतअनेकार्थो आमां कर्ताए वर्णव्या छे, जे प्रारंभिक अध्येताओने तेमज रचयिता अभ्यासुओने उपयोगी थई पडे तेम छे.
प्राकृतशब्दाः संस्कृते नानार्थाः ॥ इक्कम्मि पए पयडत्थसंगए बहुलअत्थसंदोहं। अप्पम्मि व अप्पाणं पिच्छंती भारई जयइ॥ १॥ इक्कं पाययसदं सक्क्यभेएण बहुविहवियप्पं । निसुणंतु सुअणसत्था ! निन्हणकइणा भणिज्जंतं ॥ २॥ मुणह पउत्तं एआरहेहि अहरं च पंचभेएण। अउलं चिअ पंचविहं सत्तासं छव्विहं होइ॥ ३॥
अत्र प्राकृते 'पउत्त' इति शब्दस्य संस्कृतेन व्याख्यायमानस्यैकादशार्था भवन्ति। यथा-प्रयुक्तं प्रेरितं १। प्रयुक्तः प्रमोहित:२। प्रवुप्तो मन्दः ३। प्रगुप्तोऽविज्ञातस्वरूपः ४। प्रकुतोऽतिशयेन कोपाविष्टः ५। प्रवृत्तः कर्तुं प्रस्तुत: ६। प्रोक्तो भणित: ७। प्रपुत्रः पुत्रपुत्रः ८। पदोक्तः पदकथितोऽर्थः ९। पयोक्तः पयसा मिश्रितः १० । प्रोप्तः सूत्रादिविद्धो हारादिः ११। एवमेकादशार्थाः 'पउत्त' शब्दस्य॥
तथा 'अहर' इति पञ्चधा। यथा -अधर ओष्ठाद्यनेकार्थः१ । अगृहो गृहरहित:२। अभरो भररहित: ३। अहरं अमहेश्वरं ४। अखर: कोमलः, अरासभः अपटुर्वा इत्ययं पञ्चप्रकारः॥
___'अउलः' पञ्चधा। यथा-अतुलोऽपरिमाणः १। अकुलः कुलरहितः २। अगुलः इक्षुविकाराभावः ३। अपुलोऽमहान् ४। अचुलोऽस्निग्धः ५।
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एवं 'सत्तास' इति षोढा। यथा -सत्रासः सभयः १। सप्ताश्वः सूर्यः २। सत्त्वाशो जीवादनः ३। शक्ताश्वो रथः ४। शप्ताश आक्रुष्टाभिलाष: ५। सत्त्वासः शूरः ६। एते षट्।। इति प्रथमगाथार्थः॥
सयलो अट्ठविहाणो सत्तसु भेएसु पयडिओ सवओ। पययत्ति सत्तभेओ पंचसु भेएसु सुइ सद्दो॥ ४॥
'सयल' इत्ययं संस्कृतेनाष्टधा। यथा-शकलः खण्डः १। सकलं समग्रं २। सदलः सपत्रः सकटको वा ३। सजलं सनीरं ४। सतलं साधारं ५। सचलं सकम्पं ६। सगलः सकण्ठः ७। स्वकल आत्मवर्गग्राहक: ८ इत्यष्टौ।
'सवय' इति सप्तधा। यथा -स्वपदं स्वस्थानं १। श्रवको दाता २। सव्रतः सानुष्ठानः ३। सव्रजः सगोकुलः ४। सवया वृद्धः समानो वा ५ । सवचा वाग्मी ६। सबको बक्युतः ७। एते सप्त।
'पयय' इति सप्तधा। यथा-पयो कमलं १। पयोदो मेघः २। पयोगा नदी ३। पतगः पक्षी ४। पदगः पदाति: ५। प्रकृतं प्रस्तुतं ६। प्रगतः प्रचलितः ७। एते
सप्त।।
"सुइ' इति पञ्चधा । यथा - श्रुतिर्वेदाधनेकार्थः १। श्रुतिः प्रवाहः २। शुचिराषाढाद्यनेकार्थः ३। शुदिः शुक्लपक्षो लोकप्रसिद्धः ४। शुचिः स्नानं ५। एते
पञ्च ॥
'सुरयण' सद्दो पञ्चसु, छसु भाणिओ अप्पमाणसद्दो य। तह तब्भेओ अमओ चउसुं अणहत्ति भणियव्वो॥ ५॥
अत्र 'सुरयण ' इति पञ्चधा भवति । यथा-सुरगणो देवसमुदायः १। सुरदनः सुदन्तः २। सुरचनं विशिष्टरचनायुक्तं वस्तु ३ । सुरत्नं पद्मरागादि दोषरहितं ४। सुरजनं शोभनरागः ५। एते पञ्च॥
'अप्पमाण' इति षोढा । यथा-अप्रमाणोऽमर्यादाद्यनेकार्थः १। अल्पमानः स्वल्पाहंकार: २। आत्ममान आत्मतुल्यः ३। आप्यमानः प्राप्यमानः ४। अर्घ्यमाणो ढौक्यमानः ५। अप्रमाज्ञो महच्छासनः ६।
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'अमय' इति षोढा। यथा-अमृतं पीयूषं १। अमृगो मृगरहितो देशः २। अमतं अनभीष्टं ३। अमदो मदरहितः ४। अमृजोऽशुद्धः ५। अमयं हरिमयं ६। एवं षट् ।।
__'अणह' इति चतुर्धा। यथा-अनखो नखहीनः १। अनघोऽपापः २। अनभोऽशून्यं ३। अनहो बन्धरहितः ४। एवं चत्वारः।।
अट्ठविहो सज्जत्थो पंचविहो सायरत्ति सस्थित्ति। चउहा विज्ज त्ति पयं तह सज्झो होइ तब्भेओ॥ ६॥
'सज्जो'ऽष्टधा। यथा-सों रालावृक्षः १। सज्जः प्रहः २। सज्यं समारोपितप्रत्यञ्चं धनुः ३। साज्यं सघृतं ४। सद्यस्तत्क्षणं ५। साद्य आदियुक्त ६। सार्य आर्ययुक्त: ७। षड्जः स्वरविशेषः ८॥
'सायर' इति पञ्चधा। यथा-सादरः सगौरवः १। स्वादरः स्वादुदाता २। सागरोऽब्धिः ३। साकर आकरयुक्तो देशः ४। सातरः सुखदः ५॥
_ 'सत्थि' इति पञ्चधा। यथा-स्वस्तिराशीर्वचः १। शस्तिः शस्त्रागारं शुद्धं वा २ । सक्त्थिर्जानुः ३। शास्तिदण्डः ४। शास्तिः शाधिः ५॥
___ 'विज्ज' इति चतुर्धा। यथा -वैद्यो भिषक् १। वीर्यं बलं २। वेद्यं ज्ञेयं ३। वीज्यं निर्वाप्यं ४।
... 'सज्झ' इति चतुर्धा। यथा-सह्यः पर्वतः सहनीयो वा १। साध्यं निष्पाद्यं २। सह्यः सप्रात: ३। साहाय्यं सहायित्वं ४॥ इति तुर्यगाथा पर्यायाः।।
णायं अहयं सवहं अहिमयरं तह सहाए संजुत्तं । पंच वि पंच पयारा नायव्वा सत्थकुसलेहिं ।।७।।
एते 'णाया' दि पञ्चापि पृथक् पृथक् पञ्चार्थाः। यथा-नाक: स्वर्ग: १। नागः सर्पाद्यनेकार्थः २। नादः शब्दः ३। न्यायो नीति: ४। ज्ञातमुदाहरणं अवगतं वा ५ ॥
"अहयं ' पञ्चधा। अहयोऽनश्वः १। अहतोऽप्रहतः २। अथ चेत्यानन्तर्यार्थमयं ३। अभयो निर्भयोऽपि ४। अभगोऽयोनिः ५॥
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(७)
'सवह' इति पञ्चधा । यथा - स्वपत स्वापं कुरुत १ । शपथः प्रतिज्ञा २ । सपथः समार्गः ३ । सवहः सवाहनः ४ । स्ववध आत्मवधः ५ ॥
'अहिमयरः' पञ्चार्थो यथा - अधिमकरः समुद्रः १ । अहिमकरः सूर्यः २ । अहिमचरः सर्पः ३ । अभिमतरोऽभीष्टदाता ४ | अहिमतरोऽत्युष्णः ५ ॥
'सहा' इत्ययमपि पञ्चार्थो यथा - स्वाभा स्वदीप्ति: १ । सभा परिषत् २ । सखा मित्रं ३ | स्वधा पितृवध: ४ । स्वहा आत्मघातकः ५ ॥ इति पञ्चमगाथार्थः ॥ आसासत्ति चउद्धा आयासं मुणह तह य तब्भेयं ।
पव्वइओ तह य च्चिय भणिओ कुहरति पंचविहो ॥ ८ ॥
'आसासा' शब्दश्चतुर्धा । यथा - आश्वासः संधारणं १ | आशाशं दिशिदिशि २ । आश्वास्यं हयमुखं ३ | आशास्यमाशंसनीयं ४॥
'आयास' श्चतुर्धा । यथा - आकाशं खं १ । आयासः खेदः २ । आयाशो आयभोक्ता ३ । आदासं दासपर्यन्तं ४ ॥
'पव्वइय' श्चतुर्धा । यथा - पार्वतिकः पर्वतनिवासी लोकः १ । प्रवजितो व्रती २ । पर्व इतः सन्धिगतः ३ । पर्वदिनो ग्रन्थिच्छिन्नः ४ ॥
'कुहर' इति पञ्चधा । यथा - कुधरः पर्वताद्यनेकधा १ । कुगृहः कुत्सितगृहः २ । कुहरो दरी ३ । कुभरः पृथ्वीधरः ४ । कुखर ईषत्कर्कशरूपः विरूपगर्दभो वा ५ । षष्ठगाथापर्यायाः ॥
कइलास कव्वफलिहा वास अहोवाह पत्र सउणा य । कीलालायणसहिआ एए अ चउव्विहा हुंति ॥
'कइलास' श्चतुर्धा । यथा- कैलाशो गिरिः १ । कविलासं कवीनां लसनं २ | कपिलाशः पिङ्गलाशो देशः ३ । कपिलासः कपीनां लसनं ४ ॥
'काव्यं' कवेर्भावः कर्म वा १ । क्रव्यमामिषं २ | क[इ]व ब्रह्म यथा ३ | कव्यं पैत्रं कर्म ४।
'फलिह' श्चतुर्धा । यथा - स्फटिक ः १ । परिखा खातिका २ । परिघः ३ । फलिहो रत्नविशेषः ४ ॥
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(८)
'व्यासो'ऽपि चतुर्धा। यथा-व्यासो मुनिः १ । वासो गृहं २। वासो वस्त्रं ३ । व्याशो नष्टदिक् ४॥
'अहो'ऽपि चतुर्धा। यथा-अहो आश्चर्ये १। अहर्दिनं २। अथो आनन्तर्ये ३ । अधस्तलपर्यायः ४॥
'वाहो'ऽपि चतुर्धा। यथा-वाहोऽश्वाद्यनेकार्थ १ । व्याधः २। बाष्पो अश्रुः ३ । बाधः पीडा ४॥
'पनो'ऽपि चतुर्धा। यथा-पर्णं पत्रं १। पण्यं विक्रेयद्रव्यं २। पण्या वेश्या ३। प्रज्ञा बुद्धि ४॥ . 'सउणो'ऽपि चतुर्धा। यथा-सगुणो गुणयुक्त: १। शकुन: पक्षी २। सपुनःसपुरुषः ३। पुनः पुनः स तु न । न पुनर्भवतीत्यर्थः ४॥
'कीलालाअण' इति चतुर्धा। यथा-क्रीडालागनो रतिविषयोत्पादयिता १। कीलालायनो मद्यमार्गो संधिरमार्गो वार। कीलालादनो राक्षस: ३। कीलालापणं मद्यकरहट्टं ४॥ इति सप्तमगाथापर्यायाः॥
सवणो चउप्पयारो विणय (विअण)त्ति मुहेण छव्विह वियप्यो । पंचविह सुत्तसद्दो तिहि भणिओ कईहिं वच्छे अ॥१०॥
'सवणो' पि चतुर्धा। यथा-सव्रण: सक्षतः १। सवनं यज्ञाद्यनेकधा २ श्रवणं श्रोत्राद्यनेकार्थः ३। स्वप्नं निद्रा ४॥
'विअणः' षोढा। यथा-व्यजनं तालवृन्तं १ । विजनं एकान्तः। विगणः पक्षवर्जः ३। द्विगुणः गुणद्वयं ४। वियणा वेदना ५। द्विजन: जनद्वययुक्तः॥ ६॥
'सुत्त' इति पञ्चधा। यथा -सूत्रं तन्त्राद्यनेकार्थं १। सुप्तः २। सूक्तं ३। सुक्तं मद्यविशेषः ४। सूतं सुवापं क्षेत्रं ५॥
_ 'वच्छ' स्त्रिधा। यथा-वृक्षः १। वक्षः २। वत्सोऽपत्यं वा ज्योति:प्रसिद्धो वत्सस्तारः ३ ॥
कोसिअ-कणि कलिआ कुच्छेअय-कइपहू असप्पत्ता। चित्तयरो अहिअजुओ इक्विको चउविहो सद्दो॥ ११॥
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'कोसिम' इत्याद्या वेदार्थाः॥ 'कोसिअ' क्रोत्सित आक्रुष्टः १। कौशिक उलूकादिः २ । कोऽशितः को भक्षितः कोऽतीक्ष्णो वा ३ । कोषितो जलशायी ४ ॥
'कणय' श्चतुर्धा । यथा -कनकं १ । कणय आयुधविशेषः२ । कनदः कुत्सितनदः ३। कणदः कणदाता ४॥
'कलिका' कुड्मलं १। कलिता लक्षिता २। कलिजा कलौ जाता ३ । कलिदा युद्धदायिनी ४॥
'कुच्छेअ'[य] चतुःप्रकारो यथा-कौक्षेयक: खड्गः १। कुच्छेदजः भूविनाशोत्पन्नः २। कूच्छेदको भूविनाशकरः ३ । कुच्छेदगो धरां गतः ४ ।।
___ 'कइ' चतुर्धा। यथा-कवि १ । कति संख्यावाची २। कविः धरैडक: ३। कपिर्वानरः ४॥
'पहूअ' श्चतुर्धा। यथा -प्रधूतः-प्रकम्पितः १। प्रभूतं बहु ३। प्रधूपो यक्षधूपादिः ३। प्रधूय इति क्त्वान्तः ४॥
'सपत्त' श्चतुर्धा । यथा -सपत्रः पर्णयुक्तः सवाहनो वा १। सपात्रः सभाण्ड: २। स्वप्राप्तः स्वयंग्राह: ३। सर्पत्र उरगत्राता ४॥
'चित्तयर' चित्रकर: चित्राम्बुदो वा १। चित्तचर: कामः २। चित्तदरो मनोभयं ३। चित्रगरो चित्रविषं ४॥ ..
'अहिअ' इति अधिक: १। अहितो विष्णुहितः शत्रुः २। अभिक: कामी ३। अहिजः सर्पजातः ४॥
पंच पओस-निसायर-गयाहरा पउहरो अ तब्भेओ। पाययसद्दो अट्ठसु पहाअरा इत्थ छब्भेया॥ १२ ॥
'पओसः' पञ्चधा। यथा-प्रदोषो रजनीमुखादिः १। प्रतोषः परिपुष्टिः २ । प्रकोश उत्कृष्टभाण्डागारादिः ३। प्रपोष उत्कृष्टपृष्टिः ४। प्रवोष उत्कृष्टपानं ५ ॥
'निसायरः' पञ्चधा। यथा-निशाकरश्चन्द्रो हरिद्राकरो हरिद्रोत्पादयिता वा १। निशाचरो रात्रिचरो राक्षसो वा रा निशातरो रात्रौ तरणं ३। निशागरो हरिद्राक्षोरः (दः) ४। निशादरो रात्रिभयं ५॥
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(१०)
'गयाहरः' पञ्चधा । यथा-गदाधरः १ । गदाहरो गदाचौरः २ । गताधरो विगतौष्ठः ३। गजाखरो हस्तिकोमलः ४। गवा वृषभेन आ समन्तात् चरतीति गवाचरः, ईश्वरो वा ५॥
'पओहर:' पञ्चधा। पयोधरो मेघादि: १। पयोहरो वडवाग्निरगस्तिर्वा २ : पयोभरो जलौधः ३। पयोगृहं समुद्रादिः ४। प्रगोखरं शोभन गोरासभं ५ ।।
'पाययो'ऽष्टधा। यथा -प्राकृत इतरजनः १। प्र(प्रा)गतं वर्य(र्या)गमनं २। पातकं अधर्मः ३। पातगः शीघ्रगामी ४। पादगः पदात्यादिः ५। प्रापदः प्रकृष्टज्ञानदः ६। पातजं श्रमः ७। पातयेति क्रिया ८॥
___'परयार:' षडों यथा-परदारः परभार्य: कापुरुषः २ । परकारः परप्रेरक: २ । परचारः परगतिः ३। परतारः परोद्धारक: ४। परजार: ५। परगारः परनिगरणं ६॥
_ 'पहायर:' षोढा। यथा-प्रभाकरो रविः १ । प्रभाचरो ज्योतिर्गमनं २। प्रभातरः प्रभातदाता सूर्यादि: ३। प्रभाजरः कान्त्या जीर्ण: ४। प्रभादरः कान्तिभयं ५। प्रभातरः प्रहारदः ६॥
सरयं सयणं सणयं गयणयरं सहिअ तहय सुव्वत्तं । मयणाही सामलया अट्ठासु इ(वि) पंचहा सद्दो ॥१३॥
'सरया'द्या पञ्चार्थाः। यथा-शरदृतुः १। शरदः शरखण्डकः शरप्रदः २। सरदः सदन्तः ३। सरको मद्यं ४। सरयः सवेगः ५।
"सयणः' पञ्चधा। शयनं पर्यङ्कादिः १। सजनो जनसहितः २। सदनं गृहं ३। सकणं कणसहितं सशब्दं वा ४। सगणः ससमूहः ५॥
"सणयः' पञ्चधा। सनयो नयसहितः १। सनगः सपर्वतः सवृक्षो वा २। सनतः ३। स्वनदः स्वशब्दः ४। सनकः पूज्यनरः ५॥
'गयणयरः' पञ्चधा। गगनचरः सूर्यादिः १। गतनगरो विपुरः २। गदनतरं प्रकृष्टवचः ३। गतनयरो गतन्यायप्रदः ४। गगनकरः आकाशकरः ५।
'सहियः पञ्चधा। सहितो हितयुक्तः १। सखितः सख्युः २। सखिदः सखिप्रदः ३। स्वहित आत्महितः ४। सखिगो मित्रसहगामी ५॥
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(११)
"सुव्वत्तं' पञ्चधा। सुवार्ता शोभनकथा १। सुव्यक्ता सुप्रकटा २। सुव्याप्ता सुक्रान्ता ३ । सुव्यात्ता सुप्रसारिता ४। शुल्बत्रा ताम्ररक्षक: ५।
"मयणाही' पञ्चधा। मृगनाभी १ । मदनाभी कामाभयः । मदनाधिः कामचिन्ता ३। मृतनाभिर्मृततुन्दं ४। मदनाही कामसौ ५।
___ 'सामलया' पञ्चार्थः । श्यामलता कृष्णलता कृष्णता वा १। सामलका आमलकसहिता २। सामलया देवविशेषप्रयोगा नीतिप्रयोगा वा ३ । सामलता प्रसिद्धा ४। सा मलदा मलं ददाति खण्डयति वा ५॥
सावय सद्दो पंचसु तब्भेओ सच्छरायणो पाओ। तह सुअ सरोअआ वि हु नायव्वा सत्थकुसलेहिं॥
प्राकृते 'सावयः' पञ्चार्थः। श्वापदोऽरण्यजीवः १। श्रावको जिनभक्तः श्रोता वा २। शापद आक्रोशदाता ३। सापगः सदापानीयो देशः सनदिको वा ४ ॥
'सच्छरायणः 'पञ्चधा। साप्सरोगण: -अप्सरोगणसहितः १। स्वाक्षरोगणः स्वकेन्द्रियदीपनः २। साक्षरायनः पण्डितगमन: ३। स्वच्छरदनो-स्वच्छदन्तसमूहः ४ । स्पप्सरायनं देवमार्गः ५॥
'पायः' पञ्चधा। प्रायो बाहुल्यं १। पादोंऽहिश्चतुर्थांशो वा २। पात: पतनं ३। पाक: पचनमन्नादेः ४। पापः पाप्मा नरः ५॥
'सुअ' पञ्चधा। यथा-सुतः पुत्रः १। शुक: कीरादिः २ । श्रुतं शास्त्रं कर्णाभ्यां पूर्वश्रवणं ३। शुक् शोकः ४। सुदः सुष्ठ दाता ५॥
__'सरोअअ' पञ्चधा। सरोजकं कमलं १। सरोगो रोगी तडाकगो वा २। सरोदयो नाडीवायुप्रचारः ३ । सरोपकं काण्डजलं ४ । सरोचको चिकरः पदार्थः ५ ॥
इति प्राकृतशब्दाः संस्कृते नानार्थाः ॥
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'शब्दार्थ - चन्द्रिका' ( पं. हंसविजय विरचित)
-सं. मुनि धर्मकीर्तिविजय
सत्तरमा सैकामां थयेला कविवर पंडित मुनिश्री हंसविजयजीए रचेली " शब्दार्थचन्द्रिका" नामे व्याकरणविषयक लघु रचना अत्रे यथामति संपादन करवापूर्वक प्रस्तुत छे. आ कृतिनी कर्ताए स्वहस्ते लखेली एक प्रति - ६ पत्रोनी मारा पूज्य गुरुमहाराज श्रीना अंगत पुस्तक संग्रहमांथी प्राप्त थई छे, तेना परथी संपादन करेल छे. अन्य भंडारोमां आनी बीजी प्रतिओ पण प्राप्त थाय छे, परंतु कर्ताना स्वहस्तनी प्रति उपलब्ध होवाथी अन्य प्रतिनो उपयोग कर्यो नथी.
सारस्वत व्याकरणना प्रथम बे पद्य उपर ग्रंथकारे "संहिता च पदं चैव " ए प्रसिद्ध पद्य - आधारित विशद विवरण आ रचनामां रजू कर्तुं छे, जे नवा अभ्यासीओ माटे घणुं उपकारक छे.
कर्तानी 'अन्योक्ति मुक्तावली' नामे अन्य सरस काव्यरचना छे, जे मने मारा गुरजी तरफथी जाणवा मळेल छे. पुष्पिकामां जणाव्या प्रमाणे ग्रंथकार तपागच्छीय आचार्य श्री विजयानन्दसूरि ( आणसूर शाखाना आद्याचार्य) जीना शिष्य हता. ऐतिहासिक साधनोना आधारे आ उपरथी तेमनो सत्तासमय सत्तरमो सैको होवानुं मानी शकाय .
विद्यार्थी एवा मारा माटे संपादननो आ प्रथम ज प्रयत्न छे, ए पण पूज्यपाद गुरुभगवंत श्री विजयसूर्योदयसूरि महाराजनी आज्ञा थवाथी करेल छे. तेथी आमां जे कांइ क्षति - स्खलनादि होय ते विद्वानो क्षन्तव्य गणशे तेवी आशा छे.
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(१३)
शब्दार्थचन्द्रिका-सवृत्तिः ॥ श्री शर्खेश्वरपार्श्वनाथाय नमः।
॥एँ नमः॥ ।। सकलभट्टारकपुरन्दर भट्टारक श्री ५ श्री विजयाणंदसूरीश्वरचरणकमलेभ्यो नमः ।।
ॐ नमः सिद्धिसन्तान - दायिने परमात्मने। श्रीमच्छङ्केश्वराह्वान-पार्वेशाय महस्विने ॥ १ ॥ श्रीवर्धमानस्संसिद्धयै वर्धमानमहोदयः।। स्ताद्विश्वविश्वविश्वेश-शक्रचक्रस्तुतक्रमः॥ २ ॥ हेतवे श्रेयसामेव पराय परमेष्ठिने। विधूतरागद्वेषाय कारुण्यनिधये नमः॥ ३ ॥ सारदां सा(शा)रदां स्मृत्वा शारदेन्दुतनुप्रभाम्। कर्पूरपूरन्यत्कार-कारिकीर्तिविराजिनीम्॥ ४ ॥ गुरुं श्री विजयानन्दं विजयानन्ददायकम्। नत्वा गौरीगुरुगिरि-ग्रावगौरगुणैर्गुरूम्॥ ५ ॥ बालानां बुद्धिबोधाय विनोदाय च वाग्मिनाम्। संक्षिप्तयुक्तिभिर्युक्ता गम्भीरार्थगरीयसी॥ ६ ॥
टि. १ - ॐमिति अवतीत्यौणादिके मप्रत्यये ज्वरतरेत्युठिगुणे स्वरादित्वादव्ययत्वे च सिद्धिः, तस्मै परमब्रह्मरूपायेत्यर्थः । अत्र धुरि मातृकयामिव ॐनमः इति पठितमन्त्रसिद्धमन्त्रोपन्यासः। प्रयोजनं चास्य निर्विघ्नमिष्टार्थसिद्धिरिति।
टि. २ - श्री वर्धमान इति श्रिया सकलत्रिभुवनजनमनश्चमत्कारकारिमनोहारिपरमार्हन्त्यमहामहिमाविस्तारि -
अशोकवृक्षः १ सुरपुष्पवृष्टिः २ दिव्यध्वनि ३ श्चामर ४ मासनं च। भामण्डल (लं) ६ दुन्दुभि ७ गतपत्रं ८ सत्प्रातिहार्याणि जिनेश्वराणाम्॥ इति स्पष्टाष्टप्रातिहार्यशोभया चतुस्त्रिंशदतिशयविभूत्या वा समन्वितो वर्धमानः श्रीवर्धमानः। टि. ३ - अयं श्री शब्दो महत्त्वप्रतिपादकः, पूज्यनामादौ लोके प्रयुज्यते । टि. ४ - कुतूहलाय।
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(१४) विचक्षणचकोरौघ-हर्षोत्कर्षविधायिनी। व्याख्या सुधास्राविणी च पदार्थानां प्रकासि(शि)नी॥७॥ अज्ञानोग्रतमःस्तोम-प्रध्वंसनपटीयसी। , सुबोधाऽगाधजलधि-लोलकल्लोलवर्द्धनी॥ ८॥ शब्दार्थचन्द्रिकाख्येयं शब्दशास्त्रेन्दुचन्द्रिका। सारस्वताद्यसत्पद्य-द्वयवृत्तिवितन्यते।। ९॥ (चतुर्भिः कलापकम्) निजानुजज्ञश्रीसिद्धि-विजयस्याग्रहान्मया। क्रियमाणप्रयत्नस्तान् मन्दधीबोधतत्फली॥ १०॥
इह हि किल निश्शेषसविशेषस्फूर्जद्वर्यपदार्थसार्थपरमार्थजिज्ञासूनां शिशूनां सम्यगशब्दव्युत्त्पत्यवबोधाय स्वकीयकमनीयकुशाग्रप्रतिमनिष्प्रतिम प्रतिभाप्रभाप्राग्भारपराभूतप्रबर्हबहिर्मुखाचार्यमानाभिमानैदंयुगीनचञ्चच्चतुरजनचेतश्चमत्कार करणाय य श्रीसारस्वतशब्दानुशासनादिमवृत्तद्वितयस्य व्याख्या संहितादिभेदेन षोढा प्रस्तूयते ।
यदुक्तं पूर्वसूरिभिः शास्त्रान्तरे- . संहिता (१) च पदं (२) चैव पदार्थः (३) पदविग्रहः (४) चालना (५) प्रत्यवस्थानं (६) व्याख्या तन्त्रस्य षड्विधा ।
अस्यार्थः सुबोध एव। तथापि चाक्षरगमनिकानिगमनाप्तक्वचनवचनरचना रचितसूचामात्रसूचनकृत् सूत्रसूत्रितभावार्थैकदेशो निरूप्यते।
अयमस्यार्थः- तन्त्रस्य व्याख्या षड्विधा भवति इति क्रियाकारक सण्टङ्कः । "यत्र अन्यत् क्रियापदं न श्रूयते तत्रास्तिभवन्तीत्यादि पुरः प्रयुज्यते" इति न्यायात् इति वृद्धवचनप्रमाण्याद्वा अ अनुक्तमपि 'भवति' पदं योजनीयम्। यदाहु:
अह्ना विना न सूर्यः सूर्यविहीनश्च वासरो नास्ति । कर्तृक्रिये तथैव हि संपृक्ते सर्वदा भवतः ॥१॥
इति । अत्र व्यारव्येति कोऽर्थः ? विशेषेण आख्यायते कथ्यतेऽधिकारात् अर्थ इति व्याख्या-व्याख्यानं, 'ख्या प्रकथने इति वचनात् । कस्य ? तन्त्रस्य। तन्यते विस्तार्यत इति तन्त्रं, तस्य तन्त्रस्य शास्त्रस्य।
तन्त्रं सिद्धान्ते राष्ट्रे च, परच्छन्दप्रधानयोः। अगदे कुटुम्बकृत्ये च, तन्तुवाने परिच्छदे॥१॥
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(१५) श्रुतिशाखान्तरे शास्त्रे करणे व्यर्थसाधके। इति कर्तव्यता तन्वो ०॥ इति हैमानेकार्थकोशः॥
कतिधा ? इत्याह-षड्विधा। षट् षट्सङ्ख्याकाः विधाः प्रकाराः अस्या इति षड् = विधाः षट् = प्रकाराः।।
अयमभिप्रायः- सर्वस्यापि शब्दानुशासनादिशास्त्रस्य व्याख्यायाः षड्भेदा भवन्तीति भावार्थः।
अथ ग्रन्थकारस्तान् भेदान् यथानुक्रमं व्यनक्ति प्रकटयति। तत्र तावत् संहिता इति संज्ञायाः कः शब्दार्थः ? संधीयते इति संहिता, अस्खलितपाठोच्चार इति यावत् । किमुक्तं भवति ? । अस्खलिततया मुखे सूत्रपाठोच्चारणं संहिता इति तात्पर्यम्। इति प्रथमो भेदः (१) ॥
चः पुनरर्थे। "पुनरर्थेपि किं च तु" इति हैमानेकार्थकोशः। च पुनः। पदं पदमित्यस्य कोऽर्थः ? विभक्त्यन्तं पदम्।
विभज्यन्ते पृथक् क्रियन्ते कर्तृकर्मादयो यया सा विभक्तिः। सा विभक्तिः द्विप्रकारा। एका स्यादिः॥
सि औ जस् इति प्रथमा १ अम् औ शस् इति द्वितीया २ टा भ्याम् भिस् इति तृतीया ३ ड्रेभ्याम् भ्यस् इति चतुर्थी ४ ङसि भ्याम् भ्यस् इति पञ्चमी ५ ङस् ओस् आम् इति षष्ठी ६ ङिओस् सुप् इति सप्तमी ७
एकैकस्याः विभक्तेस्त्रीणि त्रीणि वचनानि। एक वचन १ द्विवचन २ बहुवचन ३ संज्ञानि भवन्तीत्यादिरूपा।
अपरा त्यादिः। तिव तस् अन्ति ते आते अन्ते सिव् थस् थ से आये ध्वे मिव् वस् मस् ए वहे महे
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(१६)
इत्यादि दशलकारस्वरूपा। ते च के दश लकाराः ? इत्याकांक्षायामाहवर्तमाना १ विधिसभ्भावना २ आशी: प्रेरणा ३ अनद्यतनी ४ परोक्षार्थ ५ आशीरर्थ ६ श्वस्तन्यर्थ ७ भविष्यति ८ क्रियातिपत्ति ९ भूतार्थ १० लक्षणा ज्ञेयाः।
अत्र पाणिनीयानां मतमाह" लट् १ लिङौ, च लोट् ३ लङौ ४ च
लिट् ५ लिडौ ६ लुट् लय ८ तथा। लुङ् ९ लुडा १० वपि विद्वद्भिः
लकारा दश विस्मृताः।। १।। इति ॥
तत्र विभक्तिद्वयमध्ये स्यादिविभक्तिर्नाम्नोऽग्रे प्रयोज्यते। त्यादिविभक्तिर्धातोरने स्थाप्यते। सा विभक्तिः अन्ते यस्य तद् विभक्त्यन्तं, यस्यान्ते विभक्तिस्तत् पदमुच्यते। तद्व्यतिरिक्तं नाम। यतः "अविभक्ति नाम-विभक्तिरहितं धातुवर्जं चार्थवच्छब्दरूपं नामोच्यते"। अस्य व्याख्या-विभक्त्या रहितं धातोर्खादेः पृथग्भूतं अर्थयुक्तं शब्दरूपं एकादिवर्णरूपं तन्नामोच्यते।
अथास्य पदकृत्यानि। "शब्दरूपं नाम" इत्येवास्तु, इत्युक्ते पदस्यापि नामसंज्ञा स्यात् तन्निवारणार्थमविभक्तीति पदमुपादीयते। तथा सति धातावतिव्याप्तिस्तनिवारणार्थ धातुवर्जमिति तथा सति निरर्थकस्य टस इत्यादेव॑ने मत्वं सम्भवति तनिवारणार्थं अर्थवदिति। ईदृग्लक्षणं नाम । तथा कृत्तद्धितसमासाश्चेत्युक्तत्वात् च पुनः कृत्तद्धितसमासा अपि नामसंज्ञकाः स्युः। "प्रत्ययग्रहणे प्रत्ययान्तस्य ग्रहणम्" इति न्यायात् कृच्छब्देन कृदन्तधातूनां ग्रहणम्। कृदन्ता ये धातवः तद्धितसमासयोः पदानि नामसंज्ञानि भवन्ती त्यर्थः।
केचित् पाणिनीयाचार्या इति वदन्ति। "एते सर्वेऽपि प्रातिपादिकसंज्ञका" इति। तन्मते प्रातिपादिक इति नामपर्यायः । तस्मान्नाम्नः पराः स्यादयः सप्त विभक्तयो भवन्ति। तदन्तं पदमेवेति तात्पर्यार्थः। इति द्वितीयो भेदः॥ २॥
इतोऽग्रे पश्चिमं भेदं यावद् देहलीप्रदीपन्यायेन डमरुकमणिन्यायेन वा चकारो मध्यवर्तित्वात् सर्वत्रापि सम्बध्यत इति । च पुनः । एव निश्चये । ततः पदार्थः । पदानां पूर्वोक्तानां अर्थः पदार्थ अर्थग्रहणच्चान्योऽपि गृह्यते । अन्वितान्येव पदान्यर्थसमर्पकाणि भवन्ति। इति तृतीयो भेदः॥ ३॥
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(१७)
च पुनः। पदविग्रहः । पदानां विग्रहः पदविग्रहः। विग्रह इति कोऽर्थः ? अन्वययोग्यार्थसमर्पकः पदसमुदायो विग्रहो वाक्यमिति । परस्परसापेक्षपदैकार्थीभावोऽन्वयस्तस्य अन्वयस्य योग्यो योऽसावर्थस्तस्य समर्पकः समर्थको यः पदसमुदाय:-पदसमूहः स विग्रहः । तस्यापरं नाम वाक्यमित्यर्थः। अत्र विग्रहशब्देन समास एवोच्यते। समासापरपर्यायो विग्रह इति वचनात्। समास इति किम् ?। समस्यते संक्षिप्यते अर्थो येन स इति समासः। यद्वा समसनं अनेकेषां पदानामेकपदीकरणं स समासः। तेन द्वयोर्नाम्नो: बहूनां च नाम्नां समासो भवति। अत्र नामशब्देन पदमेव विवक्षितं, अन्यथा अविभक्ति नाम इत्युक्ते "समासप्रत्यययो' रिति सूत्रं व्यर्थं स्यात्। तस्मानामशब्देन पदमेवेति भावः। स च नाम्नामन्वययोग्यत्वे सत्येव समासो भवति। यत्र नाम्नां पदीनामन्वययोग्यत्वं सम्भवति राजपुरुष इत्यादौ तत्रैव समासो भवति नान्यत्रेति। च शब्दात्तद्धितोऽपि। तद्धितप्रत्ययसम्बन्धिविग्रहोऽप्यन्वययोग्यत्वे सत्येव भवति। अन्वययोग्यता नाम पदानां मिथः सामर्थ्यम्। ततो भार्यापुरुषस्येत्यादौ क्रमवैपरीत्येनान्वययोग्यत्वाभावात् समासो न भवति, एवं देवदत्तस्य भार्या, पुरुषस्य वस्त्रमित्यत्र भार्यापुरुषयोः सापेक्षत्वाभावात् न समासः।
ननु विभक्तान्येव पदानि प्रयोक्तव्यानि किं समासेन ? इति समासप्रयोजनमाहऐकपद्यमैकस्वर्यमेकविभक्तिकत्वं च समासप्रयोजनमिति । एकं पदं-एकपदं तस्य भावः ऐकपद्यम्। द्वयोः पदयोः बहूनां वा पदानां समासे कृते एकपदभावो भवति तदैकपद्यम्, इत्येकं प्रयोजनम्। तथा एकस्वरस्य भाव ऐकस्वर्यम्। समासे कृते वेदे अनेकेषु स्वरेषु एक उदात्तादिः स्वरो दीयत इति द्वितीयप्रयोजनम्। ऐकपद्याच्च शरवणादौ णत्वमिति। तथा एका विभक्तिर्यत्र तदेकविभक्तिकं तस्य भाव एकविभक्तिकत्वं समासस्य प्रयोजनमिति। समासे हि पृथक्पदानां विभक्तिलोपादेकविभक्तिकत्वं भवति। यथाशशाश्च कुशाश्च पलाशाश्च शशकुशपलाशमिति तृतीयं प्रयोजनम्। यतः
"विभक्तिः लुप्यते यत्र तदर्थस्तु प्रतीयते। ऐकपद्यं पदानां च स समासोऽभिधीयते॥ १॥
इति समासलक्षणम्। स च षड्विधः। अव्ययीभाव १ स्तत्पुरुषो २ द्वन्द्वो ३ बहुव्रीहिः ४ कर्मधारयो ५ द्विगुश्च ६इति । एवं समासः षड्विधो ज्ञेयः। तत्र पूर्वपदप्रधानोऽव्ययीभावः। पूर्व पदं अव्ययलक्षणं प्रधानं यत्र सः पूर्वपदप्रधानः।
इति समास
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(१८) द्विगु-तत्पुरुषौ परपदप्रधानौ। पूर्वोत्तरयोः पदयोर्मध्ये यत्परं अग्रेतनं पदं तत्प्रधानं ययोस्तौ० [परपदप्रधानौ] ।
द्वन्द्व-कर्मधारयौ चोभयपदप्रधानौ । उभे पूर्वापरे पदे प्रधाने ययोस्तौ० [उभयपद प्रधानौ] ।
बहुव्रीहिरन्यपदप्रधानः। पूर्वोत्तराभ्यां पदाभ्यां अन्यत् यत्किञ्चित् बहिः स्थितं पदं यत्पदवाच्यं प्रधानं यस्मिन् सः।
कस्मात् ?, तस्य क्रियाभिसम्बन्धात् । अस्य व्याख्या यथा-'तस्य क्रियाभिसम्बन्धात्' इति पदं सर्वत्रापि योज्यम् । तत्र तत्र तस्य तस्य पदस्य क्रियाभिः सहाभिसम्बन्धात् क्रियायोगित्वेन प्राधान्यादित्यर्थः।
अव्ययीभावः - पूर्वपदप्रधानः। यथा-स्त्रीषु अधि इति 'अधिस्त्रि गृहकार्य भवती'त्यत्र क्रियायाः पूर्वपदेनाधीत्यव्ययेन सह सम्बन्धात् तस्य प्राधान्यात् अव्ययीभावः पूर्वपदप्रधानः। तथा द्विगुस्तत्पुरुषश्च एतौ परपदप्रधानौ, यथा पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवमित्यत्र पञ्चन् शब्दस्य सङ्ख्याभूतस्य विशेषणत्वं, गोशब्दस्य विशेष्यत्वम्। विशेष्यविशेषणयोः मध्ये विशेष्यस्य मुख्यत्वमिति गोशब्दस्य परपदस्य प्रधानत्वम्। तथा तत्पुरुषसमासे राजपुरुषो याति इत्यत्र गमनक्रियायाः पुरुषेण सहान्वयात् तस्यैव प्राधान्यमेवं तत्पुरुषे परपदस्य प्राधान्यम्। एवं द्विगुतत्पुरुषयोः परपदस्य क्रियाभिसम्बन्धात् द्विगुतत्पुरुषौ परपदप्रधानौ। तथा द्वन्द्वे कर्मधारये चोभयपदयोः क्रियाभिसम्बन्धात् द्वन्द्वकर्मधारयौ उभयपदप्रधानौ यथा-अग्निश्च सोमश्च इत्यादिषु पदद्वयस्यापि क्रियायामधिकारित्वात् द्वन्द्वे उभयपदयोः प्राधान्यम्। तथा कर्मधारये नीलं च तदुत्पलं चेत्यत्र विशेषणविशेष्ययोरेकार्थनिष्ठत्वादन्योन्याश्रयभूतत्वाच्च पदद्वयस्य प्राधान्यम्। बहुव्रीहौ चान्यपदस्य प्राधान्यम्। यथा-बहु धनं यस्येत्यत्र बहुधनस्य वस्तुभूतत्वं यच्छब्दस्य तु स्वामित्वमिति अन्यपदस्य प्राधान्यम्। तस्यान्यपदस्य क्रियाभिसम्बन्धादिति समासार्थः। अथोपसंहारमाह
पूर्वेऽव्ययेऽव्ययीभावोऽमादौ तत्पुरुषः स्मृतः। चकारबहुलो द्वन्द्वः सव्यापूर्वो द्विगुर्मतः॥
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(१९) यस्य येन बहुव्रीहिः स चासौ कर्मधारयः।
इति किञ्चत्समासानां षण्णां लक्षणमीरितम्॥२॥ इति। अन्यैरप्युक्तम्
यदा बहुव्रीहि रुदीरितो बुधै र्द्वन्द्व'श्चकारैरथसङ्ख्यया द्विगुः । चासौ च तत्स्यादिति कर्मधारयः क्लीबोऽव्ययी तत्पुरुषोन्यलक्षणः॥१॥ इति समासानां समासतो लक्षणं प्रोक्तम्। एतेषां विस्तरस्तु ग्रन्थान्तरतो विज्ञेयः। अथ षण्णामपि समासानां किञ्चिद्विशेषलक्षणं वृत्तद्वयेनोच्यते । यदुक्तम्द्वन्द्वश्चकारैः समनामविग्रहा-दाद्योत्तरास्तत्पुरुषे विभक्तयः। चाभ्यां समस्येत विशेषणैर्गुणी तदान्तरस्थेन च कर्मधारये ।। प्रायो बहुव्रीहिरयं गुणैर्गुणी यदा समस्तान्यविशेषणं भवेत् । सव्याद्यपुंस्त्र्येक्तया पदं द्विगु रूपादिपूर्वं तदमन्तमव्ययी॥२॥ (युग्मम्)
अनयोत्तयोारव्या-समयोर्नाम्नोः समानां वा नाम्नां विग्रहः समनामविग्रहः, तस्मात् चकारैर्द्वन्द्व समासः स्यात्।
___उभयपदप्रधानो द्वन्द्वः। स च द्विविधः। इतरेतरद्वन्द्वः १ समाहारद्वन्द्वश्च २ ॥ पूर्वस्मिन् द्विवचन बहुवचनं वा। लिङ्गं तु परवर्तमानशब्दापेक्षम्। यथा-घटश्च पटश्चघटपौ। घटश्च पटश्च लकुटश्च-घटपटलकुटाः। घटश्च घटी च घटघट्यौ । चार्थे द्वन्द्व० इति सूत्रेण समासः।
समाहारे तु क्लीबत्वमेकवचनम्। यथा-सुखं च दुःखं च - सुखदुःखम्। दधि च घृतं च - दधिघृतम्।
आरा च शस्त्री च आराशस्त्रि। यदुक्तम् -
स स्यात् द्वन्द्व-समाहारो यत्रैकवचनं भवेत्। यत्र द्वित्वं बहुत्वं च स भवेदितरेतरः॥ १॥ इति । अवयवार्थप्रधान इतरेतरः । समुदायार्थप्रधानः समाहारः।
इति द्वन्द्वसमासः॥१
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(२०) आद्योत्तराः प्रथमादिका विभक्तयस्तत्पुरुषे भवन्ति। उत्तरपदप्रधानः तत्पुरुषः। तत्र पूर्वपदे सप्तापि विभक्तयः स्यु । उत्तरपदे प्रायः प्रथमैव।
यथा - शोभनो राजा - सुराजा। पूजितो राजा - सुराजेत्यर्थः।
"उपसर्गाः क्रियायोगे गतिश्च प्रादयोऽपि"। तथा "प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया अमादा"वित्यस्येत्येवं प्रपञ्चेत्यनेन समासः।
यथा - धर्मं श्रितो - धर्मश्रितः। मदेन पटुः - मदपटुः। जीवेभ्यो हितम् - जीवहितम्। जनेभ्यः सुखम् - जनसुखम्। वृकाद् भयम् - वृकभयम्। राज्ञः पुरुषो - राजपुरुषः। समरे सिंह इव - समरसिंहः।
"अमादौ तत्पुरुष" इति सूत्रेण समासः। उत्तरपदे प्रायः प्रथमेति प्रायोवचनात् क्वचित् प्रथमाद्याः विभक्तयो यथासूत्रमुत्तरपदेऽपि स्यु। अन्यपदार्थे प्रधानत्वं च।
यथा - प्रगत आचार्यः प्राचार्यः। प्रकृष्टो वीरः प्रवीरः। (१) अतिक्रान्तः खट्वाम् अतिखट्वः। (२) अवक्रुष्टः कोकिलया अवकोकिलः। (३) परिग्लानोऽध्ययनाय पर्यध्ययनः। (४) निर्गतः कौशाम्ब्या निष्कौशाम्बिः। (५) एषु सर्वेषु क्वचिदमाद्यन्तस्य परत्वमिति सूत्रेण समासः।
कुम्भं करोतीति कुम्भकारः। "नाम्नश्च कृता समास" इति सूत्रेण समासः। न गौः अगौः। "नबि" इति सूत्रेण समासः।
प्राचार्यादयो नित्यसमासा अस्वपदविग्रहत्वात्। इति तत्पुरुष समासः॥ २
चाभ्याम् ॥ व्याख्या- तदा तच्छब्देनान्तरस्थेन प्रसिद्धया तु अदःशब्देन, चाभ्यां च चकाराभ्यां द्वाभ्यां विशेषणैः सह, गुणी विशेष्यं कर्मधारये समस्यते।
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(२१)
उभयपदप्रधानः कर्मधारयः। पूर्वं विशेषणपदम्, अग्रे विशेष्यपदम्।
यथा-त्रिषु लिङ्गेषु-वीरश्चासौ पुरुषश्च-वीरपुरुषः (१) मधुरा चासौ वाणी च - मधुरवाणी। (२) नन्दनं च वनं च - नन्दनवनम्। (३) "कमधारयस्तुल्यार्थे" इति सूत्रेण समासः । स्त्रीपूर्वपदस्य तु पुंवद्वेति पुंवत्त्वम्। इत्यादि कर्मधारयः॥३॥
इति प्रथमवृत्तार्थः॥१॥ अथ बहुव्रीहि:
प्रायो० । व्यारव्या - गुणैविशेषणैर्गुणी विशेष्यं यदा यच्छब्देन समस्तः सनन्यविशेषणं यत्र भवेत्, सोऽयं बहुव्रीहिः समासः स्यात्। बहुव्रीहिरन्यपदप्रधानः। द्वितीयाद्या षड् विभक्तयो यच्छब्दे स्युः। अन्यविशेषणत्वात् तल्लिङ्गवचने च भवतः।
यथा - आरूढो वानरो यं सं आरूढवानरो वृक्षः। १ जितो मोहो येन स जितमोहो जिनः। २ दत्ता दक्षिणा यस्मै स दत्तदक्षिणो द्विजः। ३ वीतो गतो रागो यस्मात् स वीतरागः सर्वज्ञः। ४ शीता रश्मयो यस्य सः शीतरश्मिः। ५ प्रादुर्भूता अङ्कुरा यस्यां सा प्रादुर्भूताङ्कुरा। ६ एतेषु सर्वेषु बहुव्रीहिरन्यार्थ इति सूत्रेण समासः । ७ इति बहुव्रीहिसमासः॥८॥ अथ द्विगुसमासः।
सव्याद्यपुंस्त्र्येकतया पदम्। व्यारव्या- द्विगौ द्विगुसमासे पदमुत्तरपदं स्यात्। कीदृशं सव्यादि- सव्यावाचिपदं विशेषणभूतमादौ यस्य तत्सव्यादि। एवं विधमुत्तरपदं विशेष्यभूतं स्यात्। पदद्वयमपि षष्ठ्यन्तं समाहारशब्देन समस्यते। कया ? पुंस्त्र्येक्तया-अपुमान् क्लीबलिङ्गं स्त्रीलिङ्गं च तयोरेकतया एकवचनतया नपुंसकलिङ्गं स्त्रीलिङ्गं वैकवचनान्तं समासः स्यादित्यर्थः । पुंलिङ्गं तु न स्यादेवेति उत्तरपदप्रधानो द्विगुः । शेषः सर्वः क्लीबलिङ्गः।
यथा - त्रयाणां लोकानां समाहार: त्रिलोकी।
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(२२) समाहारे " अत ईप् द्विगु " इति सूत्रेण ईप्। तिसृणां सन्ध्यानां समाहारः त्रिसन्ध्यम्। त्रिसन्ध्यस्य क्लीबत्वमेव। एकत्वे द्विगुद्वन्द्वाविति सूत्रेण समासः। त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनम्। इत्यादि। पात्रादिगणपाठानपुंसकत्वम्। द्वयोः साध्वोः समाहारः द्विसाधु। तिस्रो नद्यः समाहता त्रिनदि। एवं पञ्चसमिति। इति द्विगुसमासः।। ५ अथाव्ययीभावः।
उपादिपूर्वं तदमन्तमव्ययी०। व्याख्या - उपादिशब्द आदौ येषामव्ययानां शब्दानां ते उपादयः अव्ययशब्दास्ते पूर्वं पूर्वपदं यत्र तत् उपादि। पूर्वमेवंविधं तत्पूर्वोक्तं पदमुत्तरपदं भवति। कीदृशम् ?, अमन्तम् । सर्वविभक्तीनामकारान्तात् प्रायोऽमादेशः स्यात्। सोऽम् अन्ते समासान्ते यस्योत्तरपदस्य तदमन्तमेवंविधं यत्रोत्तरपदं भवति, सोऽव्ययी। अव्ययं पूर्वपदं यस्य सोऽव्ययी। अव्ययीभावसमास इत्यर्थः। पूर्वेऽव्ययेऽव्ययीभावः।
यथा - कुम्भस्य समीपम् उपकुम्भमस्ति १ पश्य २ क्रुध्यति ४ शोभा ६। क्रमेण प्रथमाद्वितीयाचतुर्थीषष्ठीनां "आतोऽमनत" इत्यमादेशः। तृतीया-सप्तम्योस्तु वा टाङ्यो इति सूत्रेणामादेशो वा। यथा उपकुम्भं कृतं, उपकुम्भेन कृतम्। उपकुम्भं शेते, उपकुम्भे शेते इति। पञ्चम्यां त्वमादेशाभावे उपकुम्भादानयेति। आकारान्तशब्दान् विनान्यस्वरान्तव्यञ्जनान्तशब्देभ्यो विभक्तिलोप एव स्यात्। यथा - स्त्रीषु अधि अधिस्त्रि। . साधोः समीपम् उपसाधु। नद्याः समीपम् उपनदि। भवतः समीपम् उपभवत्। भवत्याः समीपम् उपभवति।
सुखस्यानतिक्रमेण यथासुखम्। " यथा सादृश्ये " इति सूत्रेण समासः। इत्यव्ययीभावसमासः॥ ६॥ इति द्वितीयवृत्तार्थः।।
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(२३)
इत्यादि समासलक्षणमिति चतुर्थो भेदः। (४)
ततो विग्रहविधानानन्तरं च पुनः चालना कर्तव्या। इह चालनेति कोऽर्थः ? चल्यते स्फूर्जत्तीक्ष्णमनीषया विचार्यते इति चालना । अयमाशयः- विवक्षितार्थसमर्थनाय कण्टकोद्धारादिहेतोः। अयमर्थ:- कथं सञ्जाघटीतीति पूर्वक्षोद्भावनं यत्र विधीयते सा चालना। इति पञ्चमो भेदः।। ५
च पुनस्ततः प्रत्यवस्थानम् - अर्थं अर्थं प्रति अवस्थानम् निश्चयः प्रत्यवस्थानम्। अत्र इदमेव घटते इति संशयनिरासेन पूर्वोक्तलक्षणायाश्चालनायाः यत्र सिद्धान्तोद्भावनं क्रियते तत् प्रत्यवस्थानं तदर्थसमर्थनमित्याशयः स्वयमभ्यूह्यः । इति षष्ठो भेदः॥ ६
इत्यलं प्रपञ्चेनेत्याद्यर्थयोजना। (१) चञ्चद्वर्णसुसंहिता स्फुटपदा नानापदार्थप्रदा। विज्ञश्लाघितविग्रहा समुचितस्थानं स्फुरच्चालना ।। व्यारव्याकामगवी चिरं विजयतां सत्प्रत्यवस्थानयुक्। स्निग्धं गोरसमर्पयत्यनुदिनं हृद्यस्य पद्यस्य मे॥ २ ॥
इति श्रीमत्तपागच्छाधिराज श्रीगौतमगणधरोपमगुणसमाजसकलभट्टारक वृन्दारक राजभट्टारक श्री ५. श्री विजयाणंदसूरीश्वरशिष्यभुजिष्य पं.हंसविजयगणि समर्थितायां शब्दार्थचन्द्रिकायां संहितादिषड्भेदस्वरूपनि रूपकपद्यस्य व्यारव्यादिग् सम्पूर्णा ॥१॥
(प्रतिप्रान्ते) अहँ नमः। ही नमः। ॐ नमः।
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टि-१. प्रमाणानव बाधितोऽर्थ सिद्धान्तः।
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बे सरस्वती-स्तोत्र
-सं. मुनि रत्नकीर्तिविजय विद्यानां तथा श्रुतज्ञाननां अधिष्ठात्री माता सरस्वती देवीनां बे अप्रसिद्ध स्तोत्ररत्नो यथामति संपादित करी अत्रे रजू करतां हर्षानुभव करूं छु. बालमति छतां पूज्य गुर्वाज्ञाथी दोरवाईने आ साहस कर्यु छे, तेथी बालसुलभ क्षतिओ क्षन्तव्य गणवानी मनीषिजनोने विज्ञप्ति छे. प्रथम स्तोत्रनी बे पत्रनी एक प्रति मळेल छे, जे अनुमानतः १५ मा शतकनी लखायेली जणाय छे. प्रान्ते "जानी मेघेन लिखितम् " एम लेखकनो निर्देश छे, पण संवत्नो, रचना संवत्नो के कर्तानो निर्देश नथी. समग्रपणे स्तोत्रनो भाव तपासतां कोई योगमार्गना साधकनी आ मंत्र-यंत्रनी विशिष्ट आम्नायगर्भित रचना छे, तेम पूज्योथी जाणवा मळ्युं छे. स्तोत्र निःशंक प्रभावपूर्ण लागे छे. छठ्ठा पद्यमांना 'निर्ग्रन्थ' पद परथी कोई जैन कर्तानी रचना होय तो ते असंभवित नथी.
बीजुं स्तोत्र 'जिनवाक्स्तुति" नामे छे. ते मुख्यत्वे जैन आम्नाय प्रमाणेना सरस्वती -श्रुतदेवीना स्वरूप , नामोनुं तथा गुण वर्णन को छे. ते एक साव नाना प्रकीर्ण पत्रमा लखायेलुं छे, जे पत्र संभवतः १८ मा सैकानुं जणाय छे. एमां पण पत्रमा के रचनामां कर्तानो उल्लेख छे नहि. रचना प्रगल्भ जणाय छे..
(श्री शारदायै नमः॥) अन्तः कुण्डलिनिप्रसुप्तभुजगाकरस्फुरद्विग्रहां, शक्तिं कुण्डलिनी विधाय मनसा हुंकारदण्डाहताम्। षट्चक्राणि विभिद्य सद्य मनसां प्रद्योतनद्योतनी, लीनां ब्रह्मपदे शिवेन सहितामेकत्र लीनां स्तुमः॥१॥
कन्दात्कुण्डलिनि ! त्वदीयवपुषा निर्गत्य तन्तुत्विषा, किञ्चिच्चुम्बितमम्बुजं शतदलं तद्ब्रह्मरन्ध्रादधः। यश्चन्द्रद्युति ! चिन्तयत्यविरतं भूयोऽत्र भूमण्डले, तन्मन्ये कविचक्रवर्तिपदवीच्छत्रच्छलाद्वल्गति॥ २॥
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(२५) यस्त्वद्वक्त्रमृगाङ्कमण्डलमिलत्कान्तिप्रतानोच्छलत, चञ्चच्चन्द्रकचक्रचित्रितककुष्कन्याकुलं ध्यायति । वाणी वाणिविचित्रभङ्गुरपदप्रागल्भयशृङ्गारिणी, नृत्यत्युन्मदनर्तकीव सरसं त्वद्वक्त्ररङ्गाङ्गणे॥ ३॥
देवि ! त्वत्पदचन्द्रकान्तकरकश्चयोतत्सुधानिर्झरस्नानानन्दतरङ्गितः पिबति यः पीयूषधारारसम्। तारालङ्कृतचन्द्रशुक्तिकुहरेणाकण्ठमुत्कण्ठितो,
वक्त्रेणोगिरतीव तं पुनरसौ वाणीविलासच्छलात्॥ ४॥ क्षुभ्यत्क्षीरसमुद्रनिर्गतमहाशेषाहिलोकात्फणा । पत्रोनिद्रसितारविन्दकुहरे ! चन्द्रस्फुरत्कर्णिके !। देवि ! त्वां च निजं च पश्यति वपुर्यः कान्तिभिन्नान्तरं, ब्राह्मि ! ब्रह्मविदस्य वल्गति वच:प्रागल्भ्यदुग्धाम्बुधे !।।५॥
नाभीपाण्डुरपुण्डरीककुहरे हृत्पुण्डरीके गलत्पीयूषद्रकाव)वर्ष(र्षि)णि ! प्रविशतीं त्वां मात्रिकामालिनीम्। दृष्ट्वा भारति ! भारती प्रभवति प्रायेण पुंसो यया,
निर्ग्रन्थोऽपि शतान्यपि ग्रथयति ग्रन्थायुतानां नरः॥६॥ त्वां मुक्तामयसर्वभूषणधरां श्वेताम्बराडम्बरां, गौरी गौरिसुधां तरङ्गधवलामालोक्य हृत्पङ्कजे। वीणापुस्तकमौक्तिकाक्षवलयश्वेताब्जवल्गत्करां, न स्यात्कः शुचिवृत्तचक्ररचनाचातुर्यचिन्तामणिः॥
अश्येत्स्वां तनुमिन्दुमण्डलगतां त्वां चाभितो मण्डितां, यो ब्रह्माण्डकरण्डपिण्डितसुधाडिण्डीरपिण्डैरिव। सुस्वच्छोद्गतिगद्यपद्यलहरीलीलाविलासामृतैः,
सानन्दास्तमुपाचरन्ति कवयश्चन्द्रं चकोरा इव॥ ८॥ तद्वेदान्तशिरस्तदोंकृतिमुखं ज्योति:कलालोचनं, तत्तद्वेदभुजं तु(त)दात्महृदयं तद्गद्यपद्यांहि च। यस्त्वद्वम विभावयत्यविरतं वाग्देवि ! तद्वाङ्मयं, शब्दब्रह्मणि निष्ठितः स परमब्रह्मैकतामश्नुते॥९॥ .
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(२६)
वाग्बीजं स्मर बीजवेष्टितमतो ज्योति:कलाभृद्वहिरष्टद्वादशषोडशद्विगुणितद्विष्टाब्जपत्रान्वितम्। तद्बीजाक्षरकादिवर्णरचितान्यग्रे दलस्यान्तरे,
हंसः कूड(ट)युतं भवेदवितथं यन्त्रं तु सारस्वतम्॥ १०॥ ॐ ह्रीं श्रीं स[ह] ही सबीजकलितां वाग्वादिनीदेवतां, गीर्वाणासुरपूजितामनुदिनं काश्मीरदेशे भवाम्। अश्रान्तं निजभक्तिशक्तिवशतो यो ध्यायति प्रस्फुटं, बुद्धिज्ञानविचारसारमहितः स्याद्देव्यसौ साम्प्रतम् ॥११।।
स्मृत्वा यन्त्रं सहस्रच्छदकमलमनुध्याय नाभीहृदोत्थं, चेत:स्निग्धोर्द्धनालं हृदि च विकचितां बाष्पनिर्यातना स्यात्। तन्मध्ये चोर्ध्वरूपामभयदवरदां पुस्तकाम्भोजपाणी(णि), .
वाग्देवीं तन्मुखाच्च स्वमुखमनुगतां चिन्तयेदक्षरालीम् ॥१२॥ किमिह बहुविकल्पैश्चिन्तितैर्यस्य कण्ठे, लुठति विमलवृत्तस्थूलमुक्तावलीयम्। भवति भवति नाथे भव्यभाषाविशेषैमधुरमधुसमृद्धस्तस्य वाचां विशेषः॥१३॥
इति श्री भारतीस्तवनं सम्पूर्णम्॥
प्रशस्तिः यदक्षरपरिभ्रष्टं स्वरव्यञ्जनवर्जितम्।
तत्सर्वं क्षमतां देवि ! प्रसीद परमेश्वरि॥ . .
जानीमेघेन लिखितम्। सुमतिधीरगणिपठनार्थम्॥ श्री॥
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(२७)
(श्रीमदर्हद्वाण्यै नमः।) सर्वज्ञवाणी जयतात्सर्वभाषामयी शुभा। पञ्चत्रिंशद्गुणोपेता मनुपूर्वस्वरूपिणी ॥ १॥
दयामय्यमृतमयी वाग्देवी श्रुतदेवता।
संसृष्टिविगमध्रौव्यदर्शिका भुवनेश्वरी॥ २॥ ब्रह्मबीजध्वनिमयी श्रीमती वाग्भवात्मिका। ज्ञानदर्शनचारित्ररत्नत्रितययदायिका॥ ३॥
अर्हद्वक्त्राब्जसम्भूता भव्यकैरवचन्द्रिका ।
नयप्रमाणगम्भीरा नवतत्त्वगमान्विता ॥ वाग्वादिनी भगवती कुमतिध्वंसकारिणी। स्याद्वादिहदयाम्भोजस्थायिनी मातृकामयी।॥ ५ ॥
नित्या सरस्वती सत्या ज्योतीरूपा जगद्धिता।
वागीश्वरी सिद्धिदात्री सिद्धबीजमयी परा॥ ६ ॥ परमैश्वर्यसहिता गणभृद्गुम्फिता श्रुते। सिद्धान्तार्थप्रदाऽचिन्त्याऽनन्तशक्तिश्च सारदा ॥ ७ ॥
स्याद्वादवादिनी श्रेष्ठा तारिणी भववारिधेः।
या हज्जाड्यान्धकारस्य हरणे तरणिप्रभा ।।८॥(अष्टभिः कुलकम्॥) सा मद्वक्त्रे निवसताज्ज्ञानानन्दप्रदायिनी। नमस्या मामको तस्यै बोभवीतु मुहुर्मुहुः।। ९ ।।
इति श्रीजिनवाक्स्तुतिः। श्री प्रवचनदेव्यै नमः। णमो बंभीए लिवीए। णमो सुयदेवयाए भगवईए। णमो सुयस्स भगवओ। श्री ज्योतिर्मायाभ्यां नमः।
स्वामिनि ! शासनदेवते ! मत्सान्निध्यं विधेहि विश्वेशी।
प्रवचनबोधो भगवति ! दयया भक्ताय दातव्यः॥ १ ॥ श्रीमदहन्मातृकाभ्यो नमः॥ श्री जिनशासनदेवताभ्यो नमः॥ श्री प्रवचनमातृभ्यो नमः॥
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छे !
शाहवीराना सुकृत वर्णननी प्रशस्ति - चउपड़ |
सोळमा सैकाना चोथा चरण आसपास भिन्नमाल (राजस्थान ) थी अणहिलपुर पाटण आवीने वसेला शाह वीरानी आ वंशावलि छे.
हस्तलिखित त्रण पानांनी पोथीमां केटकेटली पेढीना सुकृतोनुं ट्रंकमां वर्णन कर्यं
सं. प. प्रद्युम्नविजय
प्रारंभमां, कनाशाना पाडामां स्फटिकना श्री शांतिनाथजिन बिंबनी प्रतिष्ठा वि.सं. १६५४मां थई तेनो प्रशस्ति लेख छे. ते गद्यमां छे. पछी शाहा वीराए करेलां श्रेणिबद्ध सुकृतोनी सालवार यादी छे. तेओ भिन्नमालथी पाटण रहेवा आव्या त्यारे साथे श्री महावीर स्वामीनुं जे बिंब लाव्या हता तेने ढंढेरवाडामां पधराव्युं. पोते पण त्यां ज रह्या.
ते पछी कनाशाना पाडाना देरासर, लींबडीना वाडाना देरासरनुं निर्माण अने प्रतिष्ठा वगेरेनो लाभ लीधो. वच्चे वच्चे संघनां वर्णनो छे. वीराए प्रकट करेली अणसणनी भावनानुं वर्णन सुंदर छे अने छेल्ले जे सागारिक दीक्षा - अणसण लीधुं तेनी पण वात नोंधपात्र छे. वीराथी लईने तेनी पेढी - दर पेढीमां सुकृतो थतां रह्या छे. वि.सं. १६१६थी १६७४ सुधी आ परंपरा चाली छे. आनंदनी वात ए छे के शाह वीरा अने तेमना वंशजोए जे जे चैत्योनुं निर्माण कर्तुं कराव्युं अने तेमां जे बिंब पधराव्यां ते आज सुधी सारी स्थितिमां विद्यमान छे. हाल पाटणमां जे नगरशेठनुं कुटुंब कहेवाय छे अने जेमनुं भगवानदास नाम छे तेओ सीधा आ शाह वीराना वंश ज थाय अने मणियाती पाडामां जे सहस्रकूटनुं घरदेरासर छे ते पण नगरशेठना कुटुंबनुं ज छे.
शाह वीरा अने तेना वंशजो पौर्णमिक गच्छना निश्रावर्ति आचार्यना श्रावको छे. अत्यारे पण ए पूनमिया गच्छनी गादी ढंढरवाडामां ज गणाय छे.
आ पौर्णमिकगच्छनी उत्पत्ति बारमां सैकामां वादी देव सूरिजीना गुरुश्री मुनिचन्द्र सूरिना गुरुभाई श्रीचन्द्रप्रभसूरिजीथी थई छे. आ पूनमिया गच्छना श्री भावप्रभसूरिना लखेला ग्रन्थो आजे पण पाटणना श्री हेमचन्द्राचार्य ज्ञानभंडारमां सचवायेला छे. आवी वंश प्रशस्तिओ इतिहासना तथ्योना निर्णयोमां खूबज निर्णायक बनी रहे छे. भाषा सत्तरमा सैकाना चोथा चरणनी छे. बावीसमी चौपाइमां त्रीजा चरणमां जे लांगली शब्द वापर्यो छे
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(२९)
सांस्कृतमां नाळीयेर (श्रीफळ) अर्थमां प्रसिद्ध छे ते छे. पूनमिया गच्छनी पट्टावलीमां पण उपयोगी थाय तेवी आचार्योनी नामावलि आमां मळे छे.
श्री श्रीमालज्ञातीय वीर शाखायां वर्द्धमानगोत्रे पूर्वं भिन्नमाल वास्तव्यं : श्री धर्मघोषसूरि प्रतिबोधित साहागेहा तदन्वये साहा श्री वीरा ततः ढंढेरनाम प्रतिष्ठितं । वीर वाटकं वासितं । तत्र वीरप्रासादः कारितः पश्चात् महावीरबिंबं पत्तने आनीतं । ढंढेर पाटके पूज्यते ॥
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श्री वीरसाहावंशे । साहा लाडा । तत्सुत साहा खेता । तत्सुत दोसी हरदे । पुंजा चं श्री रासीरंगज । तत्सुत दोशी मुख्य श्री अदा भार्या भेळाई पुत्र २ । (१) दोसी वीरा । (२) दोसी टोकर । दोसी वीरा भार्या रंगाई । द्वि भार्यारूपां ॥ टोकर भार्या पनोती । तत्र दोसी मुख्य । शत्रुंजय संघवीपद प्रतिष्ठित, अर्बुदाचळ संघवीपद प्रतिष्ठित । संघवी श्री वीरा भार्या रंगाई । सुत दोसी शिवजी । सुता वीरबाई । द्वितीया भार्या रूपां सुत दोसी रवजी । सुता ३ (१) चांपा। (२) जेठी। (३) फूलां । दोसी शिवजी भार्या चंगा सुत (४) । (१) सूरजी (२) मेघजी (३) सोमजी (४) अबजी। सुता २ । (१) पकली । (२) रतनी । रवजी भार्या गंगाई सुत मनजी । थानसिंह। समरसिंह । विजयसिंह । इंद्राणी । मरघां । एवं कुटुंब सहितेन । संघवी वीराकेन संवत १६५४ वर्षे माघवदि ११ रवौ श्री शांतिनाथ रत्नमयबिंबं रापितं । प्रतिष्ठितं । बहुद्रव्यव्ययेन नमस्कार गुणनिक भोजनं कारितं । गच्छ ८४ वासिनां यतीनां वस्त्रप्रदानं कृतं ॥
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श्रीमद्वीर वर्धमान पट्टोधर श्री सुधर्म्मास्वामिवंशे श्री चंद्रप्रभसूरिः तदन्वये श्री पूणिमापक्षे प्रधानशाखायां श्री जयप्रभसूरिः तत्पट्टे श्री भुवनप्रभसूरिः तत्पट्टे श्री कमलप्रभसूरिः तत्पट्टे श्री पुण्यप्रभसूरिः तत्पट्टोदयाचलांऽलंकरण श्री विद्याप्रभसूरि : तत्पट्टे चतुर्दश विद्यानिधान । सरस्वती कंठाभरण । वादीमदगंजन । जंगमतीर्थ | युगप्रधान मेरुरिवाचल श्री ललितप्रभसूरिभिः प्रतिष्ठितं । तदनु संवत् १६६४ वर्षे श्रावण वदि १० दिने नवीन प्रासादे स्थापितं चिरं जीयात् आचंद्रार्कं इति करणासाहनइ पाडामध्ये शान्तिनाथ प्रशस्तिः ॥
वीरान यानि कृतानि सुकृतानि तानि लिख्यंते ॥
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(३०) वीराकृतसुकुतसंचय चउपई ॥ वीरा सुत ...... ....... सोल सोलत्तरइ जाणि १६१६ । हेममय आभरण जडाव । जिन अंगई कराव्यां सभाव ॥१॥ बिंब भराव्युं रूपातj -द्रव्य खरच्यु अतिघj प्रतिष्ठा करावीया सार। विद्याप्रभसूरि गुरुपधरावि ॥२ ॥ घर देहरासर कराव्युं नवं । तेहर्नु पुण्य असंख्यातुं हवं । स्नात्र महोत्सव स्वजन संतोष ॥३॥ संवत सोल सांत्रीसइ सार (१९३७) संखेश्वरनो संघ उदार। काढ्यो संघ जमाड्यो भलो। जिन शासन कीधो ऊजलो ।।४ ॥ नव अंगे गुरु पूजा कीध । याचक्नई बहु दानज दीध । संघपति तिलक घरइ कंठमाल । वार्जित्र वाजइ गाइ बाल ॥ ५ ॥ संवत सोल सांत्रीसई वली । विद्याप्रभसूरि दुखदली। देवंगत निर्वाण कल्याण । दोसी वीरो साधइ सुजाण ॥६ ॥ शुभ मांडवी रचावी करी । आडंबर रचना सवि धरी । सोनां रूपां फूल उच्छाल । करणी सवि कीधां संभालि ।।७।।
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(३१)
श्री ललितप्रभ सूरिनैं ताम। पार्टि बइसारया गुणधाम । पदप्रतिष्ठा महोच्छव जेह । वीरो धन खरची करइ तेह ।।८ ॥ गुस्नई पूजा करि नव अंगि । घरे पधरावइ मननइ रंग। पाट पधरावइ गोरी गाय। दान याचकनइ बहुला थाय ॥९॥ गंधर्व गाय रातीजगा। जमाड्या बहु साहम्मी सगा। पदमहोत्सव कीधो गुस्तणो । वीरइ उपायो जगि जस घणो ॥१०॥ विद्याप्रभसूरीस्युं नेह । वीराने दुःख सालइ तेह। झूरइ अन्न न खाइ अंध जाणे थई बइठो निग्रंथ ॥११॥ तव श्री ललितप्रभसूरी कहइ । सदगुरु वयण वीरो सद्दहइ । तजे शोक संसारी चालि। साचो जैनधर्म संभालि ॥ १२ ॥ संवत सोल ओगणच्यालीस । (१६३९) आबु संघपति तिलक जगीस । घणो द्रव्य तिहां वावर्यो । सुकृतनो इम संचो कर्यो ॥१३॥ महापूजा गुरु अंगइ कीध । याचकनइ वली दान ज दीध । भावि जिननी कीधी यात्रा ।
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(३२)
पोष्यां साधुतणां बहु पात्र ।।१४ ।। शत्रुजय महात्म्य सांभली। ललितप्रभसूरिनइ मुखस्ली । भेटीस्यइ शत्रुज ज्याहरिं। कडाविगइ खास्यि त्याहरइ ॥ १५॥ भलो संवत सोल चुयालीस १६४४ । संघ लेई वीरो सुजगीस। श्री ललितप्रभसूरीश्वर साथि । धर्ममारग वावरतो आथि । १६ । पग पग गुरु भक्ति अणुसरइ । जेह कथन कहइ ते करइ । इंणि परि भेटयो विमलगिरींद । पूज्या रूडई आदि जिणंद ॥१७॥ अनेक सिद्ध थया कांकरइ । वीरो अणसण लेवा करइ । ललितप्रभसूरी कहइ सुणो। फल भावई थयो अणसण तणो ।१८ । काल भाव ओछां संघयण । मन आजनां काचां मयण । तिहां ताई काया नवि पाडवी । धर्मसाधन हुइ जिहां घडी ॥१९ ॥ इम अनुमति गुरुह नवि दीध । वीरइ पण गुस्वयण ज कीध । तव ते लाभ अनेरो धरइ । शीलव्रत लेवा मन करइ ॥ २० ॥ बाजुठइ गुरुलई बइसारि । आगलि समोसरणनई धारि ।
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१. नांदि।
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(३३)
चोखापुंज नालेर गुंहली। चिहुं दिशि मुंक्या दीपक वली ॥२१ ॥ समोसरण उपरि जिनबिंब । चउमुख मुंक्यो तिहां अविलंब । पहिलं हाथि लेई लांगली। नांदि फीरी मुंकइ ते वली ।।२२।। किरियामां जोईइ जे वेस। वीरइ ते धार्यो सुविशेस। लोक मिल्या तिहां लखगान । धर्मवीवाहनी जांणे जांन ।।२३ ।। आठ थुई वंदावइ देव । नंदीसर (सुत) संभलावइ ततखेव । कहइ गुरु समकित आलाप । टालइ सवि मिथ्यामति व्याप ।।२४।। समकित आलावो ते धरइ । पंड थकी कहीइं नवि फरइ । समकित विण जे व्रत आखडी । बोडइ शिर जेहवी राखडी ॥ २५ ।। भणइ गुरु आलापक सार । वीरो जोडइ हाथ उदार। शीलव्रततणो उच्चार । इंणि परि कीधो जयजयकार ॥२६ ॥ सात खमासण द्यइ चित्त धरी । वास ठवइ गुरु हाथि करी । नित्थारपारग होहु जगीस। इंणि परि द्यइ सुगुरु आसीस ।। २७ ।। सुहव गाय गीत रसाल ।
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(३४)
वाजिंत्र वाजइ नवनव ताल । देवराइ तिहां बहुलां दान । परीयागत वधारयु वान ।।२८ ।। दश दिवस करइ रातीजगा । नुहंतरीया जन साहम्मी सगा । धर्मगोठिइ इमराति विहाय । परभाति लहिणि (?) देवराय ।।२९ ॥ महापूज आदीसरतणी। गुरुपूजा वली कीधी घणी । वधार्यो जिनतणो भंडार । साधुभक्ति करइ अपार ॥३० ॥ संघ जमाड्यो ऊलटपणइ । भाट भोजक कीरति बहु भणइ । घरे आवी गुस्ने पधरावि । वस्त्र पात्र दीधां वहिरावि ।। ३१ ।। साधर्मिक धरि लहिणी कीध । सेर सेर मोदक वस्त्रादिक दीध । इंणिपरि चुथु व्रत उच्वर्यु । वीरइ सुकृत पोतुं भर्यु ॥३२ ॥ संवत सोल अडतालो जेह । (१६४८) वली लींबडीनइ पाडइ तेह । चैत्य करावी थाप्या स्वामि । आरासमय जिन शांति अभिराम ॥३३ ॥ धन वावर्यु महोत्सव करी । सेठ वीरा कीरति विस्तरी । संवत सोल चउपना सार । (१६५४) माघ वदि एकमनइं १ रविवार ॥३८ ॥
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बिंब रतनमय शांति जिणंद ।
वीरइ भराव्यं भक्ति अमंद । खरच्यउ द्रव्य वली असमान ।
(३५)
श्री ललितप्रभसूरि युगपरधान ॥ ३५ ॥ शुभ मुहुरति सवि मेल्यु साज । करी प्रतिष्ठा जगमई अवाज ।
नुकार गुणनिक भोजन दीइ । नयर जमाडी लाहु लीइ || ३६ || हीरा गलसणीयां पामरी ।
गच्छ पहिरामणि वीरइ करी ।
वस्त्र दान चउरासी गच्छै ।
याचक वली दीधां पछै ॥ ३७ ॥
करणासाहनइ पाडइ उच्छाह ।
संवत सोलचउसठ्यामाहि (१६६४) ।
कराव्यो नूतन प्रासाद । सेवंता यलइ विखवाद ॥ ३८ ॥
रतनमय शांति जिणेसर जेह । ललितप्रभसूरि तिहां थाप्युं तेह |
चैत्य प्रवेशो उच्छव बहुं ।
वीरइ सज्जन संतोष्युं सहु ॥ ३९ ॥ संवत सोल ओगणसाठ्यइ करी (१६५९) ।
शत्रुंज यात्रा वली शुभवरी ।
गुडीजीनी यात्रा सार ।
वीरइ सुकृत्य कर्यां उदार ॥ ४० ॥ देशमांहिं थया नामनीक । वयण ज बोलइ ठावुं ठीक । माथुं उपाडइ न कोइ चाड ।
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(३६)
रखे सेठ करइ वणसाड ।।४१ ।। राय राणा जस आणा धरइ । कथन सेठनं अलवई करइ । दोसी वीरा प्रबल प्रताप । करइ नित देहरासर जिन जाप ॥४२॥ नित्य सांभलि वखाण गुरुमुखै । धर्मध्यान चालइ इम सुखें । जिन शासन निज धर्मनां पर्व । नयरीमांहिं पलावइ सर्व ।।४३ ॥ पुनिम सामाचारीस्युं रक्त। देव गुस्नो पूरो भक्त । गुरुनइ विहरावीनइ जमइ । मिथ्यात्वीनी वात नवि गमइ ॥४४॥ ललितप्रभसूरिस्युं अधिको भाव । गुरुनइ द्यइ पुस्तक लिखावि । जथाशक्ति जिनशाशन सार । नगरमांहिं प्रवर्तावणहार ।।४५ ।। ढंढेरवाडामांहिं जाण । साभलो पारसनाथ वखाण । वीरइ देहरातणुं मंडाण । मंडाव्यु उंचु अहिठाण ॥४६॥ संवत सोल बिहुत्तरि संगि (१६७२) । थई असमाधि वीरानई अंगि । सुगुरु ललितप्रभसूरी पासि । महाव्रत भार लीउ उल्लासि ।।४७ ।। निजघरि संथारो एकांति । गुरु पासई राख्या नीरांति ।
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(309)
साधुतणी किरीया दिन पंच । ते पण पाली मन अखलंच ॥ ४८ ॥
सुख समाधई रूडइ ध्यान ।
कीधुं अणसण तणुं विधान । देवंगत थया वीरो इंम ।
गुण वरणवी सकुं हुं किम ॥ ८३ ॥ वीरा साधुतणी मांडवी |
युगति घणी कीधी नवनवी ।
निहरण कारज विधस्युं कीध । सुत शिवजी लाहो लीध ॥ ५० ॥
केही करूं वीरा जोडली ।
गुण घणानई मति थोडली ।
सेवक इणिपरि करइ अरदास ।
वीरा संतति पुंहचइ आस ॥ ५१ ॥
इति श्री दोसी वीराकृत सुकृतसंचय चउपई संपूर्णा ॥
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पछइ सेठ शिवजी दोसीइं सामला पार्श्वनाथनुं देहरुं पूरुं कराव्युं । केतलाइक गृहिस्थनी सांनिधि । शत्रुंजयादिक तीर्थनी घणी यात्रा करी साहम्मीवत्सलादिक घणां कर्यां घणुं जिनशासनना प्रभावक थयां। घणुं निज देवगुरुना भक्त थया । तिहार पछी सुत मेघजी दोसी शेठ थया घणुं शासनना प्रभावक । घणी यात्राना कारक । स्वज्ञाति भोजनकारक । कृत साटिका पहिरामणी । घणुं मर्यादी जैन श्रावक थया । तत्सुत दोसी चांपइ । जयतसी प्रतापसी । तिलकसी । प्रेमो | दोसी अखईई भलीपर सेठी करी घणुं निजदेवगुरुना रागी थया । जिनशासन प्रभावक तिहार पछी दोसी श्री जयतसी सुत दोसी श्री तेजसी शेठ थया । तत् कृत सुकृत ... । संवत १७७४ वर्षे ज्येष्ट सुदि ८ सोमे । पत्तन मध्ये । श्री श्रीमाली ज्ञातीय । दोसी श्री वीरासुत । दो। श्री शिवजी सुत । दो। श्री मेघजीभार्या सहिजूबाई सुत। दो । श्री जयतसी भार्या रामबाई सुत दोसी श्री तेजसीभार्या देव बाई सुता पुंजी १ सुत गुलाब । द्विभार्या राधाकृष्ण सुता लहिरकी । सुत मलूक प्रमुख सपरिवारयुत। दो। श्री तेजसीकेन सुखश्रेयोर्थं श्री पार्श्वनाथादि बिंब सहस्त्र पित्तलमय : कोष्ठः कारितः । श्री पूणिमा पक्षे ढंढेरपाटके ।
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(३८) भ । श्री महिमाप्रभसूरिस्तत्पट्टे । भ । श्री भावप्रभसूरीणामुपदेशात् कृत महामहोत्सवेन प्रतिष्ठापितश्च । इति श्री सहस्सकोट प्रशस्ति : हेठई लिखी छइ परकरें ।।
देशी कडखानी ॥ सकल सुखकारिणी दोषभय वारिणी । सरसती भगवती पाय थुणीइ । जास सुपसाय कविराय हिवइ वर्णवइ । नगर सोभनीकनी कीर्ति सुणीइ।।१।।सक० श्री श्रीमाल सुविशाल वंशइवरु। दोसी श्री तेजसी तेजि दिपई। नगर सणगार महाजन शिर सेहरो । वांकडां वइरीयांने जे जीपइ ॥२ ॥ निज परीयागत रीतराखण भणी । असार संसारमा सार जांणी । सफल निज जन्म करवा भवी तारवा । वारवा सयल दुरगति खाणी ॥३॥ पारसनाथ जगनाथ आदि सहुं । सहस्स पित्तलमयबिंब वारु। सहस्सकोटि नाम तीर्थ करावीउं । रूप सौवर्ण दीसइ दीदारू ॥४॥ सत्तर चिमोत्तरइ ज्येष्ठ सुदि आठमि । वार सोमई सहु संघ युक्तई । प्रतिष्ठा करावी घरि घणई महोत्सवइ । सुगुरु श्री भावप्रभसूरि भक्तिं ।।५ ॥ संघ सन्मान बहुदान याचक भणि । तपजप पुण्यनी रीति पोषी । दोशी श्री जयतसी सुपुत्र सोहामणो । दूर गया हिवइ पाप दोषी ॥६ ।। धन धन मात रामां जिणइं जनमीओ । पुंनिम गच्छ प्रभावकारी । कहइ शांतिदास अरदास सुणो सेठजी । सकल जंतु तणो तुं उपगारी ॥ ७ ॥
___ सं. १६५६ कुंभारीया पोलैं सोनी अमीचंदई आदिनाथनो प्रासाद कराव्यो । सोनी अमीचंद । सुत । सो. ऋषभदास । सुत । सो. शांतीदास । सुत । सो. सामलासकल । अमर। लखो । सुंदर।
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हीरविजयसूरिनो लेख
-मुनि महाबोधिविजयजी ज्ञानादि पांच आचारोने स्वयं पाळे तथा आश्रित पासे पळावे एनुं नाम आचार्य. पंचाचारना पालनमां उद्युक्त आचार्य भगवंतो स्वशिष्यवर्ग पंचाचारना पालनमा अप्रमत्त रहे ते माटे अवसरे अवसरे नियमावली घडता होय छे, अने श्रमणो पासे तेनुं पालन कावता होय छे. जूनी-नवी अनेक नियमावलीओ आजे पण प्राप्त थाय छ जे पट्टक तरीके पण ओळखाय छे.
प्रस्तुत छे बे हजार जेटला विशाळ श्रमण समुदायना नेता, जगद्गुरू-श्री हीरविजयसूरिमहाराजे पोताना आश्रितवर्गना पंचाचारना निर्मळ पालन अर्थे बनावेली नानकडी नियमावली. अलबत्त, आ लेखमां तेओश्रीए नियमावलीने बदले विबुधजन विज्ञप्ति एवी संज्ञानो प्रयोग कर्यो छे.
श्री विजयदानसूरिगुरुभ्यो नमः । संवत् १६४० वर्षे पौषासित १० गुरौ श्रीहीरविजयसूरिभिलिख्यते।
अद्यप्रभृति विबुधपद विज्ञप्तिरेतद् विषये कर्तव्या, यो श्री दशवैकालिक -श्री आवश्यकनियुक्तिभाष्य-पिंडविशुद्धि-कर्मग्रंथ-योगशास्त्र-क्षेत्रविचार-संग्रहणी -उपदेशमाला-षड्दर्शनसमुच्चय-प्रवचनसारोद्धारादि ५००० ग्रन्थकण्ठपाठी जघन्यतोऽपि तथा हैमद्वादशपादप्राकृतवृत्ति सहिताथवा प्राकृतवृत्तिसहितप्रक्रिया-सारस्वतं वा तथा साहित्ये वाग्भट्टालङ्कार-काव्यकल्पलता-छन्दोऽनुशासन-वीतरागस्तव-शोभनस्तुति- जिनशतकषड्दर्शनसमुच्चयटीका-नाममाला-लिङ्गानुशासन-धातुपाठ-तीर्थकृच्चरित्रादि तथा सिद्धान्ते आवश्यक-दशवैकालिक-उत्तराध्ययन-ओघनियुक्ति-नंदी-अनुयोगद्वारादि तथा विचारग्रन्थे सङ्ग्रहणी-क्षेत्रविचार-कर्मग्रन्थ-भाष्य-पिण्डविशुद्धि-सामाचारी प्रभृति तथा ज्योतिःशास्त्रं नारचन्द्रादि अर्थतः पाठयति, तथा तपः मासमध्ये षडुपवासकारी-चतुर्मासक सांवत्सरिकषष्ठाष्टमकारी, तथा मार्गातीत-कालातीतत्यागी, तथा रोगादिकारणं, विना दिवा त्रियामाद्ययामे स्वापत्यागी, त्रिविधाहारैकभक्तकारी, तथा आच्छादितास्य-जल्पनप्रमार्जनोपेतचलन-विहाराहारावश्यकप्रतिलेखनादिषु जल्पनप्रतिषेध-समिति- गुप्तिप्रभृतिसंविज्ञसामाचारी प्रवर्तकश्चेति, स्वसंघाटकमध्ये विशेषतः ।
तथा प्राक्तनविबुधैरेतद्विषये यतितव्यमन्यथा। तपस्यादेशविषये विचारः॥ श्रीकल्याणमस्तु श्रमणसङ्घाय ।। श्रीमल्लिपीकृताः पं. कनकविजयसविधौ पट्टोऽस्ति॥ १. मद्धृदि मेधां निधेहि. इत्यपि।
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(४०)
शत्रुजयमंडन ऋषभदेव-स्तुति
- मुनि भुवनचन्द्र अपभ्रंश मिश्रित जूनी गुजराती भाषानी आ कृति कुल त्रण हस्त प्रतोना आधारे यथामति शुद्ध करीने अहीं आपी छे. कोई पण प्रतिमां लेखनसंवत अपायो नथी। त्रणे प्रतिओ खंभातना श्री पार्श्वचन्द्रगच्छ जैन संघना ज्ञानभंडारनी छ । प्रति क्रमांक ३८-५८५ अनुमानतः पंदरमां सैकानी जणाय छ। आ प्रतनी विशिष्टता ए छे के 'न'कारथी शरू थता शब्दोमां आमां 'न' ने स्थाने 'ल' जोवा मळे छ। आ प्रतमां प्राकृत 'शत्रुजय कल्प' पण छे, तेमां पण आवं परिवर्तन देखाय छे। जो के बधे स्थले आ नियम सचवायो नथी। २४-३७६ क्रमांकनी प्रतिमां विविध प्रकरणो साथे आ कृति पण संगृहीत छे अने ते संभवतः १६मी सदीमां लखायेली लागे छ। क्रमांक ३८-५८४ नी प्रति १७ मा सैकानी जणाय छ। त्रणे प्रतिओ अशुद्ध छ ।
आना कर्ता तपागच्छे विजयदानसूरिशिष्य 'वासणा' साधु छे. एमनो समय ई. १६मो सैको होवानु नोंधायुं छे. आ माटे 'जैन गुर्जर कविओ'-१, पृ. ३६३, (प्र. ई. १९८६, म.जै.वि., सं. जयंत कोठारी) तेमज 'गुजराती साहित्यकोश' (मध्यकाल) पृ. ३९९ (प्र. ई. १९८९, गु.सा.प.) द्रष्टव्य छे.
पहिलउं पणमिअ देव परमेसर सेत्तुंज-धणीअ पयपंकयरय-सेव रंगिहि विरचिसु तसु तणिअ जिणवर मह नह ठाणु नाण-झाण-वित्राण जओ ?' बालक परि विन्नत्ति बहु भोलिम तुह करिसु तओ ततु ॥१ दिणयर जिम तुम्हि देव निम्मल केवल किरणधर तिहिं भुवणिहिं तिहिं कालि सयल-पयत्थ पयासकर पंचसय तियसट्ठ मिच्छाईअ पगई य पमुह जोणिलक्ख कुलकोडि तहुवि हु जंपिसु दीणदुह ॥२ सामिअ सासोसासि भव सवा सत्तरि सहिअ
संपूरंतु निगोदि हुउं अणंत पुग्गल रहिअ १. कतु । २. ततु ।
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(४१)
जिणेवर हिव विवहारि-रासिहि वासिहं आविअउ कम्मि अणंतउ कालु अणंतकाइ कुलि ठाविअउ ॥३ दुविह पुढवि दग तेअ वाय वणस्सइ विगलतिअ जलचर पमुह दु भेअ पज्जत्तापज्जत्त ठिअ इअ अडयाल पयार तिरिअ तणी गइ संकमिउ तह दंसण विण देव हउं असंखभव परिभविउ ।।४ संकड-कुंभीपाय-असिवण-वेअरणी-रसिहं सामलिपत्ति विचित्ति छेअण-पहरण-सयवसिहिं सत्तय लक्ख निवासि जिणवर मई तुम्ह आण-विणु दुसह सहिअ दुहरासि पज्जात्तापज्जत्ति पुणु॥५ भरहेरवइ विदेहि ए तिन्निय पंच य गुणिआ अढाइअ दीवेसुं कम्मभूमि पनरह भणिआ हेमवयं हरिवास तह रम्मय एरनवय चउपण गुणिया वीस तीस हवई दस कुरु साहि।। ६ सत्तसत्त इग पासि सत्त सत्त बीजई गमई हिमगिरि दाढ चउक्कि तिम सिहरी अ सेलिहिं हवइं छपन्नंतर दीव इअ भणिअई जिणसासणिहिं लवण समुद्द-मझारि निवसई सासइ आसणिहिं।। ७ कम्म कम्मह भूमि छपनंतर दीव जुअ पज्जत्तापज्जत्त भेदिहिं बिहुँ आग्गलि बि सय इग सय मुच्छिअ भेअ मिलिअ तिडुत्तर तिनि सय इउ मणुअत्तणि नाह [ह]- उं हिंडिअ तुह पय रहिय॥८
(भाषा) परमाहम्मिअ पंनरस, भवणेसर दस जाणि। सोलह वितर जोइसिअ, चर-थिर दस य वक्खाणि ॥ ९ नव लोगंतिअ किब्बिसिय, तिनि अ कप्पह बार। जिंभय दस गेविज्ज नव, पंचाणुत्तर सार। १०
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(४२)
पज्जत्तापज्जत्त हूअ, अट्ठाणु अ सउ भेअ। देवत्तणि हउं फिरिअ, लद्ध न तुह मई भेअ ॥ ११ आभिग्गह अणभिग्गहिअ, अहिलिवेस संपत्त। संसय अन्नाण य जाणिअ, पंच भेअ मिच्छत्त ॥ पुढवि दगागणि-पवण -वण तस छ जीव निकाय इग-दु-ति-चउ-पचिदि मण, अविरय बारस जाय ।।१३ कोहाइय सोलस हवइं हासाइय छ-ब्भेअ। तिन्न वेय पणवीस इय, सयल कसाय सभे॥१४ सच्चु-असच्चउं मीसु तह तुरिअ सच्चासच्चु। मण जिणि परि तिणि परि वयण, चउ चउ जोगपवच्चु ।।१५ उरल उरालिय मीस पण, वेउव्विअ तम्मिस्स। आहारग तस मिस्स जुअ, कम्मणु सत्त तणुस्स॥१६ नाणावरणह पंच नव, दंसणि दुन्नि अ वेअ। अठवीस पुण मोहणिअ आउतणा वउ भेअ॥ १७ नामि तिडुत्तर एग सय, गुत्तह दुनि य भेअ। अंतराय-पंचय सहिअ, अठावन सउ एअ।। १८ सागर संखा मोहणिअ, सत्तरि कोडाकोडि। नामह गोअह बिहुँ भणी अ, वीस वीस ते जोडि॥ १९ तीस तीस नाणावरण, पमुह बिहुँ तिहिं हुंति। तित्तीसं सागर ठिइ अ, आउअ कम्म कहति ।। २०
(भाषा) महुरहिं ए महुरतरेण, अइमहुरिहिं सोहणरसिहिं। कडुईहिं ए कडुअतरेण, अइकडुई(हिं) कसमलकसिहि॥२१ सामल ए मीस सरूवि, अइ उज्जल पुग्गलदलिहि। लहुउलई ए अइलहुइवि गुरुइं अइगुसंहिं बलिहिं।। २२
१. बहु। २. अ समेअ।
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(४३)
ए पंचेउ अ ए कारण जोगि, पगइ पमुह चउ भेअ इम । बंधवी ए अठ ए कम्म, हउं भमिउ भवि चक्क जिम ॥ २३ इणि भवि ए आविउ देवस पुत्रवसिहं तुह, पयसरणि ! तिम करउ ए सासइ सेव, तुह जिम हुइ भवजलतरणि ॥२४ जोणि िए लक्ख सत्त, सत्त पुढविअ पय पावय पवणि । चदह ए दह लक्खाणि, अनंतकाईअ पत्तेअवणि ।। २५ विगलह ए दो दो लक्ख, चउ चउ नारय तिरिअ सुरे।
अह ए चउदस मेलि, फिरिउ चुलसी लक्ख पुरे ॥ २६ पुढवीअ ए आयह तेउ, वाय वणस्सइ विगलभव । बारह ए सत्त ति सत्त अडवीसा सत्तट्ठ नव ॥ २७ जलचर ए नह - थलचारि, उरग-भुअंगह अहिजुअल । सड्डा ए बारह बार, दस दस नव लक्ख कोडिकुल ॥ २८ देवह ए नारय लक्ख, छव्वीसा पुण वीस पुण ।
अहं ए बारह लक्ख, कुल कोडी अ सेत्तुंजजिण ॥ २९ एक ज ए कोडाकोडि, साढा लाख सत्ताणवए । एतीअ ए हउं कुल कोडि, प्रभु भमिउ भवि नव नव ए ॥ ३० दोसलउ ए उलउ, वेउ अरि वेला जिम जिहिं वहए ।
च्यार ए चर चर भेअ, कोहाइय गिरिकुल रहए ।। ३१
पांचय ए विसयला चोर, माछलडा मय उछलई ए ।
तिणि भविअ ए जलहि पडंति, तुम्हि प्रभु पवहण लद्ध मई ए ॥३२
इय रिसह जिणवरु, सिद्धि सयंवर, सुंदरी वर सुंदरी ।
सिरि विमलभूधर, धवल सिंधुर, खंधवास, पुरंदरो ।। ३३
सेवई सुभासुर, व्यणिअ भासुर, गुरु भवासुर गंजणो
मह, सुविहि वासण, दिसउ सासण, विजय तिलय निरंजणो ॥ ३४
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'चोवीश- जिन - नमस्कार ( अष्टमी-माहात्म्य - गर्भ )
( वाचक यशोविजय कृत )
- सं. शीलचन्द्रविजय गणि
वाचक यशोविजयजीनी घणीबधी प्राप्त गुर्जर रजनाओ " गूर्जर साहित्य संग्रह (सं. मो. द. देसाई) १ - २ " मां तथा अन्यान्य स्थले प्रगट थइ छे. छतां हजी क्यांक क्यांक भण्डारोमांथी तेओनी कृतिओ मळी आवे तेवी संभावना अवश्य छे. मित्र मुनिराज श्री धुरन्धरविजयजीना ध्यान पर ताजेतरमां ज एक आवी रचना आवतां तेमणे मने मोकली, जेनी प्रतिलिपि अहीं प्रस्तुत छे.
A
२४ कडीनी आ कृतिमां ऋषभदेवथी वीरजिन पर्यन्तना २४ तीर्थंकरोनी स्तुति तो छे, परंतु ते स्तुति पाछळनो मुख्य आशय अष्टमीना - आठम तिथिना तपनुं माहात्म्य वर्णववानो जणाय छे. प्रत्येक कडीमां तीर्थंकरनुं नाम, तेमनुं लांछन (चिह्न) अने अष्टमीतपनो महिमा -आ त्रण मुद्दा गूंथी लेवामां आव्या छे. पोते सिद्धहस्त कवि छे. एटले सामान्य जणाती कृतिमां पण कल्पनाविहारनी साथे साथे योग अने साधनाना प्रदेशनी वातो सहजपणे वणायेली जोई शकाय छे. (कडी ६, ११-१६)
आनी एक ज प्रति मळी छे. तेनी लखावट जोतां १८ मां शतकमां लखाई होवानी अटकळ करी शकाय तेम छे. २ पत्रनी प्रति, प्रांते थएला उल्लेख अनुसार 'सूरत 'मां लखायेली छे.
एँ नमः ॥
वृषभलंछन आदि जिणंद, प्रतपो मरुदेवीनंद । अट्ठमि - तप विघन निवारिं, उपदेसि त्रिभुवन तारिं ॥ १ गजलंछन वंछित - दाता, दिओ अजित भविकनें शाता । अट्ठमि - तप ध्यान पडूर, करें आठइ भय चकचूर ॥ २ हयवर - लंछन पय सोहई, संभवजिन तिहुअण मोहई ।
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(४५)
अट्ठमि-तप ध्यान अखंड, करइ कर्म कठिन शतखंड। ३ वानर-लंछन पय स्वामी, नमुं अभिनन्दन शिवगामी। अट्ठमि-तप ध्यान-समुद्द , विस्तारण चंद्र अमद (अमुद्द) ॥ ४ श्री सुमतिनाथ मुख दीठइ, भवभवनां पातिक नीठई। पय-लंछन क्रौंच विराजई, अट्ठमि व्रतवंत निवाजइं॥ ५ पद मोहें लंछन-पद्म पद्मप्रभ यलइ छद्म। अट्ठमि-तप योग समाधि, दिइ दर्शन रहित-उपाधि ।। ६ स्वस्तिक-लंछन सविआस, पूरइ जिनराय सुपास। अट्ठमि-तप ध्यान-प्रभाव, भव-सायर-तारण नाव॥ ७ चंद्रप्रभ आठमो देव, करि लंछनमिसि विधु सेव। अट्ठमि-तप ध्यान-विधाता, एहवो अवर न को वर-दाता ।। ८ श्री सुविधि सुविधि सम-कंदो, जिन मकर-लंछन नित वंदो। अट्ठमि-तप उज्ज्वल ध्यान, जिनमंडल सोहइं प्रधान।। ९ शीतलजिन शीतलवाणी श्रीवच्छ-लंछन गुण-खाणी। जस अट्ठमि-व्रत उपदेशइ, नवि कर्म टकइ लवलेशइं॥ १० इग्यारमो श्रेयांसदेवो, खड्गी-लंछन भवि सेवो। अट्ठमि-तप ध्याननी धारा, हुइ जेहथी अचल अपारा॥ ११ वासुपूज्य जपो जग-भांण, पाय-लछंन महिष प्रमाण। अट्ठमि-तप सहज सनूर, करें चिदानंद भरपूर।। १२ शूरक-लंछन जिन विमल, मन-मांहि रमो गुण अमल। अट्ठमि-तप आठ प्रदेश -सरखा करें जेह असेस॥ १३ सींचाणो-लंछन पाय, समरुं ते अनंत जिनराय। अट्ठमि-तप जेहथी जांणो, अड-योगई दिट्ठि सपराणो॥ १४ वज्र-लंछन धर्मजिणंद, अट्ठमि-तप-कमल-दिणंद। रतन-त्रय वदति अभे(खे ?)द, तस साधन दाखई अभेद॥ १५ मृग-लंछन शांतिजी ध्यावो, अटुमि-तप-फल शिव पावो।
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(४६)
जे लहिई सुद्ध उपयोगे , तस साधन शुभ उपयोगें।। १६ छाग-लंछन नमिइं कुंथु, जे सिद्ध हुआ अलमंथु। अट्ठमि-तप कहें जे अखेद, विधि भक्ति वसे फलभेद ।। १७ अर-लंछन नंदावत, टाले भवभय-आवर्त। नमुं अट्टमि-तप अवदात, वर ध्यान विवेक विख्यात॥ १८ मल्ली गुण-मल्ली-माला, घट-लंछन नमीइ त्रिकाल। अट्ठमि-तप संवर शकति, दीपइं अध्यातम विगति ॥ १९ कच्छव-लंछन मनि धरीइं, मुनिसुव्रत जिम भव तरीइं। अट्ठमि-तप शुभ उपयोग, इम प्रगट हुइ ज्ञानयोग। २० नीलुप्पल-लंछन स्वामी, नमिनाथ नमुं शिवगामी। अट्ठमि-तप-जप फलदाई , ए छइ साचो धर्म सहाई॥ २१ शंख-लंछन नेमि नमीजइ, अट्ठमि-तप-व्रत-फल लीजइ। राजूल-मन-नयणाणंद, प्रभु भविक-कुमुद-दिनचंद॥ २२ फणी-लंछन पुरिसादाणी, प्रभु पास नमो गुण-खाणी। अट्ठमि-तप ध्यानमां धरिओ, दिइ प्रभु शिवसुख गुणभरीओ॥ २३ हरि-लंछन प्रभु वीरजी वंदो, अट्ठमि-व्रत पाप-निकंदो। गुरु श्रीनयविजय सुशीस, जस ध्यान धरि निशिदीस॥ २४
इति श्रीचतुर्वंशतिजिननमस्कारः संपूर्णः।। लिखितः श्रीसूरति बांदरे॥ श्रेयस्तु॥ मंगलीक।
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त्रण चउवीसी - विहरमाण-जिन-स्तवन लक्ष्मीसागरसूरिशिष्यकृत
- सं. मुनि कल्याणकीर्तिविजय तपगच्छनायक आचार्य श्री लक्ष्मीसागरसूरिजीनो शासनकाल सोलमां सैकानी पहेली पच्चीशी छे. तेओना शिष्ये रचेल बे गुजराती लघुकृति अत्रे आपवामां आवे छे. तेनी बे पानांनी एक प्रति मारा गुरुजीना संग्रहनी छे, तेना आधारे यथामति संपादन कर्यु छे. प्रतिमां लेखकनाम के संवत् नथी, छतां लेखनशैली जोतां १६मा शतकमां ज-कदाच कर्तानी पोतानी-लखेल होय तेम अनुमान थाय छे. २४+२४+२४+२० = ९२ तीर्थंकरोनी स्तुति रूपे रचायेल आ रचना अप्रगट जणायाथी अहीं प्रस्तुत करी छे. गुरु-आज्ञा थवाथी करेल प्रथम प्रयासमां बालसुलभ क्षति जणाय तो तेनी क्षमा प्राथु छु. २८ मी कडीनो त्रुटित अंश जोडेल छे जे [ मां छे.
सरसति सामिणी वीनवउं ए पणमीय गोयमपाय तु। जासु पसाय जिण गायसिइउं ए, हीइ धरि बहु भाय(व) तु॥ १ अतित अनागत वरतता ए, बहुत्तरि जिणवर जाणि तु। विहरमाण वीसह साहिय, बाणु जिन मनि आणि तु॥ २
(वस्तु) गोयम गणहर, गोयम गणहर, पाय पणमेवि। सरसति सामिणि भनि धरीय, भणिसु भावि श्रीसुगुरु सानिधि। जासु नामि रिधि वृति हुई, अलिय विघन सवि दूरि जाई॥ अतीत अनागत वरतता, जाणीय जिणवर सार। विहरमाण वीसह सहिय, बाणू गणी अ जुहारि॥ ३
(प्रथम भाषा) अतीत चउवीसी जिणवर जाणी पिहलङ पणमउं केवलनाणी, नम निरवाणी हेव। त्रीजउ जिणवर सागरसामी
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(४८)
पाप ताप सवि जाई नामिई, महाजस चउत्था देव॥ ४ पांचमउं पणमउं विमलजिणेसर सरवानू(नु) भूति छठा तित्थेसर, जिणवर, सुखदातारो। सातमउ सामी सीमंधर ध्याउं आठमउ दत्त जिणंद आराहउं, जिम पामउं भवपारो॥ ५॥ नउमउ दामोदर पणमीजइ। दसमा देव सुतेज थुणीजइ, जाणीजइ जिणसारो। सामीनामि जाई सवि रोगा। मुनि(सु)व्रत पूजिई संयोगा, अनंत सुखदातारो॥ ६ दह त्रीजउ श्रीसुमति नमीजइ शिवगति चउदसमउ पभणीजइ, जाणी जिणवर सार। दह पंचम अस्ताघ जिणेश्वर सोलसमउ पणमउं नमीश्वर, सफल करउं संसार॥ ७ अनिलनाथ सतरसमउ जिणवर अष्टादसमउ (निरंतर) सिरि यशोधर सार। कृपासागर कृतार्थ भणीजइ जिनेश्वर सामि वीसमउं थुणीजइ, जाणी नाम विचार।। ८ शुद्धमति जिणवर नयणानंदन बावीसमउ जिन दुरिय-विहंडन, शिवकर नमउं सुविसाल। स्यंदननाथ नमउं सिरनामी चउवीसमउ जिणवर मणि आणी, संप्रति नमउं त्रिकाल ॥ ९
(वस्तु) केवलनाणी, केवलनाणी, नमउं निरवाणी सागर महाजस विमल जिण, सर्वानुभूति सीधर दत्त । दामोदर सुतेज सामी, मुनिसुव्रत सुमति शिवगति॥
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(४९)
अस्ताघ नमीश्वर अनील, यशोधर कृतार्थ निश्चल। शुद्धमति सार शिवकर, स्यंदन संप्रति नमउ।। १०
(द्वितीय भाषा) पिहलउं पणमउं आदिजिण, बीजउ अजिय जिणेस तु। संभव त्रीजउ जगि जयउ ए, अभिनंदण पणमेस तु॥ ११ सुमतिनाथ जिण पांचमउए, छट्ठा पुमप्पह नाम तु ।। सुपासजिणेसर सातम(उ)ए, चंद्रप्रभ करउं प्रणाम तु ॥१२ नउमा सुविधिजिणेसर नमउ, दशमा शीतल सामी तु। श्री श्रेयांस अग्यारमा ए, वासुपूज्य पणमामि तु॥१३ दह'त्रीजउ श्री विमला नमउं, चउदमउ अनंतजिणेस तु। धरमनाथ प्रभू पनरमउ, सोलमा शांति जिनेस तु॥ कुंथुनाथ प्रभु सतरमउ ए, अरनाथ नउ सवि दीस तु ।
ओगणीसमउ जिणवर जयउ ए मल्लि, मुनिसुव्रत वीस तु॥ १५ हउं नमि नमउं एकवीसउ, बावीसमउ श्रीनेमि तु। पाससामि त्रेवीसमउ ए, चउवीसमउ वद्धमाणसामि तु ॥ १६
(वस्तु) आदि जिणवर, आदि जिणवर, अजिय जिणनाह संभव अभिनंदण सुमति, पद्मप्रभ श्रीसुपास चंद्रप्रभ । सुविधि सीतल श्रेयांस जिण, वासुपूज्य श्रीविमल अनंतजिण॥ धर्म शांति कुंथ अर मल्लि, जिणमुणिसुव्रत नमि नेमि। पास वीर भवियणनमीय, जिम पामउ शिव खेमि॥ १७
(त्रीतीय भाषा) अनागत जिणवर हुं नमउं तु भमस्ली, पिहलङ पढम जिणंद। पउमनाऊ भगि जाणीइ तु भम, उम्मुलइ दुहकंद तु॥ १८ १. तेरमा.। २. उन्मूलन करे.
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(५०)
बीजन जिण सूरदेव उमउं तु भमरु श्री सुपासजिणेस तु ।
चउत्थर संप्रभसामि जयउ तु भमरु. टालइ सयल किलेस तु ॥ १९
सरवानुभूति जिण पांचमउ तु भमरु छट्टा श्रीश्रुतदेव तु। उदयजिणेसर सातमउ तु भमरु. पेढाल पणमउं हेव तु ॥ २० पोटिल जिणवर जाणीइ तु भमरु. दसमां सितकीरति सामि तु । सुव्रतसामि अग्यारमउ तु भम. अममह करडं प्रणाम तु ॥ २१
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(वस्तु)
भवि जिणवर, भवि जिणवर, थुणउं त्रिणकाल पद्मनाम भूर देव नमउं, सुपाससामि सयंप्रभु जिनेश्वर । सर्वानुभूति श्रीदेव श्रुत, उदयनाथ पेढाल जिणवर ।
पोटिलसामी जगि जयउ, अम[म] पणमउं जिणवर बार || २२
(चतुर्थभाषा )
दह त्रीजउइए देव निकषाय, निप्पलाग जगि जाणीए । पनरमउ ए निरममसामि, चित्रगुपति मनि आणीइ ए ॥ २३ सतरमउ ए समाधि जिणंद, संवर नमउं अट्ठारमउ ए । जिसोधर ए पणमउ हेव, विजयसामि नमउं वीसमउ ए ॥ २४ एकवीसमउ ए मल्ल जिणंद, देवनमउं बावीसमउ ।
वीसमउ ए अनंतवीरजि, भद्रकृत ध्याउं चउविसमउ ए ॥ २५
( वस्तु) नमउं निरंतर, नमउं निरंतर, देव निकषाय निप्पलाग निरमम सहित, चित्रगुपति श्रीसमाधजिनवर । संवर जिसोधर विज[य], जिण मल्लदेव श्री अनंतवीरजि । भद्रकृत ए चउवीस जिन, पणमउ भवियण लोय । विहरमाण वीसह तणां, नाम सुणउ सहू कोय ॥ २६
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(५१)
(पंचम भाषा) श्री सीमंधर करउं प्रणाम, बीजा जुगंधर लिउ नाम।
बाहु सुबाहु जिणवर नमउं ए॥ २७॥ सुजात सामि पांचमा जिणेसर, [छठा स्वयंप्रभजि सातमा ऋषहेसर
अनंत]जि ध्याउं आठमउ ए।। २८
सूरप्रभ सामि विसाल नमीजइ, अग्यारमउ जिन वजधर पणमीजइ।
चंद्रानयन प्रभु बारमउ ए॥२९ दहत्रीजउ चंद्रबाहु भणीजइ, भुजंग सामि ईश्वर पणमीजइ।
सोलमउ जिन नेमिप्रभजउ॥ ३० सतरमउ वीरसेन महाभद्र जिनवर(जिनेसर), देवजस उगणीसमउ तित्थेसर।
अजितवीरजि वीसइ नमउं ए॥ ३१ जे नर ए नारी वृंद प्रह ऊठी ए, जिन नमइ ए ते लहइं ए सुररिद्धि।
नरय तिरीयगति नवि भमई ए॥३२ धन धन ए ते दिन रातिय, सफल जनम तीहं जाणीइए जिणिइ खिणिइ ए बाणू जिणंद, भाव सहित मनि आणीइ ए॥ ३३
(भाषा) श्री रयणसेहर, गरुअ गणहर, सीसवंछितदायको। जयवंत श्रीगुरु लखिमीसागर-सूरि तपगछ नायको ।। तुम सीस भत्तिहिं, एकचित्तिहि, थुणिइ जिणवर इण परे। प्रह ऊठि जे नरनारि प्रणमई सयलमंगल तीहं घरे। ३४
इति श्रीत्रिणि चउवीसी-विहरमाण स्तवनं संपूर्णम्॥
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"उवहाण पइट्ठा पंचासग" उपरथी फलित थतो एक मुद्दो
___पं. शीलचन्द्रविजय गणि
अनुसन्धान-४मां प्रकाशित उपरोक्त रचना (सं. पं. प्रद्युम्नविजयजी) प्रसिद्ध आचार्य श्री हरिभद्रसूरिनी छे. जो के मुनि पुण्यविजयजी-संपादित "केटलोग ओव पाम-लीफ MSS. इन ध शान्तिनाथ जैन भण्डार, खंभात" भाग-२ मा प्रतिक्रमांक १२९ (२) मां आ कृतिनो अंत आ रीते नोंधायो छे : "उवहाणपंचासयं सम्मत्तं ।। श्रीमदभयदेवसूरेः कृतिरियम् ॥ " अने ते उपरथी ए पंचाशकना कर्ता आ अभयदेव होवा- कोई मानी ले तेम बने. परंतु आ प्रकरणनी अंतिम गाथामां आवता "विरह" शब्दने लीधे आ आशंका आपमेळे निर्मूल बने छे. तेथी ज श्रीपुण्यविजयजीए पण प्रतिवर्णन करतां कर्तानी कोलममां "Author- Abhayadevasuri (?)" आ रीते नोंधेल छे.
आ तो आडमुद्दो थयो. मूल मुद्दो तो आ छे: जैन आगमोमां 'महानिशीथ' सूत्र एक स्वतंत्र आगम छे, जे आजे तेना मूल स्वरूपमा पूर्णतया अप्राप्त छे. परंतु श्री हरिभद्रसूरि महाराजे, पोताना समयमा प्राप्त जीर्ण तथा खण्डित पोथीना आधारे आजे प्राप्त आ आगमनुं संकलन कर्यु होवानी परंपरा-स्वीकृत धारणा छे. आ धारणाने घणा लोको भ्रान्त तेमज दन्तकथारूप गणावे छे अने ते रीते प्राप्त महानिशीथ सूत्रने कूट ग्रन्थ गणीने चाले छे.
इतिहासविद् पं. श्री कल्याणविजयजी नोंधे छे के : "परन्तु एकदो का समर्थन मिल जाने मात्र से महानिशीथका हरिभद्रसूरि द्वारा उद्धार होना प्रमाणित नहीं हो सकता, हमने श्री हरिभद्रसूरि के लगभग ६० ग्रन्थ पढे है, पर उनमें महानिशीथ के उद्धार की बात तो क्या उसका नामनिर्देश तक नहीं मिलता । इस स्थिति में 'महानिशीथ सूत्र दीमकने खंडित कर दिया था और शासनवात्सल्य से आचार्य हरिभद्रसूरिने इसको अन्यान्य शास्त्रपाठों के आधार से व्यवस्थित किया और सिद्धसेन दिवाकर आदि ८ श्रुतधर युगप्रधान आचार्यों ने इसे प्रामाणिकठहराया' इत्यादि दन्तकथा सत्य होनेमें कोई प्रमाण नहीं है । "(प्रबन्धपारिजात, जालोर, ई. १९६६, पृ.७२)".
श्री कल्याणविजयजीना आ विधाननो उत्तर हवे आ उपधान पंचाशक मांथी मळी रहे छे । आ पंचाशकमां हरिभद्रसूरिजी महाराजे महानिशीथसूत्रनो स्पष्ट उल्लेख तो
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को ज छे, तदुपरांत तेने प्रमाणभूत ठराव्युं छे. आनाथी जो के श्रीहरिभद्रसूरिए महानिशीथ सूत्रनो जीर्णोद्धार कर्यानुं फलित नथी थतुं, परंतु हरिभद्रसूरि अने महानिशीथसूत्रने काइ लेवादेवा ज न हती ते वात हवे असंगत ठरे छे. बल्के महानिशीथसूत्रनी प्रमाणभूतता अंगे तेमणे जे रजुआत करी छे ते जोतां ते आगमना पुनरुद्धारना कार्य साथे तेओश्री जरूर संकळाया हशे, तेम अटकळ करवानुं मन थाय तेवू छे.
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उमास्वाति - आर्यसमुद्रनां नवप्राप्त पद्यो विषे
मधुसूदन ढांकी
उपर्युक्त विषयमा मुनिवर शीलचन्द्र विजयजीए "ट्रंकी नोंध" १. त्रण मूल्यवान पद्यो अन्तर्गत अनुसंधान अंक ३, पृ. २१ पर उमास्वातिनां बे तथा त्यां पृ. २२ पर आर्य समुद्रना नामे उध्धृत थयेल एक पद्य विषे रसप्रद अने माहितीपूर्ण चर्चा करी छे. अने अनुसंधान अंक ४, पृ. १७ पर एमणे 'वाचक' नामे उध्धृत थयेला एक विशेष पद्य पर ध्यान दोर्युं छे, जे उमास्वातिनुं होवानुं एमनुं सूचन छे. प्रस्तुत अंक ४ मां मुनिराज महाबोधिविजये पण उमास्वाति संबंधित एक पद्य विषे उपयुक्त अने पूरक माहिती साथे चर्चा करी छे. अहीं जे अवलोकनो रजू करूं छं ते उपरकथित बने चर्चाओने अनुसंधाने छे.
( १ )
वाचक उमास्वातिए एमनी हाल उपलब्ध छे ते कृतिओ - सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्र, प्रशमरति प्रकरण, अने क्षेत्रसमास जम्बूद्वीपसमास - अतिरिक्त अन्य प्रकरणो रच्यां हशे ते वात नि:शंक छे. (अलबत्त एमणे ५०० प्रकरणो रच्यां होवानी, ओछामां ओछु जिनदत्तसूरिना गणधरसार्धशतक (इ.स. १०४८ ) थी नोंधाती आवती किं वदन्तीने तथ्यपूर्ण मानी लेवानी जरुर नथी.) पण मुनिप्रवर शीलचन्द्र विजयजीए उध्धृत थयेलां प्रतिमा-प्रतिष्ठा - विधि एवं प्रतिमा - स्नापन - विधिने लगतां जे बे पद्यो १४ मी सदीनी पोथीमां अपायेल हाथनोंध परथी प्रस्तुत कर्यां छे ते वस्तु-विषय अने शैलीनी दृष्टिए मध्यकाळना कोई चैत्यवासी जतिनी रचना होवानुं प्रतीत थाय छे. उमास्वातिनी पद्यगुम्फनरीतिमां प्राच्यतानो स्पर्श छे, अने ते पूर्णतया निजस्वी छे: पछीना कर्ताओमां एमनी विशिष्ट शैलीनां दर्शन ( या अनुकरण पण ) बिलकुलेय थतां नथी. जेम "पूजा-विधि - प्रकरण " - जे स्पष्टतया बहु मोडेनी रचना छे - तेमने नामे चढ़ी गयुं तेम उपर्युक्त बे प्रकरणो पण पश्चातकालीन कर्तानी कृतिने प्राचीनतम अने प्रमाणभूत ठराववा १३ मा शतक पहेलां कोइए चढावी दीधां छे. परन्तु नवांगवृत्तिकार अभयदेवसूरिनी स्थानांगवृत्ति अंतर्गत 'वाचक मुख्य उमास्वाति' ना नामथी उध्धृत थयेलां दान विषयने लगतां सिलसिलाबंध आठ पद्यो शैलीनी दृष्टिए एमनां जणाय छे. (एकदाच एमनी विनष्ट श्रावकप्रज्ञप्ति अथवा दानप्रकरण जेवा नामनी जुदी ज
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रचनामाथी लीधा होई शके.)
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(२)
आर्य समुद्राचार्यने नामे जे पद्य उध्धृत थयेलुं छे ते पण शैली अने वस्तुनी दृष्टि मध्यकालीन छे. इस्वीसनना आरंभकाळे थई गयेला 'आर्य समुद्र' साथे एने कई लेवा - देवा नथी. ए समये 'सूरिमन्त्र' सरखां चैत्यवासी जमानाना वस्तु-विभावोनुं अस्तित्व होवानुं क्यांयथीये प्रमाण नथीः अने ए काळे मुनिओ प्रतिमा - प्रतिष्ठा करावता नहीं; इस्वीसननी पांचमी शती सुधी प्राप्त थता प्रतिमा - लेखो ए वातनी साक्षी पूरे छे. मारा मते प्रस्तुत समुद्राचार्य दशमा शतकमां थई गयेला समुद्राचार्यथी अभिन्न होवा घटे; जे समुद्राचार्ये वायट गच्छना आदिम जीवदेव सूरिना जिन - स्नात्र-विधि ( प्राय: इस्वी नवम शतक) नामक प्राकृतमां निबध्ध लघु ग्रन्थ पर इ. स. ९५०मां धोळकामां संस्कृत वृत्ति वा पंजिका रची छे ते ज आ कहेवाता 'आर्य' समुद्र जणाय छे. सम्बन्धकर्ता पद्य आ मध्यकालीन (चैत्यवासी) समुद्राचार्यनी कोइ अन्य सगोत्री रचना - प्रतिष्ठा - सम्बध्ध कोइ प्राकृत ग्रन्थमाथी लेवायेलुं लागे छे. पादलिप्त सूरिनी निर्वाणकलिका (प्राय: इस्वी ९७५) मां ते ( पाठांतर धरावता पाठ साथे) उध्धृत थयुं छे ते घटना रसप्रद छे: पण ध्यानमा राखवा जेवी बाबत ए छे के पादलिप्स सूरि 'त्रण' थयां छे. एमनां जीवनो संबंधी हकीकतो - घटनामां प्रभावकचरित (इ.स. १२७७) मां ज नहीं पण तेना पूर्वे रचाई गयेली भद्रेश्वर सूरिनी प्राकृत रचना कहावलि (प्राय: इ.स. १०००) मां पण नामसाम्यने कारणे भेळवी देवामां आवी छे. आदि पादलिप्त सूरि आर्य नागहस्ति ( प्राय: इस्वी १५०-२०० ) ना शिष्य हता. प्रतिष्ठानना सातवाहन राजा 'हाल' (के कण्ह) नी सभामां तेमनां बेसणां हतां; अने पाटलिपुत्रना विदेशी शक- मुरुण्ड नी शासकनी शिरोवेदना तेमणे दूर करेली एवी नोंध पण छठ्ठा - सातमा सैकाना भाष्य - चूर्ण्यादि साहित्यमां उपस्थित छे तेमणे सुप्रसिद्ध तरंगवईकहा अने खगोळना कालज्ञान संबंधी ग्रन्थ ज्योतिष करण्डकनी रचना करेली. तेओए सौराष्ट्र तरफ विहार कर्यो जणातो नथी. (बहु तो भृगुकच्छ सुधी गया होय). द्वितीय पादलिप्त सूरि वलभीना मैत्रक महाराज्यना आथमता युगमां थई गयेला. तेओ मंत्रसिध्ध अने धातुवाद- निष्णात, किमियागर, हता; स्पष्टतया चैत्यवासी हता. एमणे 'गाहाजुयलेण' शब्दोथी आरंभाता सुवर्णसिद्धि युक्त मनाता लघुस्तवनी रचना करेली, जे उपलब्ध छे. ओ चरित -कथित ढांक बाजुना धातुविद् या रससिध्ध नागार्जुनना गुरु-मित्र हता.
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(५६)
एमणे ढांक, गिरिनगर, अने मथुरा (ना स्तूपना दर्शनार्थे) यात्राओ करेली. शत्रुजयनी तळेटीमां इ.स. ८१७ थी पहेलां एमना नामथी 'पालित्तपुर' किंवा 'पादलिप्तपुर' (पालित्तानक, पालिताणा)नी स्थापना थयेली. विशेषमा तेमणे शत्रुजय पर जिनालयोनी स्थापना करेली, अने मोटे भागे ए पहाड पर ज सल्लेखना करी काळगति पामेला. त्रीजा पादलिप्तसूरि ते विद्याधरकुलना मंडन गणीना शिष्य हता. निर्वाणकलिका (प्रायः इस्वी ९७५) तेमनी रचना छे. (कर्णाट देशमा) 'मण्णखेड' (अत्यार- 'मळखेड' पहेलानुं 'मान्यखेटक')मा 'कृष्ण भूभुज' एटले के राष्ट्रकूट कृष्ण (तृतीय) ने जे पादलिप्त सूरि मळ्या हशे ते समयनी दृष्टिए आ वीजा पादलिप्त सूरि होवा घटे. तेओ पण शत्रुजय साथे संकळायेला होवानुं लागे छे; केमके शैलीनी दृष्टिए तेमज अंदरनी वस्तुने हिसाबे दशमां शतकमां मूकी शकाय तेवी एक अन्य रचना-पुण्डरीकप्रकीर्णक अपरनाम सारावली-प्रकीर्णक-पण तेमनी ज कृति जणाय छे, जेनो आधार लई शत्रुजयना आदिनाथना बिंबना उध्धारक जावडशाह (प्रायः इस्वी १०००१०५०)ना समयमां थयेला द्वितीय वज्रस्वामीए लघुशनुंजयकल्पनी रचना कोली; अने ए बनेने नजर सामे राखी तपागच्छीय धर्मकीति गणी (पछीथी धर्मघोष सूरि) ए शत्रुजयकल्प (आ.ई.स. १२४) रच्यो अने ए त्रणेना आधारे खरतरगच्छीय जिनप्रभसूरिए स्वरचित कल्पप्रदीप अंतर्गत "शत्रुजय गिरिकल्प"नी इ.स. १३२९ मां रचना करेली. (नामसाम्यने कारणे आ बन्ने पश्चात्कालीन कर्ताओए द्वितीय वज्रने प्राचीन वज्रस्वामी (आर्य वज्र, इस्वीसननी प्रथम शताब्दी) अने तृतीय पादलिप्त सूरिने आदि पादलिप्तसूरि (आ.ई.स. २००-२२५) मानी लीधेला.
विशेष नोंध:- अजितदेवसूरिना मोहोन्मूलनवादस्थलमा जे पादलिप्त सूरिना प्रतिष्ठाकल्पनी वात छे ते आ त्रीजा पादलिप्त सूरिनी रचना होई शके छे; अने त्यां जे हरिभद्रसूरि रचित प्रतिष्ठाकल्पनो उल्लेख छे ते आदि हरिभद्र सूरिनो होय तो पण तेमां जे प्रतिष्ठाविधि बतावी हशे ते मध्यकालीन प्रतिष्ठाग्रन्थोना कथनोनी तुलनामां
घणी सादी अने ढूंकी होवी जोईए. एमना समयमां मध्ययुगथी आरंभायेली अति - विस्तारपूर्ण जटिल अने अनेकविध प्रकारनी सामग्रीओ मांगी लेती स्नानविधिओनी रमझट बोलावी प्राचीन प्रतिमाओने अने तेमना अभिलेखोने घसीने चोपट, लीसालपट करी नाखवानी प्रवृत्तिनो हजी अभाव हतो.
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(५७) मुनिवर्य शीलचन्द्र विजयजीए वादीवेताल शान्तिसूरिनी उत्तराध्ययनवृत्ति (प्रायः इस्वी १०२५)मांथी 'वाचक' नामथी निम्नोट्टंकित पद्य प्रस्तुत करी तेने उमास्वातिरचित होवानुं सूचन कयुं छे :
परिभवसि किमिति लोकं, जरसा परिजर्जरितशरीरम्। अचिरात् त्वमपि भविष्यसि, यौवनगर्वं किमुद्वहसि ?॥
'वाचकमुख्य' ना अभिधानपूर्वक जे कंई उधृत थाय ते उमास्वातिकृत होवानो घणो संभव छे; पण वाचको तो अनेक थइ गयेलाः जेमके अश्वसेन वाचक, सिद्धसेन वाचक, हारिल वाचक, इत्यादि जेवा अने केटलाक नाम दीधा वगरना वाचकोना उध्धरणो तेमां छे, जेनी शैलीनो अने वस्तुनो उमास्वातिनी शैली अने वस्त साथे मेळ नथी. (उपर उट्टंकित पद्य इस्वीसनना १७मा सैकाना प्रथम चरणमां थई गयेला तपागच्छीय भावविजयनी उत्तराध्ययन वृत्तिमां पण उध्धृत छे, जे तेमणे शांतिसूरिनी वृत्तिमांथी लीधुं हशे.) ते पद्य अवश्य प्राचीन छे पण तेमां उमास्वातिनी पद्य-निबन्धन रीत न होतां नोखा प्रकारनी अने तेमना काळ बादनी छे. वस्तुतया तेनी शैली शान्तिसूरि ए नाम दईने (अने अन्यथा) हारिल वाचकनां जे पद्यो टांक्या छे तेने खूब ज मळती छे. त्यां एवो ज प्रशान्त मृदु-मंजुल प्रवाह वरताय छे अने एवां ज ललित-गंभीर तत्त्व तथा वैराग्यपूर्ण विषाद विलसतां देखाय छे;
यथा; तथा च हारिलवाचक: चलं राज्यैश्वर्यं धनकनकसारः परिजनो नृपाद् वाल्लभ्यं च चलममरसौख्यं च विपुलम्। (?) चलं रूपारोग्यं चलमिह चरं जीवितमिदं जनो दृष्टो यो वै जनयति सुखं सोऽपि हि चलः॥ तथा च हारिलः वातोद्भूतो दहति हुतभुग्देहमेकं नराणां मत्तो नागः कुपितभुजगश्चैकदेहं तथैव। ज्ञानं शीलं विनयविभवौदार्यविज्ञानदेहान् सर्वानर्थान् दहति वनिताऽऽमुष्मिकानैहिकांश्च ॥
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तथा चाहुः भवित्री भूतानां परिणतिमनालोच्य नियतां पुरा यद्यत्किञ्चिद्विहितमशुभं यौवनमदात्। पुनः प्रत्यासत्रे महति परलौकैकगमने तदेवैकं पुंसां व्यथयति जराजीर्णवपुषाम्॥
-उत्तराध्ययन वृत्ति एम जणाय छे के हारिल वाचक-हरिगुप्त वाचकनी भर्तृहरिना वैराग्य शतक समान आजे अप्राप्त एवी कोई अद्भुत रचना हती, तेमांथी ए सौ पद्यो लेवायां छे. उद्योतन सूरि कृत कुवलयमालाकहा (इ. स. ७७८)नी प्रशस्ति अनुसार हरिगुप्त वाचक हूणराज तोरमाणना गुरु हता. अने एक परंपरा-गाथामां हरिभद्रना अवसाननी मिति सं. ५८५ ई. स. ५२९ अपायेली छे ते हरिभद्रनी न होतां हरिगुप्त वाचकनी होवानो तर्क त्रिपुटी महाराज आदि विद्वानोनो मत छे, जे ठीक जणाय छे. ए लक्षमा लेतां प्रस्तुत अप्राप्त कृति इस्वी. ५००नी आसपासना अरसानी, अने एथी उमास्वातिनी कृतिओ पछी दोढसो एक वर्ष बादनी छे. आ टांकणे उमास्वातिना पृथक् पृथक् कृतिओना पद्यो- मूळमाथी अने उध्धृत थया होय तेवा असली पण अनुपलब्ध कृतिओमांथी अहीं तुलनार्थे रजु करूं छु :
दग्धे बीजे यथाऽत्यन्तं, प्रादुर्भवति नाङ्कुरः। कर्मबीजे तथा दग्धे, नारोहति भवाङ्कुरः॥
सभाष्य तत्त्वार्थाधिगमसूत्र क्रोधात् प्रीतिविनाशं मानाद् विनयोपघातमाप्नोति । शाठ्यात्प्रत्ययहानिः सर्वगुणविनाशनं लोभात्।। कलरिभितमधुरगान्धर्वतूर्ययोषिविभूषणरवाद्यैः। श्रोत्रावबद्धहदयो हरिण इव विनाशमुपयाति ।। स्नानाङ्गरागवतिकवर्णकधूपाधिवासपटवासैः। गन्धभ्रमितमनस्को मधुकर इव नाशमुपयाति ॥ मिष्टान्नपानमांसौदनादिमधुररसविषयगृद्धात्मा।
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गलयन्त्रपाशबद्धो मीन इव विनाशमुपयाति ॥ निर्जितमदमदनानां वाक्कायमनोविकाररहितानाम् । विनिवृत्तपराशानामिहैव मोक्षः सुविहितानाम्॥ नैवास्ति राजराजस्य तत्सुखं नैव देवराजस्य। यत्सुखमिहैव साधोर्लोकव्यापाररहितस्य ।। यद्वत्पङ्काधारमपि पङ्कजं नोपलिप्यते तेन । धर्मोपकरणधृतवपुरपि साधुरलेपकस्तद्वत्।। यद्वत्तुरगः सत्स्वप्याभरणविभूषणेष्वनभिषक्तः। तद्वदुपग्रहवानपि न संगमुपयाति निर्ग्रन्थः।।
-प्रशमरतिप्रकरण "उक्तं च वाचकमुख्यैरुमास्वातिपादैः - कृपणेऽनाथदरिद्रे व्यसनप्राप्ते च रोगशोकहते। यद् दीयते कृपार्थादनुकम्पा तद् भवेद् दानम्।। अभ्युदये व्यसने वा यत् किञ्चिद् दीयते सहायार्थम्। तत्सङ्ग्रहतोऽभिमतं मुनिभिर्दानं न मोक्षाय॥ नटनर्तमुष्टिकेभ्यो दानं सम्बन्धिबन्धुमित्रेभ्यः । यद् दीयते यशोऽथ गर्वेण तु तद् भवेद् दानम्॥ हिंसानृतचौर्योद्यतपरदारपरिग्रहप्रसक्तेभ्यः। यद् दीयते हि तेषां तज्जानीयादधर्माय॥
-स्थानांगवृत्ति उमास्वातिनी शैली ओजस्वी, उर्जस्वी, अने अर्थ-गौरवी जरूर छे पण सुललित नथी; एमनु गुम्फन वैराग्यवान सैध्धान्तिक विद्वानने शोभे तेवू जरूर छे, ___ पण तेमां कविहृदयनी अनुपस्थिति छे.
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* रेस्टोरेशन ऑफ धी ओरिजिनल लेंग्वेज ओफ धी अर्धमागधी टेक्स्ट्स
Restoration of the Original Language of Ardhamagadhi Texts एक परिचय
के. आर. चन्द्रा
'अर्धमागधी ग्रंथोनी मूळभाषानी परिस्थापना' नामक मारा आ ग्रंथमां पहेला भागमां अर्धमागधी प्राकृत भाषामां रचायेलां जैन आगमोमां जे विषयवस्तु, शैली अने भाषिक दृष्टिए प्राचीनतम गणाय छे. ते आचारांगसूत्रना प्रथम श्रुतस्कंध (प्रथम भाग ) मांथी दश शब्दो पसंद करीने तेमना जे जे पाठान्तरो ताडपत्रीय अने कागळनी हस्तप्रतोमां मळे छे. तेमनुं समालोचनात्मक अध्ययन करवामां आव्युं छे. ए दस शब्दो आ प्रमाणे छे: यथा, तथा, प्रवेदितम्, एकदा, एक:- एके, एकेषाम्, औपपादिक / औपपातिक, लोकम्, लोके, अने क्षेत्रज्ञ. दरेक शब्दना जुदा जुदा जे जे प्राकृत रूपान्तये मळे छे ते आ प्रमाणे छे. यथा: अधा, अहा, जधा, जहा; तथा: तथा, तहा; प्रवेदितमः पवेदितं, पवेतितं, पवेतियं; एकदाः एकदा, एगदा, एगता, एगया; एक:- एके: एके, एगे; एकेषाम्ः एगेषाम्, एकेसि, एगेसिं; औपपादिक / औपपातिकः उववाइए, उववाइते, उववातिए, उववादिए, उववादिते , उववातिए, ओववाइये, ओववातिए, अने ओववादि; लोकम्ः लोकं लोगं, लोय; लोकेः, लोगसि लोकंसि, लोगंसि, लोयंसि, लोकम्मि, लोगंमि, लोयंमि, अने क्षेत्रज्ञः खेत्तन्न, खेदन्न, खेतन्न, खेअन्न, खेयन्न, खेयण्ण, खेत्तण्ण, खित्तण्ण, खेदण्ण, अने खेअण्ण. आ बधां पाकृत रूपान्तरोने आधारे आपणे स्पष्ट समजी शकी छीए के दरेक शब्दनां प्राकृत भाषाओमां जेटला विविध रूपो ध्वनिपरिवर्तनना नियमना आधारे बनी शके लगभग तेटला रूपो अर्धमागधी साहित्यनां प्राचीनमां प्राचीन अंशमां मळी आवे छे. भ. महावीरे जे मूळ उपदेशो आपेला तेनो संग्रह 'आचारांग 'मां छे. एटले के आ ग्रंथमां भाषानुं स्वरूप जूनामां जूनुं होवुं जोईए पण आपणे जोई शकीए के उपर बतावेल शब्दोनां बे, त्रण, चार, छ ज नही पण अग्यार अग्यार प्राकृत रूपो मळे छे. तो शुं आ बध रूपो एक ज काळमां एक ज स्थळे
* प्रकाशक : जैन विद्याविकास फंड, १९९४
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प्रचलित अथवा बीजी रीते कहीए तो भ. महावीरनां उपदेशोने शब्दबन्ध तेमना गणधरोए आवा जातजातना प्रयोगो एक साथे एक ज ग्रंथमां कर्या हशे ?
आधुनिक भाषाशास्त्रना औतिहासिक अने तुलनात्मक अध्यनना आधारे पुरवारय करी शकाय के मध्यम भारतीय आर्य भाषा भूमिकाना विविध स्तरो अने क्षेत्रोमां प्रचलित आ विविध रूपो छे. जैन धर्मनो प्रचार पूर्व भारतमांथी उत्तरभारत (मथुरा) अने पछी पश्चिम (गुजरात राजस्थान)मां जेम जेम थतो गयो तेम तेम लोकभाषानो प्रभाव गुरु-शिष्य परंपराए मौखिक रूपे जळवायेला आगमशास्र उपर वधतो गयो अने छेक पांचमी सदीनी महाराष्ट्री प्राकृतभाषानो रंग ए प्राचीन प्राकृतने अंतिमवाचना-प्रमुख देवर्धिगणिना काळ सुधी लागतो गयो. परिणामे आजे जैन अर्धमागधी आगम ग्रंथोमां महाराष्ट्री प्राकृतनो वधारे प्रभाव जोवा मळे छे. एटले ज तो आगमप्रभाकर मुनि श्री पुण्यविजयजीने पण कहेवू पड्युं के आगमोनी भाषा खीचडी थई गई छे. अने जैन आगमोना सुज्ञात अध्येता पं. श्री बेचरभाईनी दृष्टिए पण आगमोमां अत्यारे भाषानुं जे स्वरूप मळे छे मूळ स्वरूप नथी. काळक्रम तेमज स्थाळांतर आ बनेना कारणे लहियाओ अने उपदेशकोनी उपर ते वखतनी चालु बोलचालनी भाषामां घेरी असर पडेली जणाय छे. छतां हस्तप्रतोमा जळवायेला केटलाक पाठो उपरथी कोईपण भाषाविदने जणाई आवशे के कयुं रूप प्राचीन छे अने क्युं रूप पछीना काळनुं छे.
अत्यार सुधी आगमोनुं जे सम्पादन थयुं छे. तेमां (१) जे जे पाठ पाचीन ताडपत्रीय प्रतोमां मळतो होय अने (२) जे अधिक प्रतोमां मळतो होय अने (३) जे टीकाकार-सम्मत होय ते पाठ लेवानो आग्रह रह्यो छे. पण एमां भाषिक दृष्टिनो बिलकुल अभाव जणाय छे. आ ग्रंथमां में प्रस्तुत करेली सामग्री परथी जणाई आवशे. के कागळनी 'जे' संज्ञक प्रतमां प्राचीन पाठ मळे छे. ज्यारे 'सं' संज्ञक प्राचीनतम ताडपत्रनी प्रतिमां अनेक स्थले अर्वाचीन पाठो मळे छे. कोई पण प्रतमां (ताडपत्र के कागळनी) एक ज शब्दनां एक सरखा रूप मळतां ज नथी तेथी जणाई आवे छे के हस्तप्रतोनी नकलो करती वखते स्वच्छंदता प्रवर्ती छे अने मूळ भाषानां साचा स्वरूपनो पछीना लहियाओने ख्याल होय पण क्याथी ? अर्धमागधी भाषानां मौलिक लक्षणो शुं छे ए विषेनो कोई व्याकरण ग्रंथ ज न मळतो होय अथवा तो कोई पण जग्याए एना विषेनी विशद चर्चा ज न थयी होय तो संपादको पण शुं करी शके, .
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शेनो आधार लईने तेओ संपादन करे ? अद्यपर्यन्त जेटला संस्करणो आगम ग्रंथोना प्रकाशित थया छे ते बधामां पाठोथी एकरूपता जोवा मळती नथी.
आ प्रकारनी विचारणा अने तपास उपरथी एम कहेवानुं थाय छे के दरेक आगम ग्रंथनी जेटली हस्तप्रतो मळती होय तेमांथी बधा ज पाठान्तरो नोंधवा जोईए अने तेना आधारे भाषानां प्राचीन स्वरूप साथे जे जे पाठो मेळ खाता होय ते ते पाठोने स्वीकारीने जैन आगमसाहित्यनुं फरीथी संपादन करवुं जोईए. आवो प्रयास करवो अत्यंत आवश्यक छे.
मारा अध्ययन अनुसार जे दश शब्दोनी मे ग्रंथमां चर्चा करी छे तेमनुं प्राचीन स्वरूप नीचे प्रमाणे होवानुं कही शकाय छे :
१. यथाः अधा, २ तथा: तधा, ३. प्रवेदितम्: पवेदितं ४. एकदा एकदा ५ एक:, एके - एके ६. एकेषाम् ः एकेसि ७. औपपादिकः ओपपादिय, औपपातिक ओपपातिय, ८. लोकम्: लोकं. ९. लोके: लोकस्सि. १०. क्षेत्रज्ञ: खेतन्न.
ग्रंथना बीजा भागमां आचारांग, सूत्रकृतांग, ऋषिभाषितानि, उतराध्ययन, दसवैकालिक सूत्र अने आचा, सूत्रकृ., उत्तरा नी संस्कृत वृतिओमांथी केटलाक शब्दो म. जै. वि.ना संस्करणोमांथी तेमना पाठान्तरो साथे नोंधावामां आव्या छे जेओ विषे पण आवुंज समालोचनात्मक अध्ययन करी शकाय .
आ चर्चानो निष्कर्ष ए छे के आग्रंथोनी हस्तप्रतोमां मळतां बधां प्राचीनगम पाठांतरोनुं संकलन करीने जैन आगमोनुं भाषिक दृष्टिए फरीथी संपादन करवुं ए एक अत्यंत आवश्यक कार्य छे.
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१२. ढूंक नोंध १. वाचक उमास्वाति( ? )नुं वधु एक पद्य :
अगाउ (अनुसन्धान ३-४मां) वा. उमास्वातिजीनां अज्ञात पद्यो विशे नोंध आपी छे, तेना अनुसंधानमां ज एमनुं एक वधु पद्य अत्रे नोंधq प्राप्त छे. आ पद्य पण पूर्ववर्णित पद्योनी जेम ज श्री उमास्वातिजीनी प्राप्त-प्रसिद्ध एवी कोई कृतिमां उपलब्ध थतुं नथी. आध्यात्मिक अथवा अभ्यन्तर शौचनो महिमा करतुं नीचे आपेखें आ पद्य, 'उत्तराध्ययन सूत्र 'ना १२मां 'हरिएसिज्ज' नामे अध्ययननी ३९मी गाथानी पाइय टीका (शान्त्याचार्यकृत)मां तथा उपाध्याय भावविजय कृत वृत्तिमां सन्दर्भित छे: १. तथा च वाचक:
शौचमाध्यात्मिकं त्यक्त्वा भावशुद्ध्यात्मकं शुभम्।
जलादिशौचं यत्रेष्टं, मूढविस्मापकं हि तद्॥ (पाइयटीका) २. आह च वाचकमुख्यः
शौचमाध्यात्मिकं त्यक्त्वा० ॥ (भावविजयकृत वृत्ति) २. शुं आ गप्पुं गणाय ?
विचारवलोणुं परिवार (वल्लभविद्यानगर) तरफथी श्री अशोक शर्मा- अनूदित, आल्बर्ट आइन्स्टाइनना चिन्तनना लघु संग्रहरूप पुस्तिका, नामे 'ज्योतिर्गमय', ताजेतरमा प्रगट थई छे. आना 'प्रकाशकीय'मां श्री महेन्द्र चोटलियाए एक घटना टांकी छे; ते नीचे प्रमाणे छे :
'आइन्स्टाईन पोतानी प्रयोगशाळामांथी बहार नीकळी रह्या हता. एकाएक क्यांकथी एक पत्रकार आवी चड्यो. लागलुं ज पूछ्युं, "प्रोफेसर आइन्स्टाईन, आजे सवारे नास्तामा तमे शुं लीधेनुं ?" "कोफी अने टोस्ट....." आटला उत्तरने अटकावी देतां पत्रकारे का , "बस, थेन्कयु," अने चालती पकडी. पांच वर्ष बाद आइन्स्टाईन प्रयोगशाळामांथी नीकळी रह्या हता त्यारे पेलो पत्रकार फरी आवी चड्यो, अने पूछ्युं, "शानी साथे ?" "बे इंडां साथे", आइन्स्टाईने सहजताथी उत्तर आप्यो. "वन्डर फुल !" पत्रकारे उद्गार काढ्यो, अने जतो रह्यो.
में आ प्रसंग सांभळ्यो त्यारे पहेलीवार आइन्स्टाईननुं नाम सांभळेलु, अने बोली जवायेखें, "वन्डरफुल !" .
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( ज्योतिर्गमय, विचारवलोणुं - १९९५ पृ.३)
आ वांचतांवार ज सांभर्या प्रसिद्ध जैनाचार्य मल्लवादी गणि. थोडाक वखत अगाऊ प्रकाशित ग्रन्थ 'प्रबन्धचतुष्टय (सं. रमणीक शाह, १९९४) मां आ. मल्लवादीप्रबन्धमां, संघ तथा 'मुनि मल्ल' अदृश्य थयेला 'नयचक्र' ग्रन्थने पाछो प्राप्त करवा काजे सरस्वती देवीनी आराधना करे छे ते प्रसंगमां सरस्वती अने मल्ल वच्चे थयेलो संवाद आ प्रमाणे नोंधायो छे :
आराहेइ य संघो सुयदेवि पूयणाइणा निच्चं । दिन्नुवओगा मल्लं रयणीए सा इमं भणइ ॥ ३५५ 'के मिट्ठा ?' तेणुत्तं 'वल्ला' पुण भणइ देवया एवं । छहि मासेहिं गएहिं 'केणं' ती 'घय-गुलेणु 'त्तं ॥ ३५६
(प्र.च. पृ ३४)
अर्थात्, सरस्वती देवीए रात्रे मल्लने पूछ्युंः 'शुं मीठं ?', 'वाल' छ महिना पछी देवीए पुन: पूछयुं : 'शानी साथे ?' 'घी - गोळनी साथे' - मल्ले कह्युं, अने देवी
प्रसन्न.
मल्लवादी क्षमाश्रमण विक्रमना चोथा पांचमा शतकमां थयेला जैन तार्किक साधु छे. आइन्स्टाईन वीसमा सैकाना यहूदी विज्ञानी छे. प्रतिभा, सैका ओना समयगाळाना गेपने अतिक्रमीने के पूरी दईने क्यारे क्यां केवा समान रूपमा प्रकट थाय छे तेनुं आ एक ज्वलन्त दृष्टांत मानी शकाय .
सवाल एटलो ज के जैन प्रबन्धोमां सचवाएला आवा प्रसंगोने २०-२१ मी सदीनी विद्वानो, पंडितो, इतिहासकारो, तेमज उदारमतवादीओ अत्यार सुधी मल्लवादीना प्रसंगने दन्तकथा, चमत्कारकथा तेमज भाविकोनी आस्थाने आकर्षवा माटेनी एक कल्पित, पाछळना प्रवन्धकारोए उमेरेली घटना स्वरूपे वर्णवे छे तथा स्वीकारे छे.
आवा मित्रोनी दृष्टिमां प्रो. आइन्स्टाईननी उपर्युक्त घटना पण एक, एमनी बौद्धिक प्रतिभाने उपसाववा माटे तेमना भक्तगणे उपजावी काढेली, कल्पित दन्तकथा ज समजवी न जोईए ? के जूनुं तेटलुं गपबाजी अने विज्ञान वैज्ञानिकनुं तेटलं ब्रह्मवचन ? के पछी एमना मते बधां - बन्ने गप्पां ज ?
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३. 'स्थूर' विषे बे वधु उल्लेखो :
'स्थूल' अर्थवाचक 'स्थूर' शब्दना साहित्यगत प्रयोगो दुर्लभ होवानु अगाउ (अनुसंधान-३) जणावेलुं, अवगाहन वधतां तेना थएला वधु ने वधु प्रयोगो जडी आव्या छे, ते आ प्रमाणे :
१. आ. हरिभद्रसूरि (विक्रमनो आठमो शतक) कृत 'पंचसूत्रक-सवृत्ति'मां वृत्तिमां आवो पाठ छे : स्थूरप्राणातिपातविरमणं, स्थूरमृषावादविरमणं, स्थूरादत्तादानविरमणं, स्थूरमैथुनविरमणं, स्थूरपरिग्रहविरमणम्॥ __ (सं. जंबूविजयजी, दिल्ही, ई. १९८६, पृ. २६). .
२. आ. मलयगिरि (११-१२ मो शतक) कृत 'सप्ततिका-वृत्ति'मां पाठ छे : ताश्च किट्टयः परमार्थतोऽनन्ता अपि स्थूरजातिभेदापेक्षया द्वादश कल्प्यन्ते ।।
(सं. मुनि चतुरविजय, भावनगर, सं १९९६, पृ. २६०) ४. 'नखच्छोटिका', 'ढौक', 'सुखासिका' / 'दुःखासिका', 'ललते'
१. नवमा शतकना जैनाचार्य सिद्धर्षिए रचेल 'उपमितिभवप्रपंचा कथा' मां 'चपटी वगाडवी' ए अर्थमां आवो प्रयोग को छेः 'ददाति नखस्फोटिकां' ( उप. प्र. कथा, सं. चन्द्रशेखरविजय, सं. २०२४ अमदाबाद)
जो के पाछळथी आ ज प्रयोग अन्यत्र आ रीते थयो जोवा मळे छ : "नखच्छोटिकामात्रेण " -आ. मलयगिरि 'सप्ततिकावृत्ति', भावनगर, सं. १९९६, १४६ तथा आ. देवेन्द्रसूरि , कर्मविपाक टीका, भावनगर, सं १९९०, २८ बन्नेना संपा. मुनि चतुरविजयजी.
२. 'ढौकङ् गतौ' ( सि. ६२७, गण १) धातुनो प्रयोग जैन ग्रन्थकारोए ज वारंवार को जणाय छे. 'ढोवू-' 'ढोकवू' एटले 'धरवू'; 'ढूंकवू' एटले 'पासे जवु', 'फरक्वं' इत्यादि अर्थोमां प्रयोजायेलो आ धातु अन्यान्य ग्रंन्थोमां आम प्रयोजायेलो जोवा मळे छे :
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१. न ददाति परमसुहृदोऽपि स्वगृहे ढौकं ।
२. तच्च सद्धर्माचार्यानुकम्पयैव जीवं प्रत्युपढौकयति । ( ' उपमिति. ' पत्र २३-३४)
३. अनशनं तु ममास्त्विति बुद्धिना, रूचिरभाजनसंचितभोजनम् । प्रतिदिनं विधिना जिनमन्दिरे, शुभमते ! बत ढौकय चेतसा ।।
( चोसठ प्रकारी पूजा ' मां नैवेद्यपूजा, पं. वीरविजय कृत, १९ मो शतक)
३. सुखासिका, दुःखासिका आ प्रयोग पण प्रायः जैन रचनाओमां विशेष जोवा मळे छे. व्याकरणना नियमोथी जो के आ रूपो सिद्ध करी शकाय तेवा छे. सुखासिका एटले सुखमयता सुखानुभव. ए ज रीते दुःखासिका एटले दुःखमयता के दुःखग्रस्तता, दा.त.
सुखासिका क्षणात्तस्या, साऽनन्तगुणतां गता ।
( उपमिति. पत्र ९ )
प्राणैर्वा वियुज्यते दुःखासिकातिरेकेणेति ।
( उपमिति. पत्र २४ )
४. 'ललिण् ईप्सायाम् (सि. १८४१, १० मो गण, आत्मने० ) धातुनुं रूप थाय छे 'लालयते'. ते गणपाठविशेषमां नथी तेथी लालयते ना विकल्पे 'ललते' थाय तेवी शक्यता पण नथी. छतां 'उपमिति. 'मां तेनो छूटथी प्रयोग जोवा मळे छे लीलया ललमानो महानरेन्द्रो दर्शितः ॥
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लीलया ललते नापर:, भवगर्त्तमध्यपतित जन्तु लीलाललनस्य परमार्थतो विडम्बनारूपत्वात् ।
( उपमिति. पत्र ३१ )
अन्य कोई 'लल्' धातु धातुपाठ (सि.) मां उपलब्ध नथी, तेथी उपरोक्त 'ललिण्' नां ज रूपो कर्ताए प्रयोज्यां छे तेम मानवुं रहे. आवा प्रयोग कदाच विरल छे. - शीलचन्द्रविजय
५. 'पांडवचरित्र - बालावबोध 'ना थोडाक शब्दप्रयोगो विशे 'अनुसंधान' -८ मां मेरुरल उपाध्याय -शिष्य कृत 'पांडवचरित्रबालावबोध 'नो
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थोडो अंश छपायो छे. मध्याकालीन गुजराती भाषानी दृष्टिए आ कृति समृद्ध छे ज, वार्तारस अने साहित्यतत्त्व पण एमां सारी पेठे छे.
कृतिमा एक प्रयोगे मारुं ध्यान खेंच्यु. कृतिनी कडी २७, ६१, ८६ मां नकारना अर्थमां 'मन' शब्द वपरायो छे : 'ते वर मई मन देसि', 'तु आहेडइ मन जाएसि', 'मृगला मन हाणेसि'. नकारवाचक म अने न जाणीतां छे, अहीं ए बेनो संयुक्त प्रयोग थयो होय तो एक विशिष्ट रूढप्रयोग तरीके तेनी नोंध लेवावी जोईए. आवो प्रयोग आ समयनी अन्य कृतिओमां मळे छे के केम ते तपासवं रह्यं. न मळतो होय तो अहीं छपायेलो पाठ वाचननी के मुद्रणनी भूल होई शके. ए ठेकाणे 'मम' एवो द्विरुक्त मकार होय अथवा 'मत' एवो हिंदी असरवाळो शब्द होय एवी संभावना पण छे. जो के कृतिनुं समग्र स्वरूप जोतां ते एवी असरथी मुक्त जणाय छे.
बीजो एक ध्यानपात्र शब्द छे. चात्र'. ए बे ठेकाणे वपरायो छे. 'कीधी राई वचन मझ चात्र' (कडी ६२) अने 'माहरां वचन म करिसिउ चात्र' (कडी ९३) अर्थ स्पष्ट थाय छे. आजनी गुजरातीमा 'चातरतुं' क्रियापद वपराय छे. तेनुं मूळ आ 'चात्र' शब्दमां जोई शकाय छे. विशेषता ए छे के अहीं ते स्त्रीलिंग नाम तरीके वपरायो छे.'राजाए मारुं वचन चात्र कर्यु', 'चात्र न करजो'.
पृष्ठ ७७, उपरथी त्रीजी पंक्तिमा 'कित्तावा (?) सुरपुरि गया' एम छे. अहीं वाचनभूलना कारणे प्रश्नार्थ उभो थयो होवानी शंका जाय छे. 'कित्ता वासर पुरि गया' एटले के 'केटलाक दिवस नगरमां वीत्या' एवो पाठ, संदर्भ जोतां कल्पी शकाय छे.
-मुनि भुवनचन्द्र हमणां ज मारा ध्यानमां आव्यु के अपभ्रंशमां नकारवाचक 'मण' छे. एज जूनी गुजरातीमां ऊतरी आव्यो हशे. आथी एक तरफ अपभ्रंश साथे गुजरातीनो सीधो संबंध स्थापित थाय छे. बीजी तरफ प्रस्तुत बालावबोधनी प्राचीनता घणी वधारे सिद्ध थाय छे. (१५ मी सदीना अंतभागमा करतां घणो वहेलो होई शके.)
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६. केटलाक कथाघटको १. परपुरुषनो संग निवारवा स्त्रीने पेटमां संताडी राखवी
आपणी कथापरंपरामा स्त्रीनी कुशीलता अने सुशीलताने लगती सेंकडो कथाओ मळे छे.
उदयकलशकृत 'शीलावती-चोपाई 'मां (रचनासमय १५६२) एक प्रसंग आ प्रमाणे छ :
एक राते नगरचर्चाए नीकळेला विक्रमे एक एकदंडिया महेलनी समीपमां रहेला देवालयमां एक तरुण योगीने ध्यानस्थ बेठेलो जोयो. अंधारुं गाढ थतां योगीए पोतानी पासे रहेली अंधारीमाथी मंत्रबळे योगिनीने प्रगट करी. बंनेए भोगविलास को. ते पछी योगी निद्राधीन थतां पेली योगिनीए पोतानी पासेनी झोळीमांथी मंत्रबळे एक पुरुषने प्रगट कर्यो, अने तेनी साथे भोगविलास कों. योगी जागे ते पहेलां तेणे ते पुरुषने पाछो पोतानी झोळीमां छुपावी दीधो. आ स्त्रीचरित्र जोईने राजानो पोतानी राणीना दुश्चरित्रनो आघात हळवो थयो. योगी पासेथी तेनी विद्या शीखवा विक्रमे विचार्यु. वळते दिवसे तेने तेणे पोताने त्यां भोजन माटे निमंत्र्यो.
विक्रमे राणीने पांच जणनी रसोई कराववानुं अने जमवा माटे पांच आसन मूक्वा कडं. समय थतां, पहेला आसन पर विक्रम बेठो. बीजा आसन पर योगीने बेसाड्यो. पछी विक्रमे योगीने अंधारीमांथी 'योगिनी' प्रगट करवा जणाव्यु. चमकेला योगीए योगिनीने प्रगट करी. विक्रमे एने त्रीजा आसन पर बेसाडी. पछी योगिनीने एनी झोळीमांना पुरुषने प्रगट करवा कडं. आथी चमकी गयेली योगीनीए ते प्रमाणे कर्यु. विक्रमे ए पुरुषने चोथा आसन पर बसाड्यो. पछी विक्रमे राणीने एना प्रेमीने बोलावीने पांचमा आसन पर बेसाडवा जणाव्यु. राणीने ध्रासको पड्यो पण कोई छूटको न होवाथी ते गगनधूलिने बोलावी लावी अने तेने पांचमा आसन पर बेसाड्यो. भोजन कराव्या बाद विक्रमे योगी-योगिनीने वस्त्रादि आपी विदाय करू.
हरिषेणकृत अपभ्रंश काव्य 'धम्मपरिकख'मां (रचनासमय ९८८) हिन्दु पौराणिक कथाओनी अने देवोना चरित्रनी टीका-निंदा करती कथाओ अने प्रसंगोमां एक नीचे प्रमाणे छ :
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मंडपकौशिक ऋषिए तीर्थयात्राए जतां पोतानी पुत्री छायाने यमदेवनी पासे मूकी. कामातुर यमदेवे रूपाळी छायाने पोतानी पत्नी बनावी दीधी अने बीजं कोई तेने उठावी न जाय ते माटे तेने पोताना पेटमा राखी. पवनदेवे अग्निदेवने आ वात जणावी. यमदेव हमेशां नित्यकर्म करवा जता त्यारे एक प्रहर माटे छायाने पेटमाथी बहार काढता. यमदेव गंगास्नान करवा गया त्यारे अग्निदेवे आवीने छायानो संग को. यमदेवना पाछा फरवानो समय थवा आव्यो होवा छतां कामातुर अग्निदेव जई शक्या नहीं. एटले छायाए अग्निदेवने पोताना पेटमां छुपावी दीधा. पछी यमदेवे पाछा आवीने छायाने पोताना पेटमां मूकी दीधी.
____ अग्निदेवनी गेरहाजरीमां धरती अने स्वर्गमां अंधेरै फेलाई गयु. इंद्रे पवनदेवने अग्निदेवनी शोध करवा आदेश दीधो. पछी पवनदेवे आवीने कडं में बधे शोधखोळ करी पण अग्निदेवनो पत्तो लाग्यो नथी. मात्र एक स्थान बाकी छे . त्यां हुं तपास करुं छु. पछी पवनदेवे सौ देवोने भोजन माटे नोतर्या. बीजा बधाने एकएक आसन दीधुं, पण यमदेवने त्रण आसन दीधां अने तेमनी पासे त्रण भोजनथाळ मूक्यां. यमदेवे आनो खुलासो पूछ्यो एटले पवनदेवे का, पहेलां तमे पेटमाथी छायाने बहार काढो. छाया बहार नीकळी एटले पवनदेवे तेने अग्निदेवने पेटमाथी बहार काढवा कह्यु अग्निदेव बहार निकळ्या एटले क्रोधावेशमां यमदेव तेनी पाछळ दोड्या, अग्निदेव दोडीने शिला, तरु, तृण अने धरतीमां छुपाई गया.
पौराणिक कथानुं आ रूपांतर उपर्युक्त 'शीलवती'मांना प्रसंगना कोई पूर्व स्वरूप उपरथी घडी काढ्युं लागे छे.
२. बोलायेलां वचनो अकस्मात् सांभळी अळतो ज अर्थ लेता हत्याराथी उगारो
मलधारी राजशेखरसूरि कृत 'विनोदथा-संग्रह'नी ७५मी कथा ( पत्र ६३ख६४(क)नो सार नीचे प्रमाण छ :
पुण्यपुरनो चंद्र शेठ धर्मिष्ठ, उदार, लोकप्रिय अने राजमान्य हतो. ए नगरमां एक वार 'कडुओ' अने 'बडुओ' ए बे राक्षसभाईओए अने तेमनी राक्षसी बहेन 'सोही' ए आवीने उपद्रव को. लोकोमा रोगचाळो फेलावीने तेओ तेमनुं शरीर चूसी लेता हता. राजए जाहेर कयु, जो कोई आ उपद्रवने दूर करशे तो मारो खजानो खुल्लो
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(७०) मूकी दईश'. राजसभामां बेठेल चंद्र शेठ ए सांभळीने पछी पोताने घरे आव्यो. आगले दिवसे शेठे बाळकोने माटे तलसांकळी बनाववा तल लावी राख्या हता. बाळको तेना बूकडा भरतां घरमां भमतां हतां. ते वखते पेला राक्षसो अने तेमनी बहेन शेठना घर पासे आवी अंदर पेसवानो लाग जोतां दरवाजा आगळ अदृश्य रूपे ऊभा रह्यां. शेठ घर बच्चेना ओरडामा हता, त्यारे एक बाळके आवीने का, 'आ कडवा ने कांकरावाळा तल अमे केम खाईए ?' एटले खीजाईने शेठ बोल्या, 'कडुआ-बडुआ सोही खाहि' (एटले 'कडवा-बडवा जेवा छे तेवा खाओ'). दरवाजा पासे रहेला कडुआ,बडुआ अने सोहीए बाळकना धीमा शब्दो न सांभळ्या , पण शेठ चीडाईने मोटे अवाजे जे बोल्या ते सांभळ्यु. तेमने थयुं 'अहो ! अमे अदृश्य होवा छतां शेठने अमारा अहीं होवानी अने नामोनी पण खबर पडी गई ! तेमनी पासे मंत्रशक्ति लागे छे. आपणने खाई जवान कहे छे'. डरीने राक्षसो प्रकट थई आवीने शेठने पगे पड्या, अने तेमना नामकाम जाहेर करवा वीनव्या. शेठे एक वार राजानी समक्ष रजू करी पछी तेमने मुक्त करवानुं अभयदान आप्यु.
___कथानो आधारभूत कथाघटक विवध रूपांतरे भारतीय कथापरंपरामां अने विदेशनी लोककथाओमां मळे छे. जेम के जैन परंपरानी यव राजर्षिनी कथामां, 'धम्ममद'-अट्ठकथामांनी एक कथामां, गुजरात-राजस्थाननी टीडा जोशीनी कथामां, गुजराती 'गुरुमंतर' के 'घसो लालिया घसो' अने 'खडबड खडबड खोदत है' ए लोककथाओमां वगेरे वगेरे. विगते चर्चा माटे जुओ मारो लेख The Tale of the Royal Monk Yava (Indological Studies, पृ. ३४२-३४३.)
अमुक संदर्भमां बोलायेलां वचनो योगानुयोग बीजाओने काने पडतां तेओ जुदा ज अर्थमां ( पोताने लागु पडतां) समजी बेसे छे, अने परिणामे हत्यारो पोते पकडाई गयो एम समजीने शरणे आवे छे, जेथी वक्ता बची जाय छे-एवा स्वरूपनो आ घटक छे. आर्ने-टोम्प्सननी कथाप्रकृतिनी सूचिमा एनो क्रमांक १६४१ छे. (The Doctor Know-all-सर्वज्ञ डोक्टर). टोम्प्सने तेमना पुस्तक The Folktaleमां युरोप अने एशियामां तेनां चारसोथी वधु रूपांतरो मळतां होवानुं नोंध्युं छे. (पृ. १४४१४५).
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३. चार मूर्खाओ
रत्रचूड-रास' (कर्ता रत्नसूरि -शिष्य, रचनाकाळ इ.स. १४५२. माएं संपादन, एल.डी.सिरीझ क्रमांक ६३, १९७७)मा आवती दृष्टांतरूप आडकथाओंमां चार मूर्खानी कथा (पृ. ३५-३९, कडी २५९-२९०, भूमिका, पृ. १८) उपर में 'मध्यकालीन गुजराती कथाकोश'मां एक नोंध आपी छे (पृ. ३६८-३६९) अने तेनो आधार विनिट्झनो भारतीय साहित्यनो इतिहास (ग्रंथ २, पृ ३६४-३६५) होवानो त्यां निर्देश को छे. विटि ट्झे ए माहिती माटे मिरोनोवे अमितगतिकृत 'धर्मपरीक्षा' उपर १९०३मां प्रकाशित करेल संशोधनग्रंथमाथी लीधी हती. अमितगतिनी 'धर्मपरीक्षा'नो समय ई. स. १०१४ छे, अने तेनी पुरोगामी कृति छे हरिषेणकृत 'धम्मपरिक्ख' ते अपभ्रंश भाषामां छे अने तेनो समय छे इ. स. ९८८. तेमां पण उपर्युक्त चार मूर्खकथाओ आपेली छे. (संधि ३, कडवक १२-१९)* हरिषेणनी 'धम्मरिक्ख' भागचंद्र जैन. माधव रणदिवे वडे संपादित कराई १९९०मां प्रकाशित थई छे. आ पहेला आ.ने. उपाध्येए एक लेख द्वारा तेनो परिचय आप्यो हतो (१९४१नी अखिल भारतीय प्राच्यविद्या परिषदमां रजू थयेलो तेमनो लेख भांडाकर इन्स्टिट्युटना जर्नलमां प्रकाशित थयो हतो). भागचंद्र जैने पुस्तकनी भूमिकामां 'धर्मपरीक्षा ' नामक कृतिओनी परंपरा विशे विगते माहिती आपी छे (पृ. २-५) तेमां १७ रचनाओ गणावी
'धर्मरत्नकरंडक' (रचना समय १११६)मा जे ताराचंद्रनी कथा आवे छे ते रत्नचूडनी कथाने घणी मळती आवे छे. तेमां यमघंय गणिकाने बदले त्रिलोचन नामनो प्रज्ञाचक्षु ब्राह्मण बधा उकेल आपे छे. तेमां 'रत्नचूडरास'नी पेटाकथाओ नथी.
४. गामडाह्यानो अज्ञानविलास : होदड जोषी
शुभशीलगणिकृत 'पंचशती-प्रबंध(के प्रबोध)-संबंध' ए कथाग्रंथमां (रचनासमय ई. स. १४६५) १५३मी कथा (पृ. ९७-९८ )नो अनुवाद नीचे प्रमाणे छे :
__ *तेमां आ चार मूर्खानी कथा दस मूर्खकथाओमां छेल्ली छे. बाकीनी नव कथा ते रक्तमूढ, दृष्टिमूढ, मनोमूढ, व्युद्ग्राहिमूढ, पित्तदूषित मूढ, आम्रमूढ, क्षीरमूढ, अगस्मूढ अने चंदनमूढनी कथाओ छे.
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(७२)
__ मारवाडमा होदड जोषीने सौ मूरत पूछे अने एनी पासे जोश जोवरावे. हवे एक खेडूते खेतरमा उंचाणवाळा भागमां वाल वाव्या अने मांडवा बांधी ते पर वेला चडाव्या. राते ऊंट आवीने वालोळना वेला खाई जतां. खेडूते होदड जोशीने पूछ्युं, मांडवानी उपर चडेला वेला कोण खाई जाय छे ? डहापणना भंडार होदडे आंखो बंध करी ध्यान धरीने खुलासो कर्यो : खांडणिया उपर चडीने ससलुं तमारा वेला खाई जाय छे. माटे खेतर पासे तेम ज सीममां राते जईने पडकार करो के जे ससला ऊखळा पर चडीने अमारा खेतरतुं वावेतर खावा राते आवशे तेमने जीवता नहीं मूकीए.
गामलोको होदडना ज्ञानथी राजीराजी थई गया. वाड पासे पडकार करता खेडूत चोकी करवा लाग्या. वेला खवाता बंध थया.
'ओक्खलि पग चडाविया वल्लखद्धद् ससएण। किमु थासि मरु बप्पडी, होदडएण मुखेण।
(होदड जोशीए जोश जोईने कह्यु, 'ऊखळा पर पगे चडीने ससलाए वाल खाधा छे.' आ होदड मरी जशे त्यारे बापडी मारवाडनु शुं थशे ? )
आ वांचतां आपणी एक जाणीती लोककथा याद आवशे. देडका नीकळ्यो ते जोईने मूरख गामलोकोए 'आ कयुं प्राणी छे ?' ते गामना डाह्या डोसाने पूछ्युं. डोसाए आंख पर हाथथी छाजली करी नीचे वळीने जोतां कडं, 'नाखोने चपटी दाणा, चणे तो चकलुं नहीं तो मोर'. आ बन्ने कथाओ थोडाक विगतेफेरे हिन्दीभाषी प्रदेशमा लोककथा तरीके जाणीती छे. पहेली- मर्मनिर्देशक पद्य छ :
"एक जाणे लाल भुजक्कड, और न जाने कोई, पैर पे पैयां चक्की बांध के, हिरन कुदा होइ.' बीजीनी मार्मिक उक्ति छे : 'दाने डालो, चुग लेगा सो तोता, न चुग ले सो तोती'.
५. अक्कलना ओथमीर
___ मलधारी राजशेखरसूरि कृत 'विनोदकथा-संग्रह' (रचनासमय ईसवी चौदमी शताब्दी)नी ७९मी कथा(पृ. ६८ थी ६९)नो अनुवाद नीचे प्रमाणे छे :
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(७३) कोई एक मठमां त्रण तापसो आव्या अने लांबो समय रह्या. एक वार एक तापस राते ऊठ्यो त्यारे तेणे ऊंचे जोयुं तो आकाश घनघोर बनेलुं हतुं, अने अंदर वीजळीना झबकारा थता हता. तेणे पोताना बंने साथीओने उठाडीने आकाश देखाडतां कडं, 'अरे ! जुओ तो ! स्वर्गमां आग लागी लागे छे. एटले ज आ धुमाडो अने भडका देखाय छे.' एटले बीजो बोल्यो, 'ना, एवं नथी, आ तो ठंडीथी थीजी गयेलो सूरज काळी कंथा आमतेम हलावतो जोई रह्यो छे के हजी पण सवार थयुं छे के नथी थयुं ?' एटले त्रीजो बोल्यो, 'नहीं नहीं, मने तो एम लागे छे के स्वर्गना देवो दैत्यना उत्पातथी भारे दुःखी छे अने तेथी इंद्र होमाग्नि प्रगटावीने शांतिकर्म करी रह्या छे.' पछी कोईकने पूछीने तेमणे जाण्युं के ए तो काळां वादळ छे अने अंदरथी वीजळी झबके छ !
६. अज्ञान ढांक्युं न रहे
मलधारी राजशेखरसूरिकृत 'विनोदकथा-संग्रह'नी ७६मी कथा (पृ. ६४ क६५ ख)नो अनुवाद नीचे प्रमाणे छे :
कपिलवर्धन नगरमा रहेतो मलयकेतु तद्दन अभण अने बोलवामां छीछरो हतो. ते बाजुना वेलापुरमा परण्यो हतो. एक वार ते पत्नीने लई आववा सासरे गयो. त्यां तेनो स्नान विलेपन भोजन वगेरे वडे सत्कार करायो. तेने पांच साळा हता, जे संगीतना जाणकार हता. तेमनी बहेन तो तेमनाथी पण विशेष संगीतनिपुण हती. बे दिवस पछी साळाओए अंदरोअंदर मंत्रणा करी, 'आपणा बनेवी रागने ओळखी शके छे के नहीं तेनी परीक्षा करीए. काले आपणे पंचमराग गाईशं.' तेमनी बेहने आ सांभळ्यु. तेणे पोताना पतिने जणाव्यु, 'काले आ लोको पंचमराग गाशे. तुं सावधान रहीने तने पूछे त्यारे ए नाम आपजे-नहीं तो तारी ठेकडी करशे'. बीजे दिवसे पंचमराग गातां साळाओए पूछ्युं, त्यारे बनेवीए ते पंचमराग होवानुं का. संगीतसभा ऊठी गई, त्यारे साळाओए थोडे दर जई अंदरोअंदर वात करी, 'आपणे कयो राग गावाना छीए ते बहेन सांभळी गई अने तेणे आपणा बनेवीने चेतवी दीधो. पण काले आपणे धन्याश्रीराग गाई| अने बहेनने आनी जाण न होवाथी ताशिरो थशे.'
ते प्रमाणे वळते दिवसे धन्याश्रीराग गातां साळाओए बनेवीने पूछयु, 'हो ।
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(७४)
आ कयो राग छ ?' बनेवीए कह्यु, षष्ठराग'. साळाओ हसी पड्या, 'क्यांय षष्ठराग सांभळ्यो छे ?' मूछ मरडतां बनेवी बोल्यां, 'मूर्खाओ, गई काले पंचम होय तो आजे षष्ठ केम न होय ?' आ सांभळीने लजवाती तेनी पत्नीए आगळ आवो धान्यनो संकेत पतिने देवा तोलडी ऊंचकीने हलावी, एटले बनेवी बोल्या, 'अरे ! हुं जरा भूल्यो, ए षष्ठ नहीं पण तोलड राग हतो'. बधाए हसता हसतां कह्यु, 'तोलड राग क्याथी लई आव्या?' बनेवी बोल्या, 'जुओ, तमारी बहेन ज मने संकेत आपे छे.' साळाओ बोल्या, 'वाह वाह ! आपणा बनेवी तो संगीतविद्यामां तुंबुर छे.' ७. उत्तम पुत्रप्राप्तिनुं शरती वरदान
अषाढी अमावास्या एटले के दिवासाने दिवसे परणेली स्त्रीओ एवरतजीवरतनुं व्रत करे. झवेरचंद मेघाणीए ए व्रतनो 'कंकावटी 'मां ढूंको परिचय आपी 'एवरत-जीवरत'नी व्रतकथा आपी छे. तेनो शरूआतनो भाग नीचे प्रमाणे छे (बे भागनुं संयुक्त पुनुर्मुद्रण, १९८४, पृ. १७-१८) :
___ बामण अने बामणी हतां. एने पेट जण्युं न मळे. बामण तो रोज मा देवजीनी पूजा करीने माथे फूल चडावे, एटले मुसनमान रोज बामणनी पूजा भूसीने मा 'देवजीने माथे माछलां चडावे.
बामणने तो विचार थयो छे के -
अरेरे ! आ न करवानां कामां करनारो मुसनमान; एने घेर घेरोएक जण्यां, ने मारे घेर घोडियुं बांधवाये छोरं नहीं !
देवळमां जईने बामण तो पेट छरी नांखवा तैयार थाय छे. त्यां तो मूर्तिना मोमांथी माकारो थाय छे, के -
__ 'मा ! मा !' बामण कहे : 'कां?'
महादेवीजी पूछे छे के 'भाई रे भाई, पेट कयर शीदने नाख छ ?'
'अरे महाराज ! ओल्यो मुसलमान रोज माछलां चडावे एने घेर घेरो जण्यां; ने हुं फूल चडावं तो य मारे घेर घोडियुं बांधवा ये छोरुन मळे.'
'एने घेर जईने जोई आव तो खरो.'
बामण तो मुसलमानने घेर जईने जोई आव्यो छे. मा देवजी तो पूछे छे, 'भाई, भाई, तें शुं जोयु ?'
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(७५) 'मा'राज, में तो छाणनो पोदळो जोयो, ने मालीपा कीडा खदबदता जोया'.
"हे भाई , एनां घेरो जण्यांनी दशा तो ए पोदळामां खदबदता कीडा जेवी जाणजे; जा, तने एक दीकरो दउं छु. पण दीकराने भणावीश मा, ने भणाव तो परणावीश मा.'
बामणने तो विचार थई पड्यो छे. एना मनमां तो थयु के 'ठीक जीवता, अयणे तो दिकरो लई लेवा दे ! पछीनी वात पछी जोवाशे.'
__ स्वस्ति कहीने बामण तो घेर गयो छे. गोराणीने तो महीना रह्या छे. नव महिने दुधमल दीकरो आव्यो छे. दीकरो तो दिए न वधे एवो राते वधे, राते न वधे एवो दीये वधे छे; अदाडे ऊझर्यो जाय छे. हां हां करतां तो दीकरो छ महिनानो, बार महिनानो , बे वरसनो थयो छे. एने तो रमाडे छे, खवरावे ने पीवरावे छे. दीकरो तो शो मोंघो ! शो मोंघो ! कोई वात नहीं एवो मोंघो! सात खोट्यनो एक ज दीकरो.
एम करतां तो दीकरो पांच वरसनो थयो छे. माबापने तो विचार थयो छे के अरेरे, दीकराने नहीं भणावीए तो पेट खाशे शुं ? ने नहीं परणानीए तो वसती रे'शे शुं ?
दीकराने तो निशाळे बेसार्यो छे. दीको बार वरसनो थयो त्यां तो भणीगणीने बाजंदो थयो छे. एने तो नाळियेर आवतां थयां छे . पण मा देवजीनी तो दुवाई छे के -
दीकराने भणावीश मा, ने भणाव तो परणावीश मा. गोर-गोराणी तो विचार करे छे, के पूतरने नहीं परणावीए तो वसती रे'शे शुं ?
आ कथाघटक शामळ भट्टनी 'सिंहासनबत्रीसी'नी वीसमी वार्ता 'वेताल भाटनी वार्ता'मां शरूआतना भागमां मळे छे. (फा. गु. सभावाळी आवृत्ति, १९९५ पृ. १९६-१२१, कडी ३२-९०). तेनो ढूंको सार मध्यकालीन गुजराती कथाकोशमांथी उद्धृत करूं छु (पृ. २९२) : कनोजनो भीम भाट शेषनागनो भाट होवाथी करोडपति हतो, पण वांझियो हतो. तेणे देवळमां जई शिवपूजन कर्यु. स्वप्नमां आवी शिवे का : 'तारा पूर्वजन्मनां पाप आडां आवे छे.' भीमे घरे आवीने घणां दानपुण्य अने होमहवन कर्यां, अने फी वनमा जई शिवदहेरे एक वरस तप कर्यु. एवामां एक अपुत्र माछीमारे शिवने माथे माछलां पछाडवानी धमकी आपी, एटले शिवे तेने पांच पुत्रनुं वरदान आप्यु. आ जोईने अन्यायथी दुःखी थयेलो भाट पोताना पेटमां पाळी मारवा जतो हतो, त्यां शंकरे तेने वार्यो अने छाणना पोदळामां खदबदता कीडामांथी पांच पापिया जीव माछीमारने आप्या होवानुं जणाव्यु. वळी का के, तारा तपने योग्य
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(७६) प्रतापी पुत्र आपवा माटे मारी एक कला तारे त्यां पुत्र तरीके अवतरशे. ते तारुं घj धन खरचशे, पण तुं तेने वारीश तो ते घर छोडीने चाल्यो जशे.
एवरत-जीवरतनी कथामां जो पुत्रने भणावे तो परणाववो नहीं अने परणाववो होय तो भणाववो नहीं एवी पुत्रवरदाननी शरत छे, अने मातापिता ए शरतनो भंग करे छे. वेतालभाटनी वार्तामां पण पुत्र पैसा पुष्कळ खरचशे अने तेम करतां जो पिता निवारशे तो घर छोडी जशे एवी चेतवणी छे अने पिता तेनो भंग करे छे. ८. खाउघरो शिष्य
शुभशीलगणितकृत 'पंचशती-प्रबंध (अथवा 'प्रबोध')-संबंध' (रचनासमय ई.स. १४६५)मा ३५मा टुचका (पृ. १९५)नो अनुवाद नीचे प्रमाणे छ :
एक पंडितने घणा वखते एक शिष्य मळ्यो. ए खाउधरो हतो. पंडिते हसतां हसतां एक बीजा पंडित आगळ शिष्यनां लक्षण वर्णवतां कह्यु :
'घसि घोघर, ढुंढणि ढलस, खीच तेल नउ काल । गुरुलइ चेलउ सांपडियउ, चालंतउ दुकाल ।'
'घसियानो घोघर, ढूंढणियां उपर ढळी पडतो, खीचडी ने तेलनो काळ-गुरुले एवो चेलो सांपड्यो छे, जे हालतोचालतो दुकाळ ज छे'.
'घसि' = घसियो, लोट शेकीने करातो शीरो. घोघर बिलाडानी जेम शिष्य घसिया पर तूटी पडे छे. 'ढुंढणियां' एटले 'बृहत् गुजराती कोश' अनुसार जुवारनां कूशकांनां ढोकळां. 'ढलस'नो अर्थ अटकळे कर्यो छे. जो 'ढसल' एवो पाठ होय तो 'ढसवू'नो अर्थ 'ढीलुं' एवो थाय. ९. सामान्य शब्दो- मार्मिक अर्थघटन
राजशेखर सूरिकृत 'प्रबंधकोश' (रचनासमय १३४९)मा विक्रमादित्यप्रबंधना छेवटना भागमां एक प्रबंध एम कहीने आप्यो छे के आ प्रबंध जैनेतर परंपरानो छे अने मुग्धलोकोना मनोरंजन माटे ज आप्यो छे. तेनो अनुवाद नीचे प्रमाणे छे :
विक्रमादित्य उज्जयिनीमां राज्य करतो हतो त्यारे एक वार एक ब्राह्मण खेतरमा हळ चलावतो हतो, तेमां भोंयमांथी एक दिव्य प्रभाए झळहळतुं रत्न मळ्यु. तेती किंमत कढाववा ते झवेरीओ पासे गयो. तेमणे कर्वा : 'आवं अमूल्य रत्न अमे
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पहेलां कदी जोयुं नथी. खोटी किंमत करीए तो अमे पापमां पडीए. आनी साची किंमत कोई करी शके तेम होय तो एक राजा विक्रमादित्य निष्णात रत्नपारखु तरीके एनी ख्याति छे.' ब्राह्मण विक्रम पासे पहोंच्यो. विक्रमे पूछ्युं एटले तेणे रत्न क्यांथी मळ्युं ते जणाव्युं. विश्वास राखी रत्न बे दिवस पूरतुं पोताने सोंपवा विक्रमे तेने संमत कर्यो अने तेने राजप्रासादमां ज राख्यो. बलिराजा सर्वश्रेष्ठ रत्नपारखु होवाथी विक्रम आगिया वेताळने साथै लई तेना उपर सवार थईने पाताळमां बलिराजाना भवनद्वारे आवी पहोंच्यो. त्यां कृष्ण द्वारपाळ हता. तेमणे विक्रमने पूछ्युं, 'शा कामे आव्या छो ?' विक्रमे कह्युं, 'जईने बलिने कहो के महत्त्वने कामे राजा तमने मळवा मागे छे.' कृष्णे बलिने आ संदेशो को एटले बलिए कह्युं, 'आवनारने पूछी जो के ते युधिष्ठिर छे ? केम के राजा तो युधिष्ठिर ज कहेवाय' कृष्णे जई विक्रमने पूछ्युं, एटले विक्रमे कह्युं, 'जईने एम कहो के मंडलेश्वर मळवा मागे छे.' कृष्णे बलिने आ संदेशो कह्यो एटले बलिए पुछाव्युं, 'शुं रावण मळवा मांगे छे ? मंडलेश्वर तो रावण ज कहेवाय !' कृष्णे आ प्रमाणे जणाव्युं एटले विक्रमे कह्युं, 'एम कहो के कुमार मळवा आव्यो छे.' तेना उत्तरमां बलिए पूछाव्युं के 'शुं कार्तिकेय आव्यो छे, लक्ष्मण छे ? पातालवासी नागपुत्र धवलचंद्र छे ? के पछी वालिपुत्र, रामदूत अंगद छे ? कुमारो तो ए ज कहेवाय'. एटले वळी पाछु विक्रमे कहेवराव्यं, 'के दास, सेवक आव्यो छे'. बलिए पार्छु पुछाव्युं, 'शुं हनूमान आव्या छे ? सेवक तो हनूमान ज'. छेवटे विक्रमे कहेवराव्युं, 'कोटवाळ मळवा मागे छे'. बलिए कृष्ण द्वारा पुछाव्यं, 'शुं विक्रम मळवा आव्यो छे ?' विक्रमे हा कही अने आदेश मळतां बलिराजा पासे पहोंच्यो. बलिए पूछयुं, 'तुं रत्ननी किंमत पूछवा आव्यो छे ने?' हा कहीने विक्रमे रत्न देखाड्यं बलिए कयुं, 'युधिष्ठिर आवा अठ्याशी हजार रत्ननुं नित्य सुपात्रोने दान करता. तेमांनुं एक क्यांक दडी गयुं अने छेवटे ब्राह्मणने भोंयमांथी मळ्युं. केम के कालबळे ए बधां रत्नो धरतीमां दटाई गयां. तो विक्रम, तारी तो शी गणना ?' विक्रमे कह्युं, 'साचुं, महाराज, पण मारे जाणवुं छे के युधिष्ठिरने आटली बधी संपत्ति क्यांथी सांपडी हती?' बलिए कह्युं, 'तेना चार भाईओए दिग्विजय करीने ते आणी हती. पहेलांना युगमां चमत्कृत नामना एक दळदरी कथाधारीए रुद्रनी आराधना करी. प्रसन्न थईने रुद्रे कैलासनी पासे एक रत्न - सुर्वणमय नगरीनुं निर्माण करी तेने आपी. चमत्कृते तेनो उपभोग कर्यो. तेना मृत्यु पछी रुद्रे धूळनी वृष्टि करीने ते दाटी दीधी. ज्यारे सहदेव उत्तर दिशामां दिग्विजय माटे गयो त्यारे स्ट्रे पोताना गणोने
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(७८) मोकली ए नगरी बहार काढी अने युधिष्ठिरने समर्पित करी. एटले युधिष्ठिरे यथेच्छ दान कर्यु. आथी राजा तो एक मात्र युधिष्ठिर. विद्याना दर्पथी बळवान रावण ए ज मात्र एक मंडलेश्वर. मात्र सात दिवसनो होवा छतां कार्तिकेये ताराकासुरनो वध कर्यो हतो, एटले कुमार तो ए ज. अथवा तो लक्ष्मण, जेणे मेघनादने रणमां रोळ्यो अथवा तो पीहुलीनो पुत्र धवलचंद्र, जेनुं विष आखा जगतनो नाश करी शके, विषने पण अमृत बनावी शके, अथवा अंगद, जे एम कही शकतो हतो के संधि के विग्रह माटे ज्यारे हुं दूत होउं त्यारे दसमाथां, वढायेला के वणवढायेलां, धरतीपीठ पर अळोटशे' अने सेवक एक मात्र हनूमान जेणे सीताना विरहज्वरे जर्जरित अंगोवाळा रामने सभा मध्ये धीरज बंधावी हती :
'महाराज, मने आज्ञा आपो. शुं लंका ऊंचकीने लई आएं ? जंबूद्वीपने अहींथी खसेडुं ? समुद्रने शोषी लउं ? अथवा तो रमतमात्रमां विंध्य, हिमालय, स्वर्णगिरि अने त्रिकूयचलने ऊंचकी, समुद्रमा नाखी ऊछळता जळसमूहवाळा तेना पर सेतुबंध करं?' हा, तुं कोटवाळ खरो. जा, ब्राह्मणने कहेजे आ रत्न अमूल्य छे.' विक्रमे उज्जयिनी जई ब्राह्मणने रत्न पार्छ सोंपी बलिराजाए जे का हतुं ते जणावी तेने तेने गाम मोकली आप्यो.
आ कथानुं मर्मस्थान 'राजा', 'मंडलेश्वर', 'कुमार' वगेरे सामान्य शब्दना विशिष्ट अर्थघटनमा रहेलुं छे.
नीचे गुजारातीमां आपेली एक राजस्थाननी लोककथामां आ ज प्रयुक्ति वपराई छे.
एक वार राजा भोज अने माघ पंडित शिकार खेलवा गया. पाछा फरतां तेओ रस्तो भूल्या. हवे कोने पूछQ ? माघ पंडितना कहेवाथी एक खेतरमा एक डोशी रखवाळू करती हती तेनी पासे जई रामराम करीने तेमणे तेने पूछ्युं, 'बाई, आ रस्तो क्यां जाय छे ?'
डोशी बोली, 'आ रस्तो तो अहीं ज रहे छे, तेना उपर जेओ चाले छे ते जशे'. ए पछी तेमनी वच्चे प्रश्नोत्तर चाल्या : _ 'वीरा, तमे कोण छो ?'
'बाई, अमे वटावडा (मुसाफर) छीए.'
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(७९)
'वटावडा तो बे ज. एक सूरज, बीजो चन्द्रमा.' 'बाई, अमे तो परोणा छीए.' 'परोणा तो बे ज. एक धन, बीजें जोबन.' 'बाई, अमे तो राजा छीए.'
'राज तो बे ज. एक इन्द्र, बीजा यम. तमे वळी केवा राजा ? वीरा, साचुं बोलो, कोण छो तमे ?'
_ 'बाई, अमे तो भरखम छीए.' 'भरखम तो बे ज. एक धरती, बीजी स्त्री.' 'बाई, अमे तो साधु छीए.' 'साधु तो बे ज. एक शील, बीजो संतोष.' 'बाई, अमे तो ऊजळां छीए.' 'ऊजळां तो बे ज. एक वाणी, बीजो साबू'. 'बाई, अमे तो परदेशी छीए.' 'परदेशी तो बे ज. एक जीव, बीजुं मान.' 'बाई, अमे तो गरीब छीए.' 'गरीब तो बे ज. एक बकरीनो बेटो बकरो, बीजी दीकरी.' 'बाई, अमे तो धोळा छीए.' 'धोळा तो बे ज. एक बळद, बीजो कपास.' . 'बाई, अमे तो भर्या छीए.' 'भर्या तो बे ज. एक वादळ, बीजी अस्त्री.' 'बाई, अमे तो चतर छीए.' 'चतर तो बे ज. एक अन, बीजं जळ.' 'बाई, अमे तो नि:संग छीए.' 'नि:संग तो बे ज. एक इन्द्र, बीजी कन्या.' 'बाई, अमे तो हार्या छीए.'
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'हार्या तो बे ज. एक देणदार, बीजो दीकरीनो बाप.' 'बाई, अमे कोण छीए ते अमे जाणता नथी. तुं जाणती हो तो तुं ज कहे'.
एटले डोशीए का, 'ए राजा भोज छे, अने ए माघ पंडित. अने पेलो छे तमारे जवानो रस्तो. जाओ.'
जोई शकाशे के आ कथामां पण 'वटवडो', 'परोणो', 'राजा', 'परदेशी', 'गरीब' वगेरे सामान्य शब्दोनुं विशिष्ट अर्थघटन करीने कथानी रसनिष्पत्ति करी छे.
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७. प्रयोगोनी पगदंडी
१. 'सीझवुं' के 'सीजवुं' ?
१. कोशोमां सीझवुनो अर्थ 'धीमे तापे बराबर बफाइ के चडीने तैयार थवुं - रंधाई रहेवुं' ए प्रमाणे आप्यो छे. जेम के 'भातने सीझवा देवा'. सं. सिध्यति, प्रा. सिज्झइ अने पछी सीझे ए प्रमाणे व्युत्पत्ति आपेल छे.
२. आमां एक मुश्केली ए छे के संस्कृत अने प्राकृत शब्दोनो अर्थ तो सामान्यपणे 'सिद्ध थवुं', 'रंधावुं' एवो छे, नहीं के 'धीमे तापे रंधावुं'. अन्य भारतीय भाषाओमां आ शब्दनी साथे संकळायेला शब्दो जोतां शब्दनुं स्वरूप अने मूळ फेरतपास मागे छे.
३. टर्नरना भारतीय-आर्य भाषाओना तुलनात्मक कोशमां क्रमांक १३९३३ (स्विघति ) अने १३९३४ (स्विन्न) नीचे जे माहिती आपी छे, तेथी आ प्रश्न पर प्रकाश पाडे छे. पालि सिज्जिति ऊकळे छे', हिन्दी सीजना 'धीमे तापे ऊकळवु; पालि सिन्न ऊकळेलुं'; काश्मीरी सेनदुन 'सीझववुं'.
४. एटले स्वेदन 'परसेवो वळे तेम करवुं', 'वराळ निकळे तेम करवुं' ए अर्थने ध्यानमां लेतां सं. स्विद्यति, प्रा. सज्जइ उपरथी गुजराती सीजे (नहीं के सिझे ) धीमे तापे रंधावाना अर्थमां निष्पन्न थयेल छे. आनुं समर्थन जूनी गुजराती सिन्न वडे थाय छे. 'वर्णकसमुच्चय मां (पृ. १७४) वडाना वर्णनमां कह्युं छे : 'घणइ तेलिं सीना' एटले के भरपूर तेलमां धीमे तापे तळ्यां'. सं. स्विन्न प्रा. सिन्न गुजराती सीनं. सौराष्ट्रमां भातने 'सीजवा देवा' ओम बोलाय छे.
.
५. 'रांध्यंसीध्यं 'मां ए पर्यायसमासमां 'सीधवं' मळे छे. 'वर्णकसमुच्चय 'मां (पृ.१७३) 'कुघरणी 'ना वर्णकमां 'रांधणां सीधणा नितु अणाहर (अणादर ? ) करइ '. (पृ. १४३).
२. 'सूनासणा'
'अनुसंधान' - १मां (पृ. १८ - १९) जूनी गुजराती सूनासणा अने अपभ्रंश सुण्णासण शब्द 'असवाररहित, सूनी बेठकवाळा' उपर नोंध छे. एक वधु प्रयोग जूनी गुजरातीमां मळता रूढ वर्णकोमांथी ध्यानमां आव्यो. तेमां युद्धना वर्णनमां 'सूनासणा
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तुरंगम तडफडई, रथ धडहडई' ('वर्णकसमुच्चय', पृ. ८१). 'सूनासणा तुरंगम तडफडई, भाले भरडीता गजेन्द्र आरडई'. ('सभाशृंगार', पृ. ७९) ए प्रमाणे मळे छे. ३. झंबडक-गीतनु वधु एक उदाहरण
'अनुसंधान 'ना चोथा अंकमां झंबडक-गीत विशे नोंध आपी हती ( पृ. २४-२५). 'प्रभावकचरित'मां ते 'झंबडक'ने बदले 'हुंबडक' एवो भ्रष्ट पाठ होवार्नु त्यां बताव्युं हतुं. तेवो ज बीजो दाखलो 'विनोदकथासंग्रह' (प्रकाशन वर्ष १९१८)मांनी एक कथामांथी मारा ध्यानमां आव्यो. एना कर्ता 'प्रबंधकोश'कार मलधारी राजशेखरसूरि छे (चौदमी शताब्दीनो पूर्वार्ध). तेनी १८मी कथा ('आत्म-विगोपक जटाधर-कथा') आम तो भ्रष्टाचारी शैव साधुओ (भरडाओ) अने मठाधिपतिओने लगती छे, अने तेमां परसंप्रदायनी टीकानो आशय पण छे (जे ते वेळानो अरसपरस व्यवहार हतो), पण कथा लेखे ते रसप्रद छे. हुं अनुवाद नीचे प्रमाणे आपुं छु :
कोई एक तापस देशदेशमा पर्यटन करतो महाराष्ट्र पहोंच्यो. त्यानां कोईक गामडामा भिक्षा न मळतां, बपोरे भूखे पीडातो, आमतेम भटकतो ते एक छीपाना घरमां पेठो. त्यां प्रसंगवश घणा लोको घीथी भरपूर मिष्टानो आरोगता हता. कृपाभावे भरडाने पण दहीभात भिक्षामां मळ्यां. तेणे त्यां ज ते खाई लीधां. केटलाक समये ए जटाधारी गूर्जरदेशमां पहोंच्यो. त्यां एक नगरना मठपतिए तेने आश्रय आप्यो. कर्मबळे ते आगळ जतां मोटो मठपति बनी गयो. तेने गरासमां लाखोनी आवक हती. मोटो सेवकवर्ग हतो.
एक वार राजाना गायक, नर्तकी वगेरेनी मंडळी पोतानी कला प्रदर्शित करी भेट तरीके द्रव्य प्राप्तिनी इच्छाथी तेनी पासे आवी. तेनी आसपासनाओए विनंती करीने तेने जोवा-सांभळवा बेसार्यो. कलाकारोए पण ध्रुवक, प्रतिमंठ वगेरे शास्त्रीय गीतप्रकारो लांबा समय सुधी गाया. परंतु मठपतिए कशुं आपवानुं कर्यु नहीं. एटले ए शठ कलाकारोए विचार्यु, 'आनी समक्ष गामठी छंदोगीतो रजू करीए.' एटले पछी तेमणे 'हुंबडक' गावानुं शरू कर्यु. ए गीतनी आंचळी (टेक, ध्रुवपद) आ प्रमाणे हती :
___कहउं जि भरडई जं जं किउं' (अर्थ : 'भरडाए जे जे कर्यु ते हुं कही बतायूँ छु'). ए सांभळीने चकित थयेला भरडा मठपतिने थयुं, 'में छीपाने घेर भोजन कर्यु ए कोईक रीते आ लोको जाणी गया छे'. एटले तेणे कलाकारोने पुष्कळ रेशमी
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वस्त्रो, सोनानां सांकळां वगेरे भेटथी नवाज्या. कलाकारोने पण चसको लाग्यो एटले कलाकारोए पार्छ गायुं, 'भरडाए जे जे कर्यु ते हुं कही बतावं छु'. एटले मठपतिए फरी पाछी तेमने भेटो आपी. एटले कलाकारोए त्रीजी वार ए ज गीत गायु. हकीकते ए लोको शंकरचरित्रना गीतनी प्रस्तावना लेखे ए पंक्तिनुं गान करता हता, पण जटाधारी एने पोताना पहेलाना आचरणने, प्रसंगने अनुलक्षीने घटवतो हतो. एटले पछी क्रोधे भराईने ए जटाधारी कलाकारोने बोलावीने बराड्यो, 'अरे दुष्टो ! तमारे शुं कहे, छे ? भरडाए छींपाने घेर दहीभात खाघा, खाधां, खाधां-एमां कोईनुं कांई लई लीधुं छे ?'
आमां 'हुंबडक' ए 'झंबडक', भ्रष्ट रूप छे. अहीं पण गीतना छंदनी पंक्ति १४ मात्रानी छे.
४. गोरखनाथनु एक पद
शुभशीलगणिकृत 'विक्रमादित्यचरित्र'मां गोरखनाथना नामांकनवाळु एक पद उद्धृत थयुं छे (भाग १, आठमो सर्ग, पत्र १३४ख - १३५ क). ते नीचे प्रमाणे
छे:
पुत्ता चित्ता होइं अनेरा, नरहं (?) नारि अनेरी, मोहइ मोहिउ मूढ जंपई, मुहियां मोरी मोरी. १ अतिहि गहना अतिहि अपारा, संसार-सायर खारा, बुज्झउ बुज्झउ गोरख बोलई, सारा धम्म विचारा. २ कवणह केरा तुरंग हाथी, कवणह केरी नारी, नरकिहिं जाता कोइ न राखइ, हियडइ जोई विचारी. ३ क्रोध परिहरि मान म-न करि, माया लोभ निवारे, अवर वइरी मनि म आणे, केवल आपुहु तारे. ४
आ पद कां तो खरेखर गोरखनुं होय, अने तेनी मूळभाषा बदलाई होय, अथवा तो कोई उत्तरकालीन संतभगतनुं होय अने गोरखने नामे चडी गयुं होय. छंददृष्टिए कोई कोई पंक्ति खामी वाळी छे : एकाद अक्षर वधुघटु छे, अने तेनुं कारण मूळना पाठनी भ्रष्टता होय.
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(८४) पूर्तिः १. हेमचन्द्राचार्यकृत 'परिशिष्टपर्व'मां 'नखाच्छोटनिका' ए शब्दप्रयोग छे ( मोनिअर विलिअम्झना संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश अनुसार).
(६८)२. स्वयंभूकृत अपभ्रंश महाकाव्य 'पउमचरिय'-भाग-१मां (१९५३)मां में आपेली सार्थ शब्दसूचिमा ए काव्यमांथी 'दुक्क्' अने 'ढोय'ना प्रयोग नोंध्या छे, अने 'उपमितिभवनप्रपञ्चकथा'नो न ददाति .... स्वगृहे ढौकम्' ए प्रयोग पण नोंध्यो छे.
'जहिं सुअ-सारियहुं णाहिं ढोउ' (पउमचरिय, १६, ५, २ )
'ज्यां शुक -सारिका निकटमां नथी'। रत्ना श्रीयने पुष्पदन्तकृत अपभ्रंश महाकाव्य 'महापुराण'मांथी 'ढुक्क्', 'ढोय' अने 'ढोव'ना प्रयोग नोंध्या छे ( A critical study of Mahapurana of Puspadanta, 1969, पृ. ७०-७१. अर्वाचीन भारतीय-आर्य भाषाओमा आमांथी निष्पन्न शब्दो माटे जुओ ट रनो भारतीय-आर्यनो तुलनात्मक कोश, क्रमांक ५६०९-५६१२ नीचे । संस्कृत प्रयोग पर प्राकृत प्रयोगोनो प्रभाव छे.
(४).३,हेमचन्दाचार्यना अपभ्रंश व्याकरणमां बे वार 'सुहच्छी' ('सुहच्छडी') ='सुखासिका' (सुखशाता)नो प्रयोग थयो छे : ४.३७६(२), ४२३(२)
(४).४ 'ललति', 'ललते' (= रमे छे, क्रीडामग्न होय छे) 'महाभारत'मां वपरायो छे. (हविटनी Roots, Verb forms and Primary Derivatives of the Sanskrit Language, 1885, पुनर्मुद्रण १९६३, टर्नरनो कोश, क्रमांक १०९६८)
ह. भा. पूर्ति : (१) 'मन'ना जूनी गुजरातीना प्रयोगो माटे जुओ जयंत कोठारी, 'मध्यकालीन गुजराती शब्दकोश'. 'मन'मां निषेधवाचक 'म'नी साथे भारवाचक 'न' जोडायो छे. हिन्दीमा 'करो-न' जेवा प्रयोगोमां जे अनुरोध के आग्रहनो वाचक 'न' छे (गुजरातीमा 'ने' छे) ते ज आ होवानुं जणाय छे.
(२) 'कत्तावा सुरपुरि गया' एवा हस्तप्रतना पाठने सुधारी, शब्दविभाग जुदी रीते करवाथी 'कित्ता वासर पुरि गया' एम वांचवानुं सूचन योग्य छे, पण पाठ भष्ट होईने 'केता' एवं रूप होवानुं मानवू जोईए. जूनी गुजरातीमा ए ज रूप जाणीतुं छे.
ह. भा.
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नवप्रकाशित साहित्यनो परिचय
Indian Logic: A study of Jayanta Bhatta's Nyayamañjari : Part II-Nagin J. Shah. Sanskrit - Sanskriti Granthmala 3. 1995. 23 Valkeshvar Society, Ambawadi, Ahmedabad-380015. pp. 12+224. Rs. 225/
डॉ. नगीन शाह घणां वरसथी काश्मीरी मूर्धन्य पंडित जयंत भट्ट (ईसवी नवमी शताब्दीनो अंत, दसमीनो आरंभ)नी 'न्यायमञ्जरी 'नुं अध्ययन करता रह्या छे. 'न्यायमञ्जरी 'नां विविध आह्निकोनो तेमनो गुजराती अनुवाद प्रसिद्ध थतो रह्यो छे. प्रस्तुत पुस्तकमां तेमणे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्दप्रमाण, स्वत:प्रामाण्य अने परत:प्रामाण्यनो ईश्वरनी सत्ता, शब्दनी नित्यता-अनित्यता-ए विषयोने लगता 'न्यायमञ्जरी'ना बीजा अने त्रीजा आह्निकनुं अध्ययन आप्युं छे. परिशिष्टमां धर्मकीर्तिनो प्रमेयविचार अने पूर्वकालीन न्यायवैशेषिक दर्शनमां थयेल ईश्वरविचारनुं तारण आप्यु छे. भारतीय दर्शनना अभ्यासीओने डो. शाहनुं आ गंभीर अने विशद अध्ययन अत्यंत उपयोगी नीवडशे.
जैन दर्शन अने सांख्य-योगमां ज्ञान-दर्शन-विचारणा. जागृति दीलीप शेठ. संस्कृत-संस्कृति ग्रंथमाला २. १९४५, पृ १६+२०० रू.१५०.
ज्ञान अने दर्शन- स्वरूप, तेमनी वच्चेनो संबंध, आध्यात्मिक विकासमां तेमनुं योगदान वगेरे विशे भारतीय दार्शनिको, चिंतन बहुमूल्य छे. आ पुस्तकमां लेखिकाए मुख्यत्वे जैनदर्शन अने सांख्ययोगमा ए विषयोनी जे विचारणा थई छे तेनो तुलनात्मक अभ्यास कर्यो छे. ते साथे बौद्ध दर्शन, उपनिषदो, गीता अने न्यायवैशेषिक दर्शनमां पण ए विषयोनी जे विचारणा थई छे ते पण निरूप्युं छे. आ अभ्यास मूळ संस्कृत, प्राकृत, पालि ग्रन्थोने आधारे करेलो छे. अर्थघटन करवामां ते ते दर्शननी विचारणा साथे संवादिता रखाई छे, अने आचार्योना मतविरोधनो परिहार करवानो पण प्रयास को छे.
(नगीन शाहना प्रास्ताविकने आधारे)
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Ludwig Alsdorf and Indian Studies. Edited by Klaus Bruhn, M. Duckwitz, A. Wezler. Motilal Banarsidass. 1990, pp. 12+120. Rs. 150.
वीशमी सदीना पाश्चात्य भारतविदोमां जर्मन विद्वान लुड्विग आल्स्डोर्फ (१९०४-१९७८) सर्वमां अग्रणी एक सर्वतोमुखी संशोधक गणावी शकाय तेवा हता. वैदिक, बौद्ध, जैन, अर्वाचीन भारतीय, संस्कृत, अर्धमागधी, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश ए बधां ज तेमनां कार्यक्षेत्र हतां, अने केटलाकमां तो तेमणे करेलुं संशोधनकार्य पायानुं हतु..
प्रस्तुत स्मरणांजलि रूप पुस्तकमां तेमने लगती अवसानप्रशस्ति, तेमनां स्वकीय लखाणोनी संदर्भसूचि अने सालवारी, तेमणे करेला अवलोकनोनी संदर्भसूचि, तेमनां महत्त्वनां पुस्तकोनी विविध विद्वानोए पहेलां प्रकाशित करेली समीक्षाओनो संचय, तथा तेमनां वैदिक अध्ययनोनुं (पाउल थीमे), जैनविद्याने लगतां अध्ययनोनुं (ए. मेट्टे), अशोक्लेखोने लगतां तथा पालि-अध्ययनोनुं (के. आर. नोर्मन मूल्यांकनएटली सामग्री आपवां आवी छे. १९७४मां आल्स्डोर्फना ७०मा जन्मदिने तेमना विविध संशोधन सामयिकोमा प्रकाशित लेखोनो ७८४ पानांनो एक दळदार संग्रह (Ludwig Alsdorf's Kleine Schriften. Ed. A. Wezler.) प्रकाशित थयो हतो. तेमां 'उत्तराध्ययन'ने लगतां अध्ययनो, वैदिक आख्यान-सिद्धांतनी समीक्षा, 'वसुदेवहिंडी'नी परंपरा, भाषा अने वेढने लगतां संशोधनलेखो, जैन विश्ववर्णनने लगता लेखो अपभ्रंश संपादनोनी समीक्षाओ वगेरेनो समावेश थयेल छे (तेना मारा अवलोकन माटे जुओ 'संबोधि', ग्रंथ ९, पृ. ७५-७६). तेमना अवसान पछी १९८१मां एक स्मारक ग्रंथ पण प्रकाशित करवामां आव्यो (Studien Zum Jainismus und Buddhismus-Gedenschrift für Ludwig Alsdorf, Ed. K. Bruhn, A. Wezler). ए महापंडितना संशोधनकार्यना बधां पासांने लगतो एक सर्वसामान्य, व्यापक परिचय आपवानी नेमथी प्रस्तुत पुस्तक तैयार करायुं छे. संपादकोए तेमनी प्रस्तावनामां विगते आ हेतु समजाव्यो छे.
*Formes et usages de la concaténation en prakrit'. Nalini Balbir. Sauhțdyamangalam : Studies in Honour of Siegfried
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Lienhard on his 70th Birthday. Edited by M. Juntunen, W. L. Smith, C. Suneson. Stockholm, 1995, pp 5-26.
नलिनी बलबीरे आ लेखमां प्राकृत साहित्यमां थयेला, यमक नामा शब्दालंकारना एक प्रकार 'संदृष्ट' के 'शृंखला' यमकना प्रयोगो विशे माहिती आपीने स्वरूप, भेदो, इतिहास वगेरे दृष्टिए चर्चा करी छे. मुख्यत्वे 'सूत्रकृतांग', 'सेतुबंध', विमलसूरिकृत 'पउमचरिय', 'कुवलयमाला', 'समराइच्चकहा', 'लीलावई कहा', 'चउपनमहापुरिसचरिय', 'पुहइचंदचरिय' वगेरेमां मळतां उदाहरणो तरफ ध्यान खेंच्यु छे. एक छेडे 'ऋग्वेद मां (१०, ८४) तो बीजे छेडे आज पण प्रचलित अंतकडी के अंत्याक्षरीमा : ते 'प्रतिमाला' के 'भंडी' तरीके इसवी पहेलीथी वीशमी शताब्दी सुधी होवानुं पी. के. गोडेओ एक लेखमां बताव्युं छे) ए साहित्यिक रचनायुक्ति जाणीती होवानी पण नोंध लीधी छे. शृंखलायमकथी 'लाटानुप्रास' अलंकारनु स्वरूप अने आस्वाद्यता जुदां होईने ते बनेने एक खानामां नाखवानी लेखिकाए भूल करी छे. जूनी गुजरातीनां वसंतवर्णनना फगुप्रकारनां काव्योमा मध्ययमक (पूर्ववर्ती चरणना अंतने अने पछीना चरणना आदिने प्रत्येक पद्यार्धमा जोडतुं) लाक्षणिक छ - अने तेना अनुसरणमां रचायेल थोडाक संस्कृत फग-काव्योमां पण तेनो प्रयोग थयो छे. कालिदासे पण 'रघुवंश'ना नवमा सर्गमां, आगळ जतां वसंतवर्णन कर्यु छे तेथी, १ थी ५४ पद्योमा चोथा चरणमां आरंभे यमकनो प्रयोग को छे.
प्रकाशन-माहिती
आचारांगसूत्र - प्र.श्रु., बालावबोध
कर्ता : श्री पार्श्वचंद्रसूरि. रचना : विक्रमनुं सोळमुं शतक. संपादक : श्री अमृत लालभाई भोजक, अमदावाद. प्रकाशक : श्री पार्श्वचंद्रसूरी साहित्य प्रकाशन समिति, मुंबई, ग्रंथमालाना संपादको : मुनिश्री भुवनचंद्रजी, डो. गुलाब देढिया, भरत
सी. शाह.
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अज्ञातकर्तृक अर्हत्प्रवचनसूत्र-सविवरण
सं.-पं. शीलचन्द्रविजयगणि 'अर्हत्प्रवचन' नामे नोंधायेली प्रस्तुत-मूलसूत्र तेमज तेनुं स्वोपज्ञ विवरण धरावती-कृतिनी एकमात्र प्रति, खंभातना श्री शान्तिनाथ प्राचीन ताडपत्रीय जैन भंडारमा सचवाई छे. मुनि पुण्यविजयजी-संपादित Catalogue of palmleaf Mss. in the Shantinatha Jain Bhandara, Cambay-part-1मां (Gos. Baroda, 1961) पृ. 174 पर क्र. 107 तरीके नोंधायेली, 139 पत्रोनी अने ११ विभिन्न कृतिओना संग्रहरूपे ताडपत्रीय हस्तप्रतिमां १०मी कृति तरीके आ 'अर्हत्प्रवचन-पंचाध्यायात्मक' नामनी कृति छे, जे १२२ थी १३८ एटले के कुल १६ पत्रोमां पथरायेली छे प्रति अधूरी - अपूर्ण होई लेखकतथा लेखन संवत आदिनुं वर्णन प्राप्त नथी, परंतु विक्रमना तेरमा शतकना पूर्वार्धमां ते लखाई होवानुं अटकळवामां आव्युं छे. कृतिना कर्तानो नामोल्लेख नथी, अने आ रचनानी प्रति अन्यत्र क्यांय-कोई भण्डारमा होवा- अद्यावधि जाणवामां नथी आव्यु. परंतु कोई भण्डारमां कोईक आवी संग्रहात्मक पोथीमां आनी बीजी नकल मळी आवे ते अशक्य न गणाय.
___ 'अर्हत्प्रवचन' ए तद्दन सरल छतां प्रगल्भ भाषामां थयेली मधुर लघु रचना छे. पांच मोटां सूत्रो छे, जेने अहीं 'अध्याय' तरीके वर्णवेल छे, अने ते सूत्रोमां दर्शावेला आंक मुजबना पदार्थोनुं स्वरूपवर्णन-मात्र करती विवृति पण आमां ज छे, जे संभवतः सूत्रकारे ज रचेल जणाय छे. वाक्यो ढूंकां ढूंकां छे, पद्धति सूत्रात्मक छे . थोडा अने ते पण सरल शब्दोमां जैनदर्शननी समजण आपवानो कर्तानो मजानो प्रयास छे, ए तो प्रथम दृष्टिए ज जणाई आवे.
____ पांच अध्यायो पैकी प्रथममां १०, द्वितीय अने तृतीयमा २०-२० , चतुर्थमां १३ तथा पंचम अध्यायमां १८ पदार्थोनुं प्रतिपादन थयुं छे. आ पदार्थोमां केटलीकबाबतो खास ध्यानार्ह छे, ते आ प्रमाणे :
१. पांच अणुव्रतो (१-३) नी साथे रात्रिभोजनत्यागने पण षष्ठ अणुव्रत गणाव्यु छे; प्रचलित परंपरामां तेनो समावेश सातमा व्रतमां थयो छे. २. सामान्य पद्धतिमा पहेलां समिति, पछी गुप्ति-एम क्रम छे, ज्यारे अहीं पहेलां गुप्ति, पछी समिति (१/६-७) वर्णवेल छे.३ साधुना रजोहरण माटे 'पिच्छक' शब्द अहीं प्रयोजेल छे (१/७) सामान्यत: आ शब्द दिगम्बर परंपरामां वपराता मोरपिच्छ' माटे प्रयोजाय छे. ४. दशविध'यतिधर्म ने माटे 'देश
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(८९) धर्मानुभावनाः' एवो प्रयोग (१-८) थयो छे, तो 'रत्नप्रभा' आदी ७ नरक पृथ्वीओने "धर्मभूमि" तरीके (३-९) वर्णवी छे. ५. सिद्धान्तमां दशविध प्रायश्चित्त प्रसिद्ध छे, ज्यारे अहीं प्रायश्चित्त १२ प्रकारनां गणाव्यां छे, ते पण जुदी रीते, अने तेमां दशविध प्रायश्चित्तोनो पूर्णतः समावेश तो नथी ज थतो (२/१५) ६. नव तत्त्वजु प्रतिपादन ७ तथा ९ एम बे भेदे परंपरामां मळे छे, अहीं तेने जुदां जुदां पाडीने जीवादि ९ पदार्थो (२/१)अने जीवादि ७ तत्त्वो (२/२) एम वर्णव्यां छे.७. चार प्रकारनां ध्याननी व्याख्याओ परंपरा करतां जुदी पडे छे.तेने वर्णवतां पद्यो पण ध्यानपात्र छे (२/१९) ७.कल्पस्थितिक-वैमानिकप्रकारोमाटेनी मान्य संख्याथी जुदा पडीने तेना १६ प्रकारो/नामो अहीं वर्णव्यां छे; (४/५) तो नव ग्रैवेयको तथा अनुत्तर-एम मळीने कल्पातीत देवो (अहमिन्द्रो)ना १० भेद बताव्या छे; पाछा पांच अनुत्तरो जुदां तो खरां ज ( ४/६) ८. नव 'अनुदिश' प्रकारना देवो पण जणाव्या छे (४/५) जेने माटे तत्त्वार्थसूत्रमां कोई निर्देश जणातो नथी; नव लोकन्तिको ते आ होई शके? ९.द्विविध शील (४/१४), बे भेदनी निर्जरा (५/६) द्विविध संयम (१/८), देश अने सर्वबे जातनो मोक्ष (५/११) त्रण प्रकारे सिद्ध (५/१५) बार सिद्धानुयोगद्वारो (५/१६) - आ बधां अपूर्व वर्गीकरणो छे. १०. पुलाकादि पांच भेदे निर्ग्रन्थोनुं स्वरूप मान्य सैद्धान्तिक परंपराने तद्दन चातरनारुं अपूर्व जणाय छे (५/१४). आ पांच निर्ग्रन्थ-स्वरूप-वर्णनमा ज'प्रथमानुयोग' नो उल्लेख पण छे, जे नोंधपात्र छे. ११.त्रण अज्ञानोमांत्रीजं. 'विभंगज्ञान' तरीकेज परंपरामां प्रसिद्ध छे, अहीं (२/१०) तेने विभङ्गाज्ञान-नामे वर्णव्युं छे. ए ज रीते, १४ पूर्वमा अग्यार# पूर्व नन्दिसूत्रादिमां 'अवन्ध्य' पूर्व तरीके गणाव्युं छे, ज्यारे अहीं (२/ १३) तेने 'कल्याण' एवा नामे ओळखायेल छे. १२. केटलांक नामो पण ध्यान देवा जोग छे. त्रिपिष्ठ (त्रिपृष्ठ), द्विपिष्ठ (द्विपृष्ठ), अस अर; तीर्थंकर), रामण (रावण), प्रढाल (पेढाल), जरासिन्धु (जरासन्ध), प्रागम्य (प्राकाम्य) इत्यादि.
एकंदरे कृतिने तपासतां कहेवू जोईए के परंपराथी न्यारं आमां घणुं छे. कदाच तेथी ज तेनो झाझो प्रचार न थयो होय तो ते बनवाजोग छे. आ रचना जो दिगम्बर परंपरानी होय तो ते माटे ते परंपराना ग्रन्थो तथा प्रतिपादनो तपासवानां रहे. परंतु तत्त्वार्थसूत्र तो दिगम्बरपरंपरामान्य पण छे, अने आमां तेनाथी पण केटलीक बाबतो जुदी पडे छे. • जे होय ते, पण आ रचना अपूर्व छे, तेनुं भाषा सौष्ठव तेमज प्ररूपण विलक्षण
छे, तेमां शंका नथी. क्षणार्ध माटे एवो पण विचार झबकी जाय के हेमाचार्यना शिष्य आ. रामचन्द्रनी तो आ रचना नहि होय? भाषा, विचारो अने प्रतिपादनोनी मौलिकता जोतां आवो प्रश्न सहज जागे, तो पण ते अनुत्तर ज रहे छे.
आ रचना विशे कोइ जाणकार वधु प्रकाश पाडे तो ते आवकारदायक हशे ।
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अज्ञातकर्तृकं
श्री अर्हत्प्रवचनसूत्रम् ॥ अथातो अर्हत्प्रवचनं व्याख्यास्यामः । तद् यथा ॥ तत्रेमे षड् जीवनिकायाः । पञ्च महाव्रतानि । पञ्चाणुव्रतानि । त्रीणि गुणव्रतानि । चत्वारि शिक्षाव्रतानि । तिश्रो गुप्तयः पञ्च समितयः । दश धर्मानुभावनाः । द्वादशानुप्रेक्षाः । द्वाविंशति परीषहाः ।। इत्यर्हत्प्रवचने प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥
___ अथातोऽर्हत्प्रवचनसङ्ग्रहं व्याख्यास्यामः । तद्यथा- अथेत्ययं निपात: पूर्वप्रकृत्यपेक्षः । अथ (त) इति पञ्चमीनिर्देशः ।
अर्हन्तो नाम भगवन्तो लोकोत्तमाः सर्वज्ञाः सर्व्वलोकदर्शिनः । तैरुपदिष्टं प्रवचनं गणधरदेवै रचितम् । तद् व्याख्यास्यामः कथयिष्यामः प्रकाशयिष्यामः इत्यर्थ: (१) तथैव षट(ड्) जीवनिकायाः । कतमाः ? । पृथ्वीकायिकाः। आप:कयिकाः । तेज:कायिकाः । वायुकायिकाः । वनस्पतिकायिकाः । त्रसकायिकाश्चेति । एते षट(ड्)जीवनिकाया न हिंस(सि)तव्या व्रतपरिरक्षणार्थम् । (२) पञ्च महाव्रतानि । कतमानि ? । यावज्जीवं प्राणातिपाताद्विरतिः । यावज्जीवं मृषावादाद्विरतिः । यावज्जीवं अदत्तादानाद्विरति : । यावज्जीवं मैथुनाद्विरतिः । यावज्जीवं परिग्रहाद्विरतिः । इत्येतानि रात्रि भोजनाद्विरतिः षष्ठानि भवन्ति ।
(३) पञ्चाऽणुव्रतानि । कतमानि ? । यावज्जीवं स्थूलकृतप्राणातिपाताद्विरतिः । यावज्जीवं स्थूलकृतमृषावादाद्विरतिः । यावज्जीवं स्थूलकृतअदत्तादानाद्विरतिः । यावज्जीवं स्वदारसन्तोषः परदाराद्विरतिः । यावज्जीवं इच्छाकृतपरिग्रहपरिमाण(णं) । षष्ठं अणुव्रतं रात्रिभोजनं(न) व निमिति । एतानि पञ्चाणुव्रतानि ।
(४) तत्र त्रीणि गुणव्रतानि । [क्तमानि ?] । दिसि(शा)विदिसि(शा)प्रत्याख्यानं द्विविधम(न)र्थदण्डाद्विरति :। कतमाः (माः)? |
दण्ड-पास(श)विरालश्च विष-स(श)स्त्राग्नि-रज्जवः । परेभ्यो नैव देयास्ते स्वपरघातहेतवः ।। छेदं भेदं वध(धं) बन्धं गुरुभारातिरोपणम् ॥ न कायन्ति स्वयमन्येषु (मन्यैः) । तृतीयं गुणव्रतं भोगोपभोगकृतपरिमाणं चेति । एतानि त्रीणि गुणव्रतानि ॥ (५) चत्वारि शिक्षाव्रतानि । कतमानि ? । सामायिकम् । दिवसावशेषिकम् ।
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पर्व्वे (र्वणि पौषधोपवासिकम् । अतिथिसंविभागिकम् । पश्चिमसंल्लेखनामरणान्तिकम् । एतानि चत्वारि शिक्षाव्रतानि । तत्र शीलव्रतानि कथितानि श्रावकधर्म्मश्चेति ।
(६) तिश्री गुप्तयः । कतमा : ? । कायगुप्ति । वचोगुप्ति । मनोगुप्तिरिति । तत्र कायगुप्तिर्नाम स (श) यनासनादाननिक्षेपणस्थानचंक्रमणाकुञ्चनप्रसारणादीनां कायचेष्टानियमः। स एषा कायगुप्तिर्नाम । वाचनप्रच्छनप्रश्नव्याकरणादिषु वाग्गुप्तिर्नाम । मनोगुप्तिर्नाम सर्व्वसावद्यसङ्कल्पनिरोधः, तथा अकार्यका (क) रणचिन्तनीयस्य निरोधः । स मनोगुप्तिः । एता: तिश्रो
गुप्तयः I
(७) पञ्च समितयः । कतमा: ? । ईर्या - भाषा - एषणा- आदान निक्षेपणोत्सर्गाश्चेति । तत्र ईर्यासिमितिर्नाम 'इ (ई) रगतै' धात्वर्थे । ईर्ष्या नाम रथस (श) कटयानवाहनाक्रान्तेषु मार्गेषु प्राशुकविविक्तेषु सूर्यरश्मिप्रकाशितेषु युगम (युग) मात्रदृष्टिना भूत्वा गमनागमनं कर्तव्यमिति । एषा ईर्यासमितिः ॥ भाषासमितिर्नाम हितमितअसन्दिग्धनिरवद्यार्थनियमभाषिणी वाणी भाषितव्या । एषा भाषासमितिर्नाम ॥ पाणिपात्रे भिक्षागोचरगतेन अननुमताऽकृत अकारित असङ्कल्पितनवकोरिपरिशुद्धं दशदोषविवज्जितं चतुर्दशमलविशुद्धं निर्द्धमं भोक्तव्यमिति सा एषणासमितिर्नाम आदाननिक्षेपणा समितिर्नाम अङ्गोपाङ्गप्रत्यङ्गाकुञ्चनप्रशा(सा) रणादीनां निषद्यास (श) य्यासनादीनां अवस्यं (श्यं) निरीक्ष( क्ष्य) पिच्छकेन प्रमार्य (र्ज ) नादाननिक्षेप: (पादि ?) कर्तव्यमिति । सा एषणा (एषा ) - ऽऽदाननिक्षेपणासमितिः । उत्सर्गसमितिर्नाम स्थाण्डिल्ये स्थावरजङ्गमजन्तुविवज्जिते निरीक्ष(क्ष्य) प्रमृज्य वातमूत्रपुरीषोत्सर्गश्लेष्मादीनां ( वातमूत्रपुरीषश्लेष्मादीनां उत्सर्ग :) कर्तव्यः । सा उत्सर्गसमितिनार्म । एता (:) पञ्च समितयः
८. दश धर्मानुभावना: । कतमा : ? । उत्तमक्षमामार्द्दवार्ज्जवसत्यसौ (शौ) चसंज (य) मस्त (त) पस्त्यागाकिञ्चि (ञ्च) न्यब्रह्मचर्यमिति । उत्तमक्षमा नाम सर्व्वसत्त्वसहिष्णुत्वम् । मार्दवं नाम मृदुत्वम् । आर्जवं नाम ऋजुत्वम् । सत्यं नाम अवञ्चकत्वम् सौ(शौ) चं नाम निर्लोभत्वम् । सं (य) मो नाम द्विविध:- इन्द्रियसंज (य) मः । प्राणसंज(य) मश्चेति । तपो नाम इच्छानिरोधः । त्यागो नाम निर्ममत्वम् । आकिञ्चन्यं नाम अपरिग्रहत्वम्। ब्रह्मचर्यं नाम अमैथुनत्वम् । एता दश धर्म्मानुभावना ( : ) । -
I
(९) द्वादशानुप्रेक्षा ( : ) । कतमा: ? | अध्रुव ( : ) । अस (श) रण ( : ) । अनित्यः । संसार : । एष: (एकः) । अन्यः । अशुचि ( : ) । आश्रवः । संवरः । निर्ज्जराः (रा) । लोकः । बौधि:(धेः) दुर्लभत्वम् । धर्म्मस्वख्यिात (:) । एत (ता) द्वादशानुप्रेक्षा भवन्ति ।
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(१०) बावीस ( द्वाविंशति ) परीस (ष) हाः । कतमा : ? । क्षुत्परीषहः । पिपासा परीस (ष) हः । सी (शी) तपरीषहः । उष्णपरीषहः । मस (श) कपरीषहः । नग्नपरीषहः । रति अरतिपरीषहः । स्त्रीपरीषहः । चर्यापरीषहः । निद्रा (निषद्या ? ) परीषहः । सज्या ( शय्या) - परीषहः । आक्रोशपरीषहः । वधबन्धपरीषहः । अयाचनापरीषहः । अलाभपरीषहः । रोगपरी
हः । तृणस्पर्श [ परीषहः ] । मलपरीषहः । अस्नानपरीषह: (?) । सत्कारपरीषहः । पुरस्कारपरीषहः । (सत्कारपुरस्कार परीषह : ?) प्रज्ञा [ परीषहः ] । अज्ञानपरीषहः । सम्यक्त्वपरीषह श्चेति । एते द्वाविंशतिपरीषहाः ॥
इत्यर्हत्प्रवचने प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
नव पदार्थाः। [ सप्त तत्त्वानि ] । चतुर्विधो न्यासः । सप्त नया: । चत्वारि प्रमाणानि । षट् (ड्) द्रव्याणि । पञ्चास्तिकायाः । द्विविधो गुणः । पञ्चज्ञानानि । त्रीणि अज्ञानानि । चत्वारि दर्शनानि । द्वादशाऽङ्गानि । चतुर्दश पूर्व्वाणि । द्विविधं तपः । द्वादश प्रायश्चितानि । चतुर्विधो विनयः। दश वैयावृत्ता(त्त्या) नि । पञ्चविधो (धः) स्वाध्यायः । चत्वारि ध्यानानि । द्विविधो व्युत्सर्गः ॥ इति अर्हत्प्रवचने द्वितीयं सूत्रम् ॥
अतो विवरः । (१) नव पदार्था ( : ) । कतमा: ? । जीवाजीवपुण्यपापाश्रवसंवरनिर्ज्जराबन्धमोक्षाश्चेति । एते नव पदार्था : ॥
(२) सप्त तत्त्वानि । कतमानि ? । जीवाजीवाश्रवसंवर निर्ज्जराबन्धमोक्ष (क्षा ) - श्चेति । एतानि सप्त तत्वानि ॥
(३) चतुर्विधो न्यासः । [ कतमः ? |] नामस्थापनाद्द्रव्यभावतश्चेति । स एष चतुर्विधो न्यासः ॥
(४) सप्त नया: । कतमा: ? । नैगमसङ्ग्रहव्यवहार ऋजुसूत्रशब्दसममिख्दैवम्भूता नयाः । नैगमो द्विभेदः देशग्राही । सकलग्राही । शब्दस्तु द्विभेदः । समभिरूढः । समभिरूढः । एवंभूतः । इत्येष सप्तनया (य) भेदः ॥ (?)
(५) चत्वारि प्रा( प्र )माणानि । कतमानि ? । प्रत्यक्षम् । अनुमानम् । उपमानम् । आप्तवचनम् । एतानि चत्वारि प्रमाणानि । प्राधान्येन द्वे एव प्रमाणे । प्रत्यक्षं परोक्षं चेति ॥ (६) षट् (ड्) द्रव्याणि । कतमानि ? । जीवः । पुद्गलः । धर्म्मः । अधर्म्मः । आकास (श:) काल (:) । इति षट् (ड्) द्रव्याणि ॥
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(७) पञ्चाऽस्तिकायाः । कतमाः? । जीवकाय (जीवास्तिकायः) । पुद्गल(लास्ति)काय(:) । धर्माधर्मकाय (धर्मास्तिकायः । अधर्मास्तिकायः) । आकाश(शास्ति)कायमि(य इ)ति ।।
चतुर्भिः प्रमाणैः जीवति जीविष्यति जीवितपूर्वो वा जीवः । पूरणात् पुद्गलः । पूरयति गालयतीति वा पुद्गलः। धर्मास्तिकायो गतिलक्षणः।अधर्मास्तिकाय:स्थितिलक्षणः। आकाशास्तिकायश्चावगाहनालक्षणः । एते पञ्चाऽस्तिकायाः ॥
(८) द्विविधो गुणः ।कतमः? । जीवगुणः अजीवगुणश्चेति । एवं द्विविधो गुणः॥
(९) पञ्च ज्ञानानि । कतमानि ? । मतिज्ञानम् । श्रुतिज्ञानम् । अवधिज्ञानम् । मनःपर्यवज्ञानम् । केवलज्ञानं चेति । एतानि पञ्च ज्ञानानि भवन्ति ।।
(१०) त्रीणि अज्ञानानि । [कतमानि ? ।] मत्यज्ञानम् । श्रुताज्ञानम् । विभङ्गाज्ञानं चेति । एतानि त्रीणि अज्ञानानि ।
(११) चत्वारि दर्शनानि। कतमानि? ।चक्षुद (द) र्शनम्।अचक्षुद (द) र्शनम्। अवधिदर्शनम् । केवलदर्शनमिति । एतानि चत्वारि दर्शनानि ।।
(१२) द्वादशऽङ्गानि । कतमानि? आचारः। सूत्रकु(कृ)तः।स्थानम् ।समवायः। व्याख्याप्रज्ञप्तिः । ज्ञातृकथा। उपासकाध्ययनम् । अन्तकु(कृ) द्दशा । अनुत्तरो(रौ)पया(पा)दिकंदसं(कदशा:) । प्रश्नव्याकरणम् । विपाकसूत्रम् । दृष्टिवादं च । एतानि द्वादशाऽङ्गानि॥
- (१३) चतुर्दश पूर्वाणि । कतमानि ? । उत्पादपूर्वम् । अग्रायणीयम् । वीया(ा)नुप्रवादम् । नास्तिप्रवादम् । ज्ञानप्रवादम् । सत्यप्रवादम् । आत्माप्रवादम् । कर्मप्रवादम्।प्रत्याख्याननामधेयम् । विद्यानुप्रवादम्।कल्याणनामधेयम्।प्र(प्रा)णावायम्। क्रियाविसा(शा)लम् । लोकबिन्दुसारं चेति । एतानि चतुर्दश पूर्वाणि॥
(१४) द्विविधं तपः । कतमा : (मम्) ? । बाह्या(ह्ययम)भ्यन्तरं चेति । बाह्यं तपः षड्विधम् । अनस(श)नम् । अवमौदर्यम् । वृत्तिपरिसंख्यानम् । रसपरित्यागः । कायकिलेस -(क्लेश:)।विविक्तस(श)य्यासनमिति ।।अभ्यन्तरंषट्(ड्)विधम् ।प्रायश्चित्तम् ।विनयो (यः) । वैयावृत्तम् । स्वाध्यायो (यः) । ध्यानम् । व्युत्सर्गश्चेति । एतद् द्विविधं तपः ॥
(१५) द्वादश प्रायश्चित्तानि । कतमानि ? । अर्द्धमासिकसमुद्धातम् । मासिकसमुद्घातम् । द्विमासिकसमुद्घातम् । त्रमासिकसमुद्घातम् । चतुर्मासिक समुद्घातम् । पञ्चमासिकसमुद्धातम् । षण्मासिकसमुद्घातम् । एक आलोचनाहः। एक उपस्थापनार्हः । एकः प्रतिक्रमणार्हः। एकः कृपायोग्यार्हः । एकः कायोत्सर्गार्हः । एतानि द्वादश प्रायश्चित्तानि ।।
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(१६) चतुर्विधो विनयः । कतमः? ।दर्शनविनयः । ज्ञानविनयः। चारित्रविनयः। औपचारिकविनयश्चेति चतुर्विधो विनयः ॥
(१७) दश वैयावृत्ता(त्त्था )नि । कतमानि ? । आचार्यवैयावृत्त्यम् । उपाध्यायवैयावृत्त्यम् । तपस्विवैयावृत्त्यम् । सिष्य(शैक्ष)वैयावृत्त्यम् । गणवैयावृत्यम् । कुलवैयावृत्त्यम्। [सङ्घवैयावृत्त्यम्।] सा(शा)स्त्र(साधु?)वैयावृत्त्यम् ।ग्लानवैयावृत्त्यम्। मनोज्ञवैयावृत्त्यम्। एतानि दस(श)वैयावृत्ता(त्त्या)नि॥
(१८) पञ्चविधःस्वाध्यायः।क्तमानि (क्तमः)?।वाचन(ना)।प्रच्छन(ना)। अनुप्रेक्षा । आम्नायः । धर्मोपदेशश्चेति । एषः(ष)पञ्चविधः स्वाध्यायः॥
(१९) चत्वारि ध्यानानि । कतमानि ? । आतरौद्रध्यान(धर्म)शुक्लानि । आत(त्त) नाम राज्योपभोगसं (?) शयनवाहन वस्त्राभरणेषुइच्छा भिलाषमतिपूर्वकम्। तदा नाम । रौद्रं नाम छेदनदहनताडनबन्धनमरणानुकम्पारहितरागकरणं तत् रौद्रं ध्यानं नाम। सूत्रार्थमार्गणमहाव्रतभावनापञ्चेन्द्रियोपशमनबन्धमोक्षगमनहेतुचिन्तापूर्वकंधर्मध्यानं नाम । शुक्लध्यानं नाम इन्द्रियविषयप्रवृतमनोवाका(क्का)य सङ्कल्पनिकृ(वृ)ता(त्या)त्मकं मोक्षकारणं शुक्लध्यानमिति । एतदेवाह
राज्योपभोगशयनासनवाहनेषु स्त्रीगन्धमाल्यमणिरत्नविभूषणेषु । इच्छाभिलाषमतिमात्रमुपैति मोहात् ध्यानं तदातमिति तत्प्रवदन्ति सन्तः ॥ संछेदनैर्दहनताडनमारणैश्च बन्धप्रहारदर्शनैश्च विकतनैश्च । यस्येह रागमुपजा(या)ति न चानुकम्पा ध्यानं [च] रौद्रमिति तत्प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ सूत्रार्थमार्गणमहाव्रतभावनानि पञ्चेन्द्रियोपशमनानि दया च भूते । बन्धप्रमोक्षगमना गतिहेतुचिन्ता ध्यानं सुधर्ममिति तत्प्रवदन्ति तज्ज्ञा : ।। यस्येन्द्रियाणि विषयेषु निवतितानि सङ्कल्पकल्पमविकल्पविकारदोषैः । योगैस्त्रिभिस्त्वहरहनिभृतान्तरात्मा
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ध्यानं तु शुक्लमिति तत्प्रवदन्ति तज्ज्ञा : ।। आर्ते तिर्यग्गतिस्तथा (2) गतिरधो ध्याने तु रौद्रे सदा धर्मे देवगतिः शुभं च हि फलं शुक्ले च जन्मक्षयं (यः) । तस्माद् व्याधिरुजान्तके हितकरे संसार निस्तारके शुक्लध्यानवरे रजः प्रशमने कुर्व्वन्तु यत्नं बुधाः ! ॥ एतानि चत्वारि ध्यानानि ॥
(२०) द्विविधो व्युत्सर्गः । कतमः ? | बाह्योऽन्तरश्चेति । बाह्यो नाम सर्व्वारम्भपरित्यागः । अभ्यन्तरो रागद्वेषमोहादीनां परित्यागः । इत्येवं द्विविधो व्युत्सर्गः । इत्यर्हत्प्रवचने द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ।।
तृतीयोऽध्यायः
त्रिविधः कालः । षट्(ड्) विध: कालसमय: । त्रिविधोलोकः । अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्राः । पञ्चदेश क्षेत्राणि । चतुस्त्रिंशद्वर्षधरपर्वताः । पञ्चदश कर्म्मभूमयः । त्रिंशद् भोगभूमयः । सप्त धर्म्मभूमयः । सप्तैव च महानरका: । चतुर्द्दश कुलकराः । चतुर्विंशतितीर्थकराः । नव बलदेवाः । नव वासुदेवाः । नव प्रतिवासुदेवाः । एकादश रुद्राः । द्वादश चक्रवर्त्तिनः । नव निधयः । चतुर्दश रत्नानि । द्विविध (:) पुद्गलः ॥
इति अर्हत्प्रवचने तृतीयं सूत्रम् ॥
(१) त्रिविधः काल: । कतमः ? । अतीतोऽनागतः वर्तमानश्चेति त्रिविधो (धः)
कालः ॥
(२) षट्( ड्) विधः कालसमयः । कातमः ? | सुषमसुषमः । सुषमः । सुषमदुःखमा(मः) । दुःखम: (म) सुखमः । अतिदुःखमः । इत्येष षड्विधः कालसंमयः ॥ (३) त्रिविधो लोकः । कातमः ? उद्धर्वलोकः । अधोलोकः । तिर्यग्लोक : । इत्येष त्रिविधो लोकः ॥
(४) अर्द्धतृतीया द्वीपसमुद्राः । कतमा: ? । जम्बूदीपः लवणसमुद्रः । धातु (त) कीखण्डः । कालोदधिसमुद्रः । पुष्करार्द्ध चेत्येते अर्द्धतृतीया द्वीपसमुद्राः ॥ (५) पञ्चदश क्षेत्राणि । कतमानि ? । पञ्च भरतानि । पञ्च विदेहानि । पञ्च ऐरावतानि । एतानि पञ्चदश क्षेत्राणि ॥
(६) विंशति ( : ) वर्षाः । कतमा: ? । पञ्च हैमवताः । पञ्च हरिवंसाः (वर्षाः) । पञ्च रम्यकाः । पञ्च हैरण्यवताः । इत्येते विंशतिवर्षाः ॥
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(७) चतुस्त्रिंशद्वर्षधरपर्वताः । कतमा :।? पञ्च हिमवन्तः । पञ्च महाहिमवन्तः। पञ्च निषध(धा): । पञ्च नीला(:) । पञ्च रुक्मिणः । पञ्च शिखरिणः । चत्वार इषुकारपद्धताः॥
(८) पञ्चदश कर्मभूमयः । कतमा : ?। पञ्च भारतिकाः । पञ्चे ऐरावतिकाः । पञ्च महावैदि(देहि)काः । पञ्चोत्तरकौरविकाः । पञ्च देवकौरविकाः ।
[अत्रैवं पाठः सम्भाव्यते- " पञ्चदश कर्मभूमयः । कतमाः? । पञ्च भारतिकाः। पञ्च ऐरावतिकाः । पञ्च महावैदेहिका : । एताः पञ्चदश कर्मभूमयः ।।
त्रिशद भोगभूमयः । कतमाः? पञ्च हैमवताः । पञ्च हारिवर्षाः । पञ्च राम्यकाः। पञ्च हैरण्यवताः । पञ्च देवकौरविकाः । पञ्चोत्तरकौरविकाः ।] एतास्तुंस(स्त्रिंश)द् भोगभूमयः॥
(९) सप्त धर्मभूमयः । कतमाः? । रत्नप्रभा । स(शर्कराप्रभा । वालुकप्रभा। पङ्कप्रभा । धूमप्रभा । तमप्रभा । महातमप्रभा । एता(:) सप्त धर्मभूमयः॥
(१०) सप्त महानरकाः । कतमाः? । कालः । महाकालः । रौरवः । महारौरवः। असिपत्रवनम् । कूटशाल्मलिः । कुम्भीपाकश्चेति । एते सप्त महानरकाः ॥
(११) चतुर्दश कुलकराः । कतमाः ? सनुमतिः(?) प्रश्रुतिः । क्षेमंकरः। क्षेमन्धरः। सीमङ्करः । सीमन्धरः । विमलवाहनः । चक्षुष्मान् । यशस्वी । अभिचन्द्रः। चन्द्राभः । प्रसेनजित् । मरुदेवः । नाभिश्चेति । एते चतुर्दश कुलकराः ॥
(१२) चतुर्विंशति तीर्थकराः । कतमाः ? । ऋषभः । अजितः । सम्भवः । अभिनन्दः । सुमतिः । पद्मप्रभः । सुपार्श्वः । चन्द्रप्रभः । पुष्पदन्तः । शीतलः । श्रेयांसः । वासुपूज्यः । विमलः । अनन्तः। धर्मः । शान्तिः । कुन्थुः । अरु: । मल्लि: । मुनिसुव्रतः। नमिः । अरिष्ठनेमिः । पार्श्वः । वर्धमानश्चेति । एते चतुर्विंशतितीर्थकराः ।।
(१३) नव बलदेवाः । कतमाः? । विजयः । अचलः । सुधर्माः । सुदर्शनः । नन्दकः । नन्दिमित्र: । रामः । पद्मश्चेति । एते नव बलदेवाः ।।
(१४) नव वासुदेवाः । कतमा:?। त्रिपिष्ठः । द्विपिष्ठः । स्वयम्भूः । पुरुषोत्तमः। पुरुषसिंहः । पुरुषपुण्डरीकः । दत्तः । नारायणः । विष्णुश्चेति । एते नव वासुदेवाः ॥ . (१५) नव प्रतिवासुदेवाः । कतमाः ? । अश्वग्रीवः । तारकः । मेस्कः । निसु(शु)म्भः । बलिः । प्रह्लादः । मधुकोटकः । रामणः । जरासिन्धुश्चेति । एते नव प्रतिवासुदेवाः ॥
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(१६) एकादश रुद्राः । कतमाः? । भीमावलिः । जितशत्रुः । रुद्रः। विश्वानलः। सुप्रतिष्ठः । अचलः । पुण्डरीकः । अजितधरः । अजितनाभिः । प्रढालः। सातकिसुतश्चेति। एते एकादस(श) रुद्राः ॥
(१७) द्वादश चक्रवर्तिनः । कतमाः? भरतः । सगरः । मघवा । सनंतकुमारः। शान्तिः । कुन्थुः । अरु: । सुभूमः । पद्मः । हरिषेणविजयः । ब्रह्मदत्तश्चेति । एते द्वादशः। चक्रवर्तिनः ॥
(१८) नव निधय (:)।कतमाः? । नैसर्पः । माणवकः । पिङ्गलः । पाण्डुकः। कालः । महाकालः । पद्मः । शङ्खः । सर्वरत्नश्चेति । एते नव निधयः ।
(१९) चतुर्दश रत्नानि । कतमानि ? चक्रं । छत्रं । चर्म । मणिः । काकणिः। खड्ग । दण्डः। हयः । गजः । सेनापतिः। उपरोहित:(पुरोहितः) । ग्र(ग)हपतिः। स्थपतिः। कन्याश्चे(चे)ति । एवं चतुर्दश रत्नानि ।। (२०) द्विविधः पुद्गलः।स्कन्धः । परिमाण(परमाणु) श्चेत्येष द्विविध(:) पुद्गलः।।
इत्यर्हत्प्रवचने तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ।
चतुर्थोऽध्यायः॥ देवाश्चतुष्णिकायाः। भवनवासिनो दशविधाः।व्यन्तरा (अ)ष्टविधाः। ज्योतिष्काः पञ्चविधाः । वैमानिका द्विविधाः । कल्पस्थितिका अहमिन्द्राश्चेतिः। [पञ्चानुत्तराः । पञ्च जीवगतयः । षट् पुद्गलगतयः। अष्टविधश्चात्मसद्भावः । पञ्चविधं शरीरम् । अष्टगुणा रिद्धिः पञ्चेन्द्रियाणि । षट् लेस्या:(श्याः) । द्विविधं शीलम् ।
इत्यर्हत्प्रवचने चतुर्थं सूत्रं समाप्तम् ॥॥ (१) देवाश्चतुर्निकायाः।कतमाः? । भवनवासिनो(न:)।व्यन्तराः।ज्योतिष्काः। वैमानिकाः । एते चतुर्निकायाः ॥
(२) भवनवासिनो दशविधाः । कतमाः ? असुरकुमाराः । नागकुमाराः ।। सुवर्णकुमाराः । अग्निकुमाराः । वायुकुमाराः । स्तनितकुमाराः । विद्युत्कुमाराः । उदधिकुमाराः । द्वीपकुमाराः । दिक्षु(क्) कुमाराः । एते भवनवासिनो दशविधाः ।।
(३) व्यन्तरा [अष्टविधाः । कतमाः? । किनरः । किम्पुरुषः । महोरगः।। गन्धर्वः । यक्षः । राक्षसः । भूतः । पिसा(शा)चाश्चेति । एते व्यन्तरा (अ)ष्टविधा :॥
(४) ज्योतिष्काः पञ्चविधाः । कतमाः ? सूर्य(1)चन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्र प्रकीर्णकताराकाश्चेति । एते ज्योतिष्काः ॥
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(५) वैमानिका द्विविधाः । कल्पस्थितिका अहि(ह)मिन्द्राश्वेति । कल्पस्थति (काः) षोडस(श)विधा । कापिष्ठः । सु(शु)क्रः । महासु(शु)क्र:स(श)तारः । सहस्त्रारः। आणतः । प्राणतः । आरणः । अच्युतक श्वेति । एते कल्पस्थितिकाः ॥ अहमिन्द्रा नव (?दश)विधा । कतमाः? प्रथमा(म)प्रथमग्रैवेयकविमानवासिनः। प्रथममध्यमग्रैवेयक विमान वासिनः। प्रथमउपरिमौवेयकविमानवासिनः । मध्यमप्रथमग्रैवेयकविमानवासिनः। मध्यममध्यमवेयकविमानवासिनः।मध्यमउपरिमग्रैवेयकविमानवासिनः।उपरिम प्रथमग्रैवेयकविमानवासिनः । उपरिममध्यमग्रैवेयकविमानवासिनः । उपरिमउपरिमग्रैवेयक विमानवासिनः । अनुत्तरविमानवासिनश्चेति । एते अहमिन्द्रा । नव (दश?) विधाः ।।
नवानुदिसगाच्चय(?) कथ्यते ।"लच्छी अलच्छी मालिनी वैरे वैरोचने च बोधव्वा । सोमो य सोमरूए अक्के फलिहे य आइच्चो ॥" एते नवानुदिशा : ।। (?)
(६) पञ्चाऽनुत्तराः। कतमाः? विजयः।वे(वै)जयन्तः। जयन्तः। अपराजितः। सर्वार्थसिद्धश्चेति । एते पञ्चानुत्तराः ॥
(७) पञ्च जीवगतयः । कतमाः? । नरकगतिः । तिर्य(ग)गतिः । मनुष्यगतिः। देवगतिः श्चोति । चतु(त) । मोक्षगति गतयः संसारभ्रमणहेतुभूताः । पञ्चमी गति(:) कर्मक्षयजनिता अष्टगुणप्राप्तिहेतुः । एताः पञ्च गतयः ।।
(८) षट्पुद्गलगतयः।कतमाः?। पूर्वदक्षिणपश्चिमउत्तरऊर्ध्वअधस्तिर्य(ग)गतिः । एता(:) पुद्गलगतयः ।।
(९) अष्टविध आत्मसद्भावः । अस्त्यात्मा नित्यः । अनित्य : । अमूर्तः । सरीरः (शरीरी?) अख्मः।अकर्ता । गुणवान्। स(श)रीरगतः।संहरण विसथण(विस्तरण) धर्म(:) प्रदीपवत् । अनादिबन्धान् बद्धः।तद्विप्रयोगो मोक्षः। इत्येवं अष्टविधो(ध:) आत्मसद्भावः।।
(१०) पञ्चविधं स(श)रीरम् । कतमाः (मं) ? । औदारिकं । वैक्रियं । आहारका तैजसं । कार्मणं चेत्येवं पञ्चविधं स(श)रीरम् ।।
(११) अष्टगुणा रिद्धिः। कतमाः (मा)? । अणिमा । महिमा । लघिमा ।प्राप्ति। प्रागम्यः (प्राकाम्यं) । इसि(ईशित्वं । वसि(शि)त्वं ? कामरूपित्वं । सर्ववसि(शि) त्वमिति । एषा अष्टगुणा रिद्धिः ॥
(१२) पञ्चेन्द्रियाणि । कतमानि ? । चक्षुरिन्द्रियं । श्रोत्रेन्द्रियं । घ्राणेन्द्रियं ।
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रसनेन्द्रियं । स्पर्शनेन्द्रियं चेति । एतानि पञ्चेन्द्रियाणि भवन्ति ।।
(१३) षट् लेश्याः । कतमा:? कृष्णलेश्या । नीललेश्या । काका) पोतलेश्या। तेज(जो)लेश्या । पद्मलेश्या। शुक्ललेश्या । एते षट् लेश्याः ।।
(१४) द्विविधं शीलम् । कतमाः । (म)? । सामायिकाधिकरणं । केवलज्ञानं चेति ॥
इति अर्हत् प्रवचने चतुर्थोऽध्यायः समाप्त : ॥
[पञ्चमोऽध्यायः] त्रिविधो योगः । चत्वारः कषायाः । त्रयो दोषाः । पञ्चाश्रवाः । त्रिविधः संवरः। द्विविधा निर्जरा । पञ्च लब्धयः। चतुर्विधो बन्धः। पञ्च बन्धहेतवः।अष्टौ कर्माणि । द्विविधो मोक्षः । चत्वारो मोक्षहेतवः । त्रिविधो मोक्षमार्गः।। पं[च] विधा निर्गन्थाः । त्रिविधा(:) सिद्धा(:) । दादश सिद्धस्यात्(नु)योगद्वाराणि । अष्टौ सिद्धगुणाः । द्विविधा(:) सिद्धाः। वैराग्यं च ।।
इति अर्हत्प्रवचने पञ्चमसूत्रम् ॥
(१) त्रिविधो योगः। कतमः ? मनोयोगः । वाग्योगः । काययोगश्चेति । इत्येष त्रिविधो योगः।।
(२) चत्वारः कषायाः। कतमाः? क्रोधकषायः। मानकषायः । मायाकषायः। लोभकषायश्चेति । एते चत्वारः कषायाः ॥
(३) त्रयो दोषाः । कतमाः? । रागद्वेषमोहाश्चेति । एते त्रयो दोषा :॥
(४) पञ्चाश्रवाः । कतमाः ? हिंसाश्रवः । अनृताश्रवः । स्तैन्याश्रवः । । अब्रह्मचर्याश्रवः। परिग्रहाश्रवेत्येते पञ्चाश्रवाः ।।
(५) त्रिविधः संवरः । कतमः? । कायसंवरः । वाक् संवरः। मन:संवरश्चेति । एष त्रिविधः संवर :॥
(६) द्विविधा निर्जरा । कतमा ? । ज्ञाननिर्जरा । तपोनिज्जराश्चे(चे)र ति ।।
(७) पञ्च लब्धयः । कतमाः ? । दानलब्धिः । लाभलब्धिः । भोगलब्धिः। उपभोगलब्धिः । वीर्यलब्धिः । एताः पञ्च लब्धयः ॥
(८) चतुर्विधो बन्धः । कतमः? । प्रकृतिबन्धः । स्थितिबन्धः । अनुभागबन्धः। प्रदेशबन्धः। एष श्व(च)तुर्विधो बन्धः।।
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(९) पञ्चबन्धहेतवः । कतमाः ? । मिथ्यादर्शनं । अविरतिः । प्रमादः । कषाय(:)। योगश्चेति पञ्च बन्धहेतवः ॥
(१०) अष्टौ कर्माणि । कतमानि ? । ज्ञानावरणीयं । दर्शनावरणीयं। वेदनीयं । मोहनीयं । आयु(:)। नाम । गोत्रं । अन्तरायश्चेति ॥ यस्योदयात् ज्ञेयं वस्तु न जानाति तत्(द) ज्ञानावरणीय(य)नामकर्म ।जे(ये)नजीवा(:) पुण्यपापाश्रवबन्धनिर्जरामोक्षादिलक्षणान् सर्वभावं(वान्) न पश्यति(न्ति) तदर्शनावरणीयं नाम कम । यस्योदयातु(त्) स(शा)रीरं मानु(न)संदुःखं उदीर्यते तत्(द्) वेदनीयं नाम कर्म । येन क्रोधलोभमानमायारतिऽरति(रत्यरति)शोकभयजुगुप्सादीनि उदीर्यते(न्ते) तत्() मोहनीयं नाम कर्म । येन नरकतिर्यग्मनुष्यामरेषु दीर्घ हुस्वं वा कालं तिष्ठति तदायुर्नाम कर्म । येनाङ्गप्रत्यङ्ग स(श)रीरं संस्थानं विरूपं स्वरूपं वा निवर्तयति तन्नाम कर्म । येन तिर्यग्मनुष्यामरेषु उच्चं नीचं वा स्थानं निवर्तयति तदाऽन्तरायं (तद्गोत्रं) नाम कर्म।येन दानलाभभोगोपभोगवीर्यानि(णि) नोत्पद्यन्ते तदन्तरायं नाम कर्म । अत्र श्लोकाः -
यस्योदयेन जीवो जीवा विज्ञेय कर्म शुभाशुभम् । (?) ज्ञानावरणमाख्यातं सर्वज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः । यस्योदयात् सा(दयवशा)ज्जीवो भावाभावं न पश्यति । दर्शनावरणं प्राहुः सर्वज्ञा मुनिसत्तमाः ।। सुखं वा यदि वा दुःखं वेदयन्ति हि येन ता(ते) वेदनीयं तदित्याहुः सर्वज्ञास्तत्त्वदर्शिनः ।। कषाया नोकषायाश्च मिथ्यादर्शनमेव च । मोहनीयं तदित्याहुः सर्व्व(ज्ञा)स्तत्त्वदर्शिनः ।। जायते मृ(म्रि)यते चैव जीवा [य]स्योदयेन त्(तत्) । आयुष्यं नाम तत् कर्म प्राहुरेव मनीषिणः ।। स्वरूपो[वा] विरूपो वा सुभगो दुर्भगोऽपि वा । कर्मणा जायते येन नामकर्म(म) तदुच्यते ।। जघन्यमथवा श्रेष्ठं येन गोत्रमवाप्यते । ऐश्वर्यं प्रेष्यभावश्च गोत्रकर्म तदुच्यते ।। येन लाभो न[ल]भ्येत कर्मकर्मार्थसंचित : (?) न चोपभु( )क्ते संप्राप्तः अन्तरायः स उच्यते ।।
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सु (शु) भानां कर्मणां हेतुः सु (शु) भ एव स्मृतो बुधैः । अशुभानां चाशुभ: प्रोक्त(तो) जिनेन्द्रैस्तत्त्वदर्शिभिः ॥
(११) द्विविधो मोक्षः । कतमः ? । देशमोक्षः । सर्व्वमोक्षश्चेति ।
देशमोक्षोनाम सासन (सास्वादन ?) सम्यग्दृष्टयादिसयोगकेवलिपर्यन्तः। सर्व्वमोक्षो नाम अजो (यो) गकेवली सिद्धश्चेति ॥
(१२) चत्वारो मोक्षहेतवः । कतमा: ? । सम्यग्दर्शनं । सम्यक् ( ग्) ज्ञानं । सम्यक्चारित्रं । सम्यक् तपश्चेति ॥
(१३) त्रिविधो मोक्षमार्गः । कतम : ? । सम्यग्दर्शनं । सम्यग्ज्ञानं । सम्यक् चारित्रमिति ॥
(१४) पञ्चविधा निर्ग्रन्थाः । कतमा: ? । पुलाकः । बकुस (श) : । कुसी (शी) लः। निर्ग्रन्थः । स्नातकश्चेति ॥ यः स्थित्यादिकरणकारणोद्युक्तः मार्गप्रभावकः सप्रतिकारी प्रशस्तवचन: कुशलः सर्व्वज्ञप्रतिष्ठापनः पूजादीनां कर्ता कारयिता च स पुलाको नाम । यो मतिश्रुतप्रतिपादनमार्गप्रभावना (नो) द्युक्तः अर्हन्सु (त् शु) द्धसील: (शील) कथाभिलो(र्लो) क परिपाटी प्रथमानुयोग वाचकः यथाशक्ति तपस्त्यागकर्ता विनयशीलो अन्य (न्यं) समुपदिश्य प्रवर्तकः अर्हदाचार्यबहुश्रुत प्रवचनं (न) भक्ति स्तुतिवन्दनालोचनप्रतिक्रमणकायोत्सर्गाणां कारकः सुप्रसन्न ( : ) परिहारसंज (य) मधरः स एष बपु (कु) शो नाम । ईषत्पण्डितशीलः कुशीलः दयापरः परमकारुणिकः सर्व्वभूतमैत्रीपरायणः अत्यन्तसूक्ष्म सा(स) म्परायसंज(य)मधर: द्वादशाङ्ग चतुर्द्दशपूर्व्वपारगः घोर वीरतपश्च[र]णोद्युक्तः स एष कुशीलो नाम । बाह्याभ्यन्तरग्रन्थार्थपरित्यागी । बाह्यपरिग्रहः क्षेत्रव (वा) स्तुहिरण्यधनधान्यकुप्यपसु (शु) पाल्यपुत्रदाराभिः । अभ्यन्तरप (रि) ग्रहः क्रोधमानमायालोभमात्सर्यक्रीड(डा) - रतिशोकभयजुगुप्साहास्यप्रमत्तयोगप्रत्याख्यानर्हिसानृतस्तेयमैथुनपरिग्रहादिग्रन्थपरित्याग
शीलः । चतुर्ज्ञानसम्पन्नो लब्धिप्राप्तः शुक्लध्यानपरः निर्ममो निरहङ्कारः उत्तमसंज (य) मधरः विशुद्धलेश्यः स एष निर्गन्थो नाम । परमेश्वरः सर्व्वज्ञो लोकालोकविचारकः चतुस्त्रिंशदतिशयलब्धिप्राप्तः अष्टमहाप्रातिहार्यसमन्वितः स एष स्नातको नाम । एते पञ्चविधा निर्ग्रन्थाः ॥
(१५) त्रिविधाः सिद्धाः । कतमा: ? । क्षेत्रसिद्धाः । कालसिद्धाः । भावसिद्धाश्चेति । तत्र ये पञ्चदशकर्मभूषिषु जाता ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्लोकेषु सिध्यन्ति ते क्षेत्रसिद्धाः । ये उत्सर्पिण्यो (ण्यां ?) जाता: तीर्थेषु एकसमयसिद्धा द्विसमयसिद्धा (:) तृ (त्रि) चतुरसंख्येय
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समयसिद्धाः ते कालसिद्धा नाम। ये अष्टविधकर्म्मविनिर्मुक्ता (:) सिद्धि प्राप्ता: ते भावसिद्धा नाम । एते त्रिविधा (:) सिद्धाः ॥
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(१६) द्वादश सिद्धस्यानुयोगद्वाराणि । कतमानि ? । कालो (ल: ) । गतिः । लिङ्गः (ङ्गम्) तीर्थ (म्) । चारित्र : (त्रं) । प्रत्येकबुद्ध: । बोधितबुद्धः । ज्ञानावगाहनं (ज्ञानम् । अवगाहना ।) अनांतरं (अन्तरं) । संख्या अल्पबहुत्वतश्चेति (त्वं चेति ) । एतानि द्वादश सिद्धस्यानुयोगद्वाराणि ||
(१७) अष्टौ सिद्धगुणाः । कतमा: ? । अनन्तदर्शनं । अनन्तज्ञानं । अनन्तवीर्यं । अनन्तसुखं । सूक्ष्मत्वं । अनन्तावगाहः । अग (गु) रुलहु (घु) त्वं । अव्याबाधश्चेति । एते अष्टगुणाः ॥
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(१८) द्विविधा ( : ) सिद्धा: । कतमा ? | मोहान्तराय [ज्ञान] दर्शनावरणीयक्षयात् कैवल्यप्राप्तिसिद्धाः | आयुर्नामगोत्रवेदनीयक्षयात् स्वातकसिद्धाश्चेति ॥ तत्र मोहो नाम द्विविधः । चारित्रमाह (हो) दर्शनमोहश्चेति । चरित्रमोहक्षयात् (द्) वीतरागो भवति । दर्शनमोहक्षयात् सम्यग्दृष्टिर्भवति । अन्तरायक्षया ((द्) दिव्यानि दानलाभभोगोपभोगवीर्याण्युपद्यन्ते । ज्ञानावरणीय क्षयात् सर्व्वज्ञो भवति । दर्शनावरणीयक्षयात् सर्व्वदर्शी भवति । आयुष्यकर्म्मक्षयात् (द्) जन्ममरणव्याधिविनिर्मुक्तो भवति । नामकर्म्मक्षयात् (द्) औदारिकवैक्रियाहारकतैजसककार्मणशरीरं (र) तत्त्वविनिर्मुक्तो भवति । आकास (श) - वदमूर्तश्चक्षुरग्राही ज्योजावघ ( ? ) रूपो भवति । गोत्रकर्मक्षयात् सदेवासुरमनुष्यलोकस्योत्तमस्थानं प्राप्नोति । वेदनीयकर्मक्षयात् सुखदुःखाभ्यां विनिर्मुक्तो भवति । केवलमव्याबाधं सम्प्राप्तो भवति । लोकाग्रे प्रतिष्ठितो अदेही शाश्वतो वक्तो ( मुक्तत्रे) अमरो अजरो निरंजनो भवति । एते षट् (? द्विविधाः सिद्धा भवन्ति ॥
इत्यर्हत्प्रवचने पञ्चमोऽध्याय समाप्तः ॥
मङ्गलं महाश्रीः ॥ ॥
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________________ कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्य नवम जन्मशताब्दी स्मृति शिक्षण-संस्कार निधिनां प्रकाशनो 1988 त्रिषष्टिशलाकापुरुपचरितमहाकाव्य-ग्रन्थ 1 संपा. मुनि चरणविजयजी 1987 (पुनर्मुद्रण) ग्रन्थ 2 संपा. मुनि पुण्यविजयजी Studies in Des'ya Prakrit H. C. Bhayani हेमसमीक्षा (पुनर्मुद्रण) मधुसूदन मोदी हेम स्वाध्यायपोथी (डायरी) स. मुनि शीलचन्द्रविजय 1989 हेमचन्द्राचार्य कृत अपभ्रंश व्याकरण (सिद्धहेमगत) (द्वितीय सस्करण) सपा. हरिवल्लभ भायाणी 1993 विजयपालकृत द्रौपदीस्वय'वर आद्य सौंपा. जिनविजयजी मुनि 1993 (पुनर्मुद्रण) संपा. शान्तिप्रसाद पौंडया कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्य स्मरणिका 1993 अनुसौंधान-१ (अनियतकालिक) 1993 " 2-3-4 1994 अपभ्रंश व्याकरण (हिन्दी अनुवाद) प्रा. बिन्दु भट्ट 1994 आवश्यक-चूर्णि सौंपा. मुनि पुण्यविजयजी मुद्रणाधीन सहायक रूपेन्द्रकुमार पगारिया प्रवंधचतुष्टय संपा. रमणीक शाह 1994 नेमिनंदन ग्रंथमाळानां हमणांनां प्रकाशन अलंकारनेमि मुनि शीलचन्द्रविजय 1989 हेमचन्द्राचार्यकृत महादेवबत्रीशी-स्तोत्र ___ संपा. मुनि शीलचन्द्रविजय 1989 श्रीजीवसमास प्रकरण टीकाकार मलधारी हेमचन्द्रसूरे सपा. मुनि शीलचन्द्रबिजय 1994 , (गुजराती अनुवाद) च. ना. शिनोरवाला 1994 प्राप्तिस्थान : सरस्वती पुस्तक भंडार, हाथीखाना, रतनपोल, अहमदाबाद-३८०००१