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________________ (४०) शत्रुजयमंडन ऋषभदेव-स्तुति - मुनि भुवनचन्द्र अपभ्रंश मिश्रित जूनी गुजराती भाषानी आ कृति कुल त्रण हस्त प्रतोना आधारे यथामति शुद्ध करीने अहीं आपी छे. कोई पण प्रतिमां लेखनसंवत अपायो नथी। त्रणे प्रतिओ खंभातना श्री पार्श्वचन्द्रगच्छ जैन संघना ज्ञानभंडारनी छ । प्रति क्रमांक ३८-५८५ अनुमानतः पंदरमां सैकानी जणाय छ। आ प्रतनी विशिष्टता ए छे के 'न'कारथी शरू थता शब्दोमां आमां 'न' ने स्थाने 'ल' जोवा मळे छ। आ प्रतमां प्राकृत 'शत्रुजय कल्प' पण छे, तेमां पण आवं परिवर्तन देखाय छे। जो के बधे स्थले आ नियम सचवायो नथी। २४-३७६ क्रमांकनी प्रतिमां विविध प्रकरणो साथे आ कृति पण संगृहीत छे अने ते संभवतः १६मी सदीमां लखायेली लागे छ। क्रमांक ३८-५८४ नी प्रति १७ मा सैकानी जणाय छ। त्रणे प्रतिओ अशुद्ध छ । आना कर्ता तपागच्छे विजयदानसूरिशिष्य 'वासणा' साधु छे. एमनो समय ई. १६मो सैको होवानु नोंधायुं छे. आ माटे 'जैन गुर्जर कविओ'-१, पृ. ३६३, (प्र. ई. १९८६, म.जै.वि., सं. जयंत कोठारी) तेमज 'गुजराती साहित्यकोश' (मध्यकाल) पृ. ३९९ (प्र. ई. १९८९, गु.सा.प.) द्रष्टव्य छे. पहिलउं पणमिअ देव परमेसर सेत्तुंज-धणीअ पयपंकयरय-सेव रंगिहि विरचिसु तसु तणिअ जिणवर मह नह ठाणु नाण-झाण-वित्राण जओ ?' बालक परि विन्नत्ति बहु भोलिम तुह करिसु तओ ततु ॥१ दिणयर जिम तुम्हि देव निम्मल केवल किरणधर तिहिं भुवणिहिं तिहिं कालि सयल-पयत्थ पयासकर पंचसय तियसट्ठ मिच्छाईअ पगई य पमुह जोणिलक्ख कुलकोडि तहुवि हु जंपिसु दीणदुह ॥२ सामिअ सासोसासि भव सवा सत्तरि सहिअ संपूरंतु निगोदि हुउं अणंत पुग्गल रहिअ १. कतु । २. ततु । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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