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३. चार मूर्खाओ
रत्रचूड-रास' (कर्ता रत्नसूरि -शिष्य, रचनाकाळ इ.स. १४५२. माएं संपादन, एल.डी.सिरीझ क्रमांक ६३, १९७७)मा आवती दृष्टांतरूप आडकथाओंमां चार मूर्खानी कथा (पृ. ३५-३९, कडी २५९-२९०, भूमिका, पृ. १८) उपर में 'मध्यकालीन गुजराती कथाकोश'मां एक नोंध आपी छे (पृ. ३६८-३६९) अने तेनो आधार विनिट्झनो भारतीय साहित्यनो इतिहास (ग्रंथ २, पृ ३६४-३६५) होवानो त्यां निर्देश को छे. विटि ट्झे ए माहिती माटे मिरोनोवे अमितगतिकृत 'धर्मपरीक्षा' उपर १९०३मां प्रकाशित करेल संशोधनग्रंथमाथी लीधी हती. अमितगतिनी 'धर्मपरीक्षा'नो समय ई. स. १०१४ छे, अने तेनी पुरोगामी कृति छे हरिषेणकृत 'धम्मपरिक्ख' ते अपभ्रंश भाषामां छे अने तेनो समय छे इ. स. ९८८. तेमां पण उपर्युक्त चार मूर्खकथाओ आपेली छे. (संधि ३, कडवक १२-१९)* हरिषेणनी 'धम्मरिक्ख' भागचंद्र जैन. माधव रणदिवे वडे संपादित कराई १९९०मां प्रकाशित थई छे. आ पहेला आ.ने. उपाध्येए एक लेख द्वारा तेनो परिचय आप्यो हतो (१९४१नी अखिल भारतीय प्राच्यविद्या परिषदमां रजू थयेलो तेमनो लेख भांडाकर इन्स्टिट्युटना जर्नलमां प्रकाशित थयो हतो). भागचंद्र जैने पुस्तकनी भूमिकामां 'धर्मपरीक्षा ' नामक कृतिओनी परंपरा विशे विगते माहिती आपी छे (पृ. २-५) तेमां १७ रचनाओ गणावी
'धर्मरत्नकरंडक' (रचना समय १११६)मा जे ताराचंद्रनी कथा आवे छे ते रत्नचूडनी कथाने घणी मळती आवे छे. तेमां यमघंय गणिकाने बदले त्रिलोचन नामनो प्रज्ञाचक्षु ब्राह्मण बधा उकेल आपे छे. तेमां 'रत्नचूडरास'नी पेटाकथाओ नथी.
४. गामडाह्यानो अज्ञानविलास : होदड जोषी
शुभशीलगणिकृत 'पंचशती-प्रबंध(के प्रबोध)-संबंध' ए कथाग्रंथमां (रचनासमय ई. स. १४६५) १५३मी कथा (पृ. ९७-९८ )नो अनुवाद नीचे प्रमाणे छे :
__ *तेमां आ चार मूर्खानी कथा दस मूर्खकथाओमां छेल्ली छे. बाकीनी नव कथा ते रक्तमूढ, दृष्टिमूढ, मनोमूढ, व्युद्ग्राहिमूढ, पित्तदूषित मूढ, आम्रमूढ, क्षीरमूढ, अगस्मूढ अने चंदनमूढनी कथाओ छे.
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