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________________ (६५) ३. 'स्थूर' विषे बे वधु उल्लेखो : 'स्थूल' अर्थवाचक 'स्थूर' शब्दना साहित्यगत प्रयोगो दुर्लभ होवानु अगाउ (अनुसंधान-३) जणावेलुं, अवगाहन वधतां तेना थएला वधु ने वधु प्रयोगो जडी आव्या छे, ते आ प्रमाणे : १. आ. हरिभद्रसूरि (विक्रमनो आठमो शतक) कृत 'पंचसूत्रक-सवृत्ति'मां वृत्तिमां आवो पाठ छे : स्थूरप्राणातिपातविरमणं, स्थूरमृषावादविरमणं, स्थूरादत्तादानविरमणं, स्थूरमैथुनविरमणं, स्थूरपरिग्रहविरमणम्॥ __ (सं. जंबूविजयजी, दिल्ही, ई. १९८६, पृ. २६). . २. आ. मलयगिरि (११-१२ मो शतक) कृत 'सप्ततिका-वृत्ति'मां पाठ छे : ताश्च किट्टयः परमार्थतोऽनन्ता अपि स्थूरजातिभेदापेक्षया द्वादश कल्प्यन्ते ।। (सं. मुनि चतुरविजय, भावनगर, सं १९९६, पृ. २६०) ४. 'नखच्छोटिका', 'ढौक', 'सुखासिका' / 'दुःखासिका', 'ललते' १. नवमा शतकना जैनाचार्य सिद्धर्षिए रचेल 'उपमितिभवप्रपंचा कथा' मां 'चपटी वगाडवी' ए अर्थमां आवो प्रयोग को छेः 'ददाति नखस्फोटिकां' ( उप. प्र. कथा, सं. चन्द्रशेखरविजय, सं. २०२४ अमदाबाद) जो के पाछळथी आ ज प्रयोग अन्यत्र आ रीते थयो जोवा मळे छ : "नखच्छोटिकामात्रेण " -आ. मलयगिरि 'सप्ततिकावृत्ति', भावनगर, सं. १९९६, १४६ तथा आ. देवेन्द्रसूरि , कर्मविपाक टीका, भावनगर, सं १९९०, २८ बन्नेना संपा. मुनि चतुरविजयजी. २. 'ढौकङ् गतौ' ( सि. ६२७, गण १) धातुनो प्रयोग जैन ग्रन्थकारोए ज वारंवार को जणाय छे. 'ढोवू-' 'ढोकवू' एटले 'धरवू'; 'ढूंकवू' एटले 'पासे जवु', 'फरक्वं' इत्यादि अर्थोमां प्रयोजायेलो आ धातु अन्यान्य ग्रंन्थोमां आम प्रयोजायेलो जोवा मळे छे : Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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