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________________ निवेदन 'अनुसन्धान' धीमी गतिए पण आगळ वधी रह्युं छे, ए बदल सहज परितोष अनुभवाय छे. प्रथम त्रण अंको सुधी तेनी नकलो संशोधनना क्षेत्रमां कार्य करनार अनेक मुनिवरो, विद्वानो, अभ्यासीओने तेम ज पत्रपत्रिकाओ तथा संस्थाओने मोकलवामां आवेली. चोथा अंकथी ते प्रथामां थोडीक मर्यादा आंकी, अने केटलांक स्थळे ए अंक भेट मोकल्यो, तेमां एक छापेल पहोंच धरावतुं कार्ड पण मोकल्युं. खेदनी बाबत एटली आ कार्डमा पोताना हस्ताक्षर करी टिकिट लगाडी पार्छु मोकलवानी चीवट पण, पांचछ व्यक्तिने बाद करतां, कोई राखी नथी ! अने प्रथमना त्रण अंको मेळवनाराओ पैकी कोईनी, चोथो अंक प्रकट थयो के नहि ?/ थशे के नहि ?/ थाय त्यारे मोकलशो के नहि ?, आवी पडपूछ पण आवी नथी. 'अनुसन्धान' अनियतकालिक छे, अने ट्रस्टनी आर्थिक जोगवाईने आधीन तेनी प्रकाशन-वितरण-व्यवस्था होय छे, एटले लवाजमनो तो कोई प्रश्न ज नथी; छतां आटली बधी उदासीनता केम हशे ? तेवो प्रश्न, आ स्थितिमां, कोईने पण थाय खरो. 1 अस्तु. फरी एकवार जाहेर करीए के आ पत्रिका संशोधनात्मक पत्रिका छे. ऊहापोह संशोधननो पायो छे. आमां आ आम ज होय/हतुं / हशे एवा वलणने कोई अवकाश न होय. आ दृष्टिने लक्ष्यमां राखी अभ्यासीओ आ पत्रिकामां रस ले ते अपेक्षित छे. - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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