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________________ (४५) अट्ठमि-तप ध्यान अखंड, करइ कर्म कठिन शतखंड। ३ वानर-लंछन पय स्वामी, नमुं अभिनन्दन शिवगामी। अट्ठमि-तप ध्यान-समुद्द , विस्तारण चंद्र अमद (अमुद्द) ॥ ४ श्री सुमतिनाथ मुख दीठइ, भवभवनां पातिक नीठई। पय-लंछन क्रौंच विराजई, अट्ठमि व्रतवंत निवाजइं॥ ५ पद मोहें लंछन-पद्म पद्मप्रभ यलइ छद्म। अट्ठमि-तप योग समाधि, दिइ दर्शन रहित-उपाधि ।। ६ स्वस्तिक-लंछन सविआस, पूरइ जिनराय सुपास। अट्ठमि-तप ध्यान-प्रभाव, भव-सायर-तारण नाव॥ ७ चंद्रप्रभ आठमो देव, करि लंछनमिसि विधु सेव। अट्ठमि-तप ध्यान-विधाता, एहवो अवर न को वर-दाता ।। ८ श्री सुविधि सुविधि सम-कंदो, जिन मकर-लंछन नित वंदो। अट्ठमि-तप उज्ज्वल ध्यान, जिनमंडल सोहइं प्रधान।। ९ शीतलजिन शीतलवाणी श्रीवच्छ-लंछन गुण-खाणी। जस अट्ठमि-व्रत उपदेशइ, नवि कर्म टकइ लवलेशइं॥ १० इग्यारमो श्रेयांसदेवो, खड्गी-लंछन भवि सेवो। अट्ठमि-तप ध्याननी धारा, हुइ जेहथी अचल अपारा॥ ११ वासुपूज्य जपो जग-भांण, पाय-लछंन महिष प्रमाण। अट्ठमि-तप सहज सनूर, करें चिदानंद भरपूर।। १२ शूरक-लंछन जिन विमल, मन-मांहि रमो गुण अमल। अट्ठमि-तप आठ प्रदेश -सरखा करें जेह असेस॥ १३ सींचाणो-लंछन पाय, समरुं ते अनंत जिनराय। अट्ठमि-तप जेहथी जांणो, अड-योगई दिट्ठि सपराणो॥ १४ वज्र-लंछन धर्मजिणंद, अट्ठमि-तप-कमल-दिणंद। रतन-त्रय वदति अभे(खे ?)द, तस साधन दाखई अभेद॥ १५ मृग-लंछन शांतिजी ध्यावो, अटुमि-तप-फल शिव पावो। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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