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थोडो अंश छपायो छे. मध्याकालीन गुजराती भाषानी दृष्टिए आ कृति समृद्ध छे ज, वार्तारस अने साहित्यतत्त्व पण एमां सारी पेठे छे.
कृतिमा एक प्रयोगे मारुं ध्यान खेंच्यु. कृतिनी कडी २७, ६१, ८६ मां नकारना अर्थमां 'मन' शब्द वपरायो छे : 'ते वर मई मन देसि', 'तु आहेडइ मन जाएसि', 'मृगला मन हाणेसि'. नकारवाचक म अने न जाणीतां छे, अहीं ए बेनो संयुक्त प्रयोग थयो होय तो एक विशिष्ट रूढप्रयोग तरीके तेनी नोंध लेवावी जोईए. आवो प्रयोग आ समयनी अन्य कृतिओमां मळे छे के केम ते तपासवं रह्यं. न मळतो होय तो अहीं छपायेलो पाठ वाचननी के मुद्रणनी भूल होई शके. ए ठेकाणे 'मम' एवो द्विरुक्त मकार होय अथवा 'मत' एवो हिंदी असरवाळो शब्द होय एवी संभावना पण छे. जो के कृतिनुं समग्र स्वरूप जोतां ते एवी असरथी मुक्त जणाय छे.
बीजो एक ध्यानपात्र शब्द छे. चात्र'. ए बे ठेकाणे वपरायो छे. 'कीधी राई वचन मझ चात्र' (कडी ६२) अने 'माहरां वचन म करिसिउ चात्र' (कडी ९३) अर्थ स्पष्ट थाय छे. आजनी गुजरातीमा 'चातरतुं' क्रियापद वपराय छे. तेनुं मूळ आ 'चात्र' शब्दमां जोई शकाय छे. विशेषता ए छे के अहीं ते स्त्रीलिंग नाम तरीके वपरायो छे.'राजाए मारुं वचन चात्र कर्यु', 'चात्र न करजो'.
पृष्ठ ७७, उपरथी त्रीजी पंक्तिमा 'कित्तावा (?) सुरपुरि गया' एम छे. अहीं वाचनभूलना कारणे प्रश्नार्थ उभो थयो होवानी शंका जाय छे. 'कित्ता वासर पुरि गया' एटले के 'केटलाक दिवस नगरमां वीत्या' एवो पाठ, संदर्भ जोतां कल्पी शकाय छे.
-मुनि भुवनचन्द्र हमणां ज मारा ध्यानमां आव्यु के अपभ्रंशमां नकारवाचक 'मण' छे. एज जूनी गुजरातीमां ऊतरी आव्यो हशे. आथी एक तरफ अपभ्रंश साथे गुजरातीनो सीधो संबंध स्थापित थाय छे. बीजी तरफ प्रस्तुत बालावबोधनी प्राचीनता घणी वधारे सिद्ध थाय छे. (१५ मी सदीना अंतभागमा करतां घणो वहेलो होई शके.)
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