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________________ (७५) 'मा'राज, में तो छाणनो पोदळो जोयो, ने मालीपा कीडा खदबदता जोया'. "हे भाई , एनां घेरो जण्यांनी दशा तो ए पोदळामां खदबदता कीडा जेवी जाणजे; जा, तने एक दीकरो दउं छु. पण दीकराने भणावीश मा, ने भणाव तो परणावीश मा.' बामणने तो विचार थई पड्यो छे. एना मनमां तो थयु के 'ठीक जीवता, अयणे तो दिकरो लई लेवा दे ! पछीनी वात पछी जोवाशे.' __ स्वस्ति कहीने बामण तो घेर गयो छे. गोराणीने तो महीना रह्या छे. नव महिने दुधमल दीकरो आव्यो छे. दीकरो तो दिए न वधे एवो राते वधे, राते न वधे एवो दीये वधे छे; अदाडे ऊझर्यो जाय छे. हां हां करतां तो दीकरो छ महिनानो, बार महिनानो , बे वरसनो थयो छे. एने तो रमाडे छे, खवरावे ने पीवरावे छे. दीकरो तो शो मोंघो ! शो मोंघो ! कोई वात नहीं एवो मोंघो! सात खोट्यनो एक ज दीकरो. एम करतां तो दीकरो पांच वरसनो थयो छे. माबापने तो विचार थयो छे के अरेरे, दीकराने नहीं भणावीए तो पेट खाशे शुं ? ने नहीं परणानीए तो वसती रे'शे शुं ? दीकराने तो निशाळे बेसार्यो छे. दीको बार वरसनो थयो त्यां तो भणीगणीने बाजंदो थयो छे. एने तो नाळियेर आवतां थयां छे . पण मा देवजीनी तो दुवाई छे के - दीकराने भणावीश मा, ने भणाव तो परणावीश मा. गोर-गोराणी तो विचार करे छे, के पूतरने नहीं परणावीए तो वसती रे'शे शुं ? आ कथाघटक शामळ भट्टनी 'सिंहासनबत्रीसी'नी वीसमी वार्ता 'वेताल भाटनी वार्ता'मां शरूआतना भागमां मळे छे. (फा. गु. सभावाळी आवृत्ति, १९९५ पृ. १९६-१२१, कडी ३२-९०). तेनो ढूंको सार मध्यकालीन गुजराती कथाकोशमांथी उद्धृत करूं छु (पृ. २९२) : कनोजनो भीम भाट शेषनागनो भाट होवाथी करोडपति हतो, पण वांझियो हतो. तेणे देवळमां जई शिवपूजन कर्यु. स्वप्नमां आवी शिवे का : 'तारा पूर्वजन्मनां पाप आडां आवे छे.' भीमे घरे आवीने घणां दानपुण्य अने होमहवन कर्यां, अने फी वनमा जई शिवदहेरे एक वरस तप कर्यु. एवामां एक अपुत्र माछीमारे शिवने माथे माछलां पछाडवानी धमकी आपी, एटले शिवे तेने पांच पुत्रनुं वरदान आप्यु. आ जोईने अन्यायथी दुःखी थयेलो भाट पोताना पेटमां पाळी मारवा जतो हतो, त्यां शंकरे तेने वार्यो अने छाणना पोदळामां खदबदता कीडामांथी पांच पापिया जीव माछीमारने आप्या होवानुं जणाव्यु. वळी का के, तारा तपने योग्य Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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