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Lienhard on his 70th Birthday. Edited by M. Juntunen, W. L. Smith, C. Suneson. Stockholm, 1995, pp 5-26.
नलिनी बलबीरे आ लेखमां प्राकृत साहित्यमां थयेला, यमक नामा शब्दालंकारना एक प्रकार 'संदृष्ट' के 'शृंखला' यमकना प्रयोगो विशे माहिती आपीने स्वरूप, भेदो, इतिहास वगेरे दृष्टिए चर्चा करी छे. मुख्यत्वे 'सूत्रकृतांग', 'सेतुबंध', विमलसूरिकृत 'पउमचरिय', 'कुवलयमाला', 'समराइच्चकहा', 'लीलावई कहा', 'चउपनमहापुरिसचरिय', 'पुहइचंदचरिय' वगेरेमां मळतां उदाहरणो तरफ ध्यान खेंच्यु छे. एक छेडे 'ऋग्वेद मां (१०, ८४) तो बीजे छेडे आज पण प्रचलित अंतकडी के अंत्याक्षरीमा : ते 'प्रतिमाला' के 'भंडी' तरीके इसवी पहेलीथी वीशमी शताब्दी सुधी होवानुं पी. के. गोडेओ एक लेखमां बताव्युं छे) ए साहित्यिक रचनायुक्ति जाणीती होवानी पण नोंध लीधी छे. शृंखलायमकथी 'लाटानुप्रास' अलंकारनु स्वरूप अने आस्वाद्यता जुदां होईने ते बनेने एक खानामां नाखवानी लेखिकाए भूल करी छे. जूनी गुजरातीनां वसंतवर्णनना फगुप्रकारनां काव्योमा मध्ययमक (पूर्ववर्ती चरणना अंतने अने पछीना चरणना आदिने प्रत्येक पद्यार्धमा जोडतुं) लाक्षणिक छ - अने तेना अनुसरणमां रचायेल थोडाक संस्कृत फग-काव्योमां पण तेनो प्रयोग थयो छे. कालिदासे पण 'रघुवंश'ना नवमा सर्गमां, आगळ जतां वसंतवर्णन कर्यु छे तेथी, १ थी ५४ पद्योमा चोथा चरणमां आरंभे यमकनो प्रयोग को छे.
प्रकाशन-माहिती
आचारांगसूत्र - प्र.श्रु., बालावबोध
कर्ता : श्री पार्श्वचंद्रसूरि. रचना : विक्रमनुं सोळमुं शतक. संपादक : श्री अमृत लालभाई भोजक, अमदावाद. प्रकाशक : श्री पार्श्वचंद्रसूरी साहित्य प्रकाशन समिति, मुंबई, ग्रंथमालाना संपादको : मुनिश्री भुवनचंद्रजी, डो. गुलाब देढिया, भरत
सी. शाह.
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