SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 44
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (309) साधुतणी किरीया दिन पंच । ते पण पाली मन अखलंच ॥ ४८ ॥ सुख समाधई रूडइ ध्यान । कीधुं अणसण तणुं विधान । देवंगत थया वीरो इंम । गुण वरणवी सकुं हुं किम ॥ ८३ ॥ वीरा साधुतणी मांडवी | युगति घणी कीधी नवनवी । निहरण कारज विधस्युं कीध । सुत शिवजी लाहो लीध ॥ ५० ॥ केही करूं वीरा जोडली । गुण घणानई मति थोडली । सेवक इणिपरि करइ अरदास । वीरा संतति पुंहचइ आस ॥ ५१ ॥ इति श्री दोसी वीराकृत सुकृतसंचय चउपई संपूर्णा ॥ 1 पछइ सेठ शिवजी दोसीइं सामला पार्श्वनाथनुं देहरुं पूरुं कराव्युं । केतलाइक गृहिस्थनी सांनिधि । शत्रुंजयादिक तीर्थनी घणी यात्रा करी साहम्मीवत्सलादिक घणां कर्यां घणुं जिनशासनना प्रभावक थयां। घणुं निज देवगुरुना भक्त थया । तिहार पछी सुत मेघजी दोसी शेठ थया घणुं शासनना प्रभावक । घणी यात्राना कारक । स्वज्ञाति भोजनकारक । कृत साटिका पहिरामणी । घणुं मर्यादी जैन श्रावक थया । तत्सुत दोसी चांपइ । जयतसी प्रतापसी । तिलकसी । प्रेमो | दोसी अखईई भलीपर सेठी करी घणुं निजदेवगुरुना रागी थया । जिनशासन प्रभावक तिहार पछी दोसी श्री जयतसी सुत दोसी श्री तेजसी शेठ थया । तत् कृत सुकृत ... । संवत १७७४ वर्षे ज्येष्ट सुदि ८ सोमे । पत्तन मध्ये । श्री श्रीमाली ज्ञातीय । दोसी श्री वीरासुत । दो। श्री शिवजी सुत । दो। श्री मेघजीभार्या सहिजूबाई सुत। दो । श्री जयतसी भार्या रामबाई सुत दोसी श्री तेजसीभार्या देव बाई सुता पुंजी १ सुत गुलाब । द्विभार्या राधाकृष्ण सुता लहिरकी । सुत मलूक प्रमुख सपरिवारयुत। दो। श्री तेजसीकेन सुखश्रेयोर्थं श्री पार्श्वनाथादि बिंब सहस्त्र पित्तलमय : कोष्ठः कारितः । श्री पूणिमा पक्षे ढंढेरपाटके । I Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy