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________________ बे सरस्वती-स्तोत्र -सं. मुनि रत्नकीर्तिविजय विद्यानां तथा श्रुतज्ञाननां अधिष्ठात्री माता सरस्वती देवीनां बे अप्रसिद्ध स्तोत्ररत्नो यथामति संपादित करी अत्रे रजू करतां हर्षानुभव करूं छु. बालमति छतां पूज्य गुर्वाज्ञाथी दोरवाईने आ साहस कर्यु छे, तेथी बालसुलभ क्षतिओ क्षन्तव्य गणवानी मनीषिजनोने विज्ञप्ति छे. प्रथम स्तोत्रनी बे पत्रनी एक प्रति मळेल छे, जे अनुमानतः १५ मा शतकनी लखायेली जणाय छे. प्रान्ते "जानी मेघेन लिखितम् " एम लेखकनो निर्देश छे, पण संवत्नो, रचना संवत्नो के कर्तानो निर्देश नथी. समग्रपणे स्तोत्रनो भाव तपासतां कोई योगमार्गना साधकनी आ मंत्र-यंत्रनी विशिष्ट आम्नायगर्भित रचना छे, तेम पूज्योथी जाणवा मळ्युं छे. स्तोत्र निःशंक प्रभावपूर्ण लागे छे. छठ्ठा पद्यमांना 'निर्ग्रन्थ' पद परथी कोई जैन कर्तानी रचना होय तो ते असंभवित नथी. बीजुं स्तोत्र 'जिनवाक्स्तुति" नामे छे. ते मुख्यत्वे जैन आम्नाय प्रमाणेना सरस्वती -श्रुतदेवीना स्वरूप , नामोनुं तथा गुण वर्णन को छे. ते एक साव नाना प्रकीर्ण पत्रमा लखायेलुं छे, जे पत्र संभवतः १८ मा सैकानुं जणाय छे. एमां पण पत्रमा के रचनामां कर्तानो उल्लेख छे नहि. रचना प्रगल्भ जणाय छे.. (श्री शारदायै नमः॥) अन्तः कुण्डलिनिप्रसुप्तभुजगाकरस्फुरद्विग्रहां, शक्तिं कुण्डलिनी विधाय मनसा हुंकारदण्डाहताम्। षट्चक्राणि विभिद्य सद्य मनसां प्रद्योतनद्योतनी, लीनां ब्रह्मपदे शिवेन सहितामेकत्र लीनां स्तुमः॥१॥ कन्दात्कुण्डलिनि ! त्वदीयवपुषा निर्गत्य तन्तुत्विषा, किञ्चिच्चुम्बितमम्बुजं शतदलं तद्ब्रह्मरन्ध्रादधः। यश्चन्द्रद्युति ! चिन्तयत्यविरतं भूयोऽत्र भूमण्डले, तन्मन्ये कविचक्रवर्तिपदवीच्छत्रच्छलाद्वल्गति॥ २॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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